

रुद्रपुर उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य आंदोलनकारियों की पेंशन में वृद्धि का निर्णय निस्संदेह एक महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक कदम है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा गृह विभाग के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान करते हुए विभिन्न श्रेणियों की पेंशन बढ़ाना इस बात का संकेत है कि राज्य गठन के लिए संघर्ष करने वालों की उपेक्षा अब राजनीतिक रूप से संभव नहीं रही।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

राज्य स्थापना दिवस पर की गई घोषणा को अब औपचारिक मंजूरी मिल चुकी है। शहीद आंदोलनकारियों के आश्रितों की पेंशन 3,000 से बढ़ाकर 5,500 रुपये, पूर्णतः शय्याग्रस्त और विकलांग आंदोलनकारियों की पेंशन 20,000 से 30,000 रुपये, सात दिन जेल गए अथवा घायल आंदोलनकारियों की पेंशन 6,000 से 7,000 रुपये तथा अन्य श्रेणी के आंदोलनकारियों की पेंशन 4,500 से 5,500 रुपये प्रतिमाह कर दी गई है। परिषद इस निर्णय का स्वागत करती है और इसे राज्य आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका की आंशिक स्वीकृति मानती है।
लेकिन प्रश्न अब भी बाकी है…
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद का स्पष्ट मत है कि यह वृद्धि सम्मान का प्रारंभ है, पूर्णता नहीं। परिषद के अध्यक्ष अवतार सिंह बिष्ट का कहना है कि राज्य आंदोलनकारियों को “लोकतंत्र सेनानियों” की तर्ज पर कम से कम 20,000 रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलनी चाहिए। जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और लोकतंत्र रक्षकों को राष्ट्रनिर्माण में योगदान के आधार पर व्यापक सम्मान और आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जा सकती है, तो उत्तराखंड राज्य निर्माण के संघर्ष में अपना जीवन दांव पर लगाने वालों के साथ समान व्यवहार क्यों नहीं?
2021 का संघर्ष: आमरण अनशन से बदला परिदृश्य
यह उल्लेखनीय है कि 30 अगस्त 2021 को उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद के नेतृत्व में आमरण अनशन एवं आंदोलन हुआ था। खटीमा शहीद स्मारक में आमरण अनशन के दौरान हुई वार्ता के पश्चात 1 सितंबर 2021 को मुख्यमंत्री धामी ने पांच प्रमुख मांगों को स्वीकार करने की घोषणा की थी। उसी संघर्ष के परिणामस्वरूप मृतक आश्रितों को भी राज्य आंदोलनकारी के समान सुविधाएं मिलने लगीं। यह इतिहास बताता है कि अधिकार संघर्ष से ही प्राप्त होते हैं।
परिषद का मानना है कि वर्तमान पेंशन वृद्धि भी आंदोलनकारियों की निरंतर आवाज़ और जनदबाव का परिणाम है। हालांकि सरकार की घोषणाएं स्वागतयोग्य हैं, किंतु यह भी स्पष्ट है कि 2027 के चुनावी परिदृश्य को देखते हुए यह निर्णय राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
विकास योजनाओं की स्वीकृति: व्यापक वित्तीय पैकेज
पेंशन वृद्धि के साथ मुख्यमंत्री ने कुल 397.39 करोड़ रुपये की विभिन्न योजनाओं को स्वीकृति दी है। चमोली जिले के नंदानगर में पार्किंग निर्माण, विश्व बैंक सहायतित यू-प्रिपेयर परियोजना, राज्य आपदा मोचन निधि से सहायता, जिला पंचायतों को 79.09 करोड़ रुपये की किस्त, शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत 178 करोड़ रुपये तथा हरिद्वार के सतीकुंड पुनर्विकास सहित अनेक योजनाएं स्वीकृत की गई हैं।
परिषद इन विकास कार्यों का समर्थन करती है, किंतु यह भी दोहराती है कि राज्य निर्माण का आधार केवल भौतिक विकास नहीं, बल्कि आंदोलन की मूल भावना—न्याय, सम्मान और सहभागिता—की स्थापना है।
सम्मान बनाम राजनीतिक औपचारिकता
राज्य आंदोलनकारियों ने मुख्यमंत्री को धन्यवाद और शुभकामनाएं दी हैं, पर साथ ही यह स्पष्ट किया है कि उनकी मांगें अभी समाप्त नहीं हुई हैं। परिषद का मानना है कि राज्य निर्माण आंदोलन कोई “बीता हुआ अध्याय” नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा है। यदि सरकार वास्तव में कृतज्ञ है, तो पेंशन को 20,000 रुपये प्रतिमाह तक बढ़ाने, स्वास्थ्य सुविधाओं में विशेष प्रावधान, और आश्रितों के लिए रोजगार में आरक्षण जैसी ठोस नीतिगत घोषणाएं करनी होंगी।
आंदोलन जारी रहेगा
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद ने स्पष्ट किया है कि सम्मानजनक पेंशन और पूर्ण अधिकारों की प्राप्ति तक संघर्ष जारी रहेगा। यह संघर्ष किसी दल के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक न्याय के पक्ष में है जिसके लिए हजारों युवाओं ने सड़कों पर लाठियां खाईं, जेल गए और अनेक ने अपने प्राण न्यौछावर किए।
आज जब राज्य अपने 25 वर्ष पूरे करने की ओर अग्रसर है, तब यह आवश्यक है कि राज्य आंदोलनकारियों को प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक और स्थायी सम्मान मिले।
सरकार ने एक कदम बढ़ाया है। अब अगला कदम—पूर्ण सम्मान की दिशा में—उठाना शेष है।
उत्तराखंड राज्य निर्माण की लड़ाई केवल राजनीतिक मांग नहीं थी, बल्कि यह जनमानस के स्वाभिमान और अस्तित्व की जंग थी। खटीमा की धरती इस संघर्ष की अमर गवाह है, जहां गोलियों ने आंदोलनकारियों के सीने छलनी किए, पर हौसले नहीं टूटे। 1987से 1994 के उस जनांदोलन ने पहाड़ की पीड़ा को राष्ट्र की आवाज बनाया और अंततः अलग राज्य का सपना साकार हुआ।
आज वही राज्य आंदोलनकारी उपेक्षा और आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। लोकतंत्र सेनानियों की तर्ज पर कम से कम ₹20,000 मासिक पेंशन दिया जाना उनका अधिकार है, सम्मान का प्रश्न है। आरक्षण के लाभ को लेकर जो संदेह बना हुआ है, वह भी सरकार की नीतिगत अस्पष्टता का परिणाम है, न कि आंदोलनकारियों की कमी।
यह मांग केवल आंदोलनकारियों की नहीं, पूरे उत्तराखंड की आत्मा की आवाज है। जब तक समान पेंशन और विधिवत आरक्षण लागू नहीं होता, राज्य आंदोलनकारी संगठित और संघर्ष के लिए तत्पर रहेंगे।
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद के प्रतिनिधि अवतार सिंह बिष्ट माननीय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से लगातार संवाद बना हुआ है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री का राज्य आंदोलनकारियों के प्रति सकारात्मक और सम्मानजनक दृष्टिकोण है। समय-समय पर विभिन्न मुद्दों को लेकर सिद्धांत आधारित वार्ताएं होती रहती हैं, जिनमें आंदोलनकारियों के अधिकार, सम्मान और लंबित मांगों पर चर्चा की जाती है। बिष्ट ने विश्वास जताया कि सरकार आंदोलनकारियों की भावनाओं को समझते हुए उचित निर्णय लेगी और राज्य निर्माण के मूल आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाएगी।




