

देवभूमि की आस्था, सुरक्षा और सियासत—तीनों का संगम शुक्रवार को उस समय दिखा जब Pushkar Singh Dhami ने उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध पूर्णागिरि मेले का ठुलीगाड़ से विधिवत पूजा-अर्चना के साथ शुभारंभ किया। मंच से उनका संदेश साफ था—उत्तराखंड में “घृणित व कट्टरपंथी सोच” को किसी भी कीमत पर पनपने नहीं दिया जाएगा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
यह बयान केवल एक धार्मिक आयोजन का हिस्सा नहीं था; इसके राजनीतिक अर्थ भी दूर तक जाते हैं। आस्था के केंद्र से दिया गया यह संदेश, 2027 की सियासी पृष्ठभूमि में, राज्य की पहचान और विचारधारा की लड़ाई का संकेत भी माना जा सकता है।
मेले को वर्षभर संचालित करने का संकल्प
मुख्यमंत्री ने पूर्णागिरि धाम को वर्षभर संचालित करने की दिशा में काम करने का संकल्प दोहराया। धाम को स्थायी और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करने का लक्ष्य रखा गया है। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि श्रद्धालुओं के आवागमन को सुगम बनाया जाए और मूलभूत सुविधाओं को सुदृढ़ किया जाए।
74.54 करोड़ रुपये की लागत से नौ विकास योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास भी इस अवसर पर किया गया। यह निवेश केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना नहीं, बल्कि सीमांत क्षेत्र के आर्थिक सशक्तिकरण की रणनीति भी है। यदि योजनाएं समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से पूरी होती हैं, तो इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं—जो आज भी पलायन की समस्या से जूझ रहे हैं।
कांग्रेस पर प्रहार और “अर्बन नक्सल टूलकिट” की बहस
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि जब भी सरकार जनहित में ठोस निर्णय लेती है, “कांग्रेस की तथाकथित अर्बन नक्सल टूलकिट” सक्रिय हो जाती है और विकास के हर कदम को भटकाने की कोशिश करती है।
यह बयान राजनीतिक विमर्श को और तीखा करने वाला है। सवाल यह है कि क्या हर असहमति को टूलकिट की संज्ञा देना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है? या फिर सरकार वास्तव में संगठित दुष्प्रचार का सामना कर रही है? लोकतंत्र में आलोचना और जवाबदेही दोनों आवश्यक हैं। विकास और अस्मिता की रक्षा के नाम पर लिए गए कठोर निर्णयों की पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है, ताकि जनता के मन में संशय न रहे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्ष को सरकार के निर्णय “हजम नहीं हो रहे”, लेकिन जनता सब समझती है। यह भरोसा राजनीतिक आत्मविश्वास का संकेत है, परंतु जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए घोषणाओं से अधिक क्रियान्वयन की कसौटी पर खरा उतरना अनिवार्य होगा।
सीमांत सुरक्षा और होली का संदेश
पूर्णागिरि मेले के शुभारंभ के बाद मुख्यमंत्री लोहाघाट स्थित 36th Battalion ITBP पहुंचे, जहां उन्होंने हिमवीरों के साथ होली मनाई और उनका उत्साहवर्धन किया।
सीमा पर तैनात जवानों के बीच जाकर पर्व मनाना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मनोबल बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों में तैनात जवानों का त्याग और बलिदान निस्संदेह पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा है। उत्तराखंड जैसे सीमांत राज्य में सुरक्षा और विकास—दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
आस्था, विकास और राजनीतिक संतुलन
पूर्णागिरि धाम का विस्तार, मेले को वर्षभर संचालित करने की योजना, और साथ ही कट्टरपंथ के खिलाफ कड़ा संदेश—यह त्रिकोण मुख्यमंत्री की राजनीतिक रणनीति को दर्शाता है। एक ओर धार्मिक पर्यटन को आर्थिक इंजन बनाने की कोशिश है, तो दूसरी ओर सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का विमर्श।
लेकिन यहां एक सावधानी भी आवश्यक है। आस्था के मंच से दिए गए राजनीतिक वक्तव्यों का असर व्यापक होता है। देवभूमि की पहचान केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि सहिष्णुता और समरसता से भी जुड़ी है। यदि कट्टरपंथ के विरुद्ध संदेश है, तो वह हर प्रकार के अतिवाद पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
पूर्णागिरि मेले का शुभारंभ केवल एक परंपरागत आयोजन नहीं रहा; यह विकास योजनाओं की घोषणा, राजनीतिक संदेश और सीमांत सुरक्षा के सम्मान का संगम बन गया।
अब असली परीक्षा घोषणाओं की नहीं, क्रियान्वयन की है। क्या वर्षभर संचालित मेले की परिकल्पना धरातल पर उतरेगी? क्या 74.54 करोड़ की योजनाएं समय पर पूरी होंगी? और क्या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच विकास की गति अविचलित रहेगी?
उत्तराखंड की जागरूक जनता निश्चित ही इन प्रश्नों का उत्तर आने वाले समय में अपने अनुभव से देगी।




