गैरसैंण पर फिर गरमाई सियासत: कांग्रेस के भीतर मतभेद, भाजपा ने साधा निशाना।

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उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र में राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर विकास यात्रा और भविष्य के रोडमैप पर हुई चर्चा के दौरान एक बार फिर गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाए जाने का मुद्दा सियासत के केंद्र में आ गया। सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ ने ऐसा बयान दिया, जिसने पूरे राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

बेहड़ ने विधानसभा में स्पष्ट शब्दों में कहा कि —

“गैरसैंण अब उत्तराखंड की स्थायी राजधानी नहीं बन सकती, क्योंकि उसे पहले ही ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा दिया जा चुका है। राज्य को अब अपनी राजधानी के मसले पर नई दिशा में सोचने की जरूरत है।”

उनके इस बयान ने न सिर्फ सदन में मौजूद विधायकों को चौंकाया, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी मतभेदों को उजागर कर दिया। क्योंकि इससे कुछ ही समय पहले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बयान दिया था कि 2027 में अगर उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनी, तो गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित किया जाएगा।

भाजपा ने साधा निशाना, विनोद चमोली ने ली चुटकी

तिलक राज बेहड़ के बयान पर भाजपा विधायक विनोद चमोली ने चुटकी लेते हुए कहा —

“लगता है तिलक राज बेहड़ हरीश रावत को अपना नेता ही नहीं मानते, या फिर कांग्रेस में जो मन में आता है, वही बोल दिया जाता है। कांग्रेस गैरसैंण के मुद्दे पर केवल राजनीति करना जानती है। जब कांग्रेस ने 10 साल तक प्रदेश में शासन किया, तब राजधानी घोषित क्यों नहीं की?”

उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस को पहले अपने घर के अंदर तय करना चाहिए कि राजधानी के मुद्दे पर उसकी पार्टी लाइन क्या है, क्योंकि एक ही पार्टी के दो वरिष्ठ नेता विपरीत बातें कह रहे हैं।

नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य का बचाव

मामला जब तूल पकड़ने लगा, तो नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने स्थिति संभालने की कोशिश की। उन्होंने कहा —

“किसी एक व्यक्ति का बयान पार्टी का स्टैंड नहीं होता। ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर निर्णय सामूहिक रूप से लिया जाता है। कांग्रेस ने गैरसैंण में आधारभूत संरचना के निर्माण के लिए हमेशा सकारात्मक भूमिका निभाई है।”

गैरसैंण पर फिर उभरा जनभावनाओं का सवाल

विधानसभा सत्र में कई विधायकों ने यह राय रखी कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ों में ही होनी चाहिए, ताकि विकास का संतुलन बना रहे और पलायन की समस्या पर भी नियंत्रण किया जा सके।

हालांकि, यह भी स्पष्ट हुआ कि बीते 25 वर्षों में गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाए जाने की दिशा में ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी रही है। अब एक बार फिर इस मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं — लेकिन जनता के मन में अब भी वही सवाल गूंज रहा है:
“क्या गैरसैंण कभी उत्तराखंड की स्थायी राजधानी बन पाएगा?”



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