

उधम सिंह नगर की राजनीति इन दिनों जनहित, विकास और विचारधारा से ज्यादा व्यक्तिगत टकराव, सोशल मीडिया युद्ध और अंदरखाने की सियासत के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। रुद्रपुर, किच्छा (शिक्षा) और गदरपुर विधानसभा सीटें इस समय राजनीतिक अखाड़ा बन चुकी हैं, जहाँ हर नेता दूसरे को पछाड़ने की जुगत में लगा है।
रुद्रपुर: विधायक और पूर्व विधायक आमने-सामने
रुद्रपुर विधानसभा में मौजूदा विधायक शिव अरोड़ा और पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल के बीच खींचतान अब छिपी नहीं रही। यह टकराव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वर्चस्व और प्रभाव की लड़ाई बन चुका है।
राजकुमार ठुकराल भले ही इस समय किसी पार्टी के औपचारिक मंच पर न हों, लेकिन वे पूरी तरह सक्रिय हैं। सोशल मीडिया पर उनके बयान और वीडियो जबरदस्त टीआरपी बटोर रहे हैं। हालात यह हैं कि सोशल मीडिया के पत्रकार सुबह होने से पहले ही उनके आवास के बाहर मौजूद रहते हैं।
बीजेपी से दूरी, कांग्रेस की अनिश्चितता
राजकुमार ठुकराल को लेकर स्थिति बेहद दिलचस्प है। भारतीय जनता पार्टी ने उनसे लगभग किनारा कर लिया है, जबकि कांग्रेस ने उन्हें संकेत तो दिए, लेकिन अब तक पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल नहीं कराया।
इस असमंजस के कारण ठुकराल की छवि कभी बीजेपी की तो कभी कांग्रेस की “कठपुतली” के रूप में पेश की जा रही है। राजनीति में यह स्थिति न पूरी तरह सत्ता में होने की है, न ही पूरी तरह विपक्ष में।
किच्छा (शिक्षा) विधानसभा: जुबानी जंग तेज
किच्छा विधानसभा में मौजूदा विधायक एवं पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तिलक राज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के बीच जुबानी जंग लगातार तेज हो रही है। आरोप–प्रत्यारोप और सोशल मीडिया पोस्ट अब राजनीतिक बहस की जगह व्यक्तिगत कटाक्ष में बदलते दिख रहे हैं।
राजेश शुक्ला ने इस जंग को गदरपुर तक विस्तार देते हुए वहां के विधायक अरविंद पांडे को भी निशाने पर ले लिया है।
गदरपुर: अरविंद पांडे घिरे
गदरपुर के विधायक और पूर्व शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे इन दिनों सोशल मीडिया पर आलोचनाओं के केंद्र में हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यों को लेकर हो रही बहस में भी उनका नाम खींचा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आलोचना केवल नीतिगत नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव को देखते हुए रणनीतिक भी हो सकती है।
मीना शर्मा प्रकरण और प्रशासन की भूमिका
रुद्रपुर की पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष और कांग्रेस की पूर्व विधायक प्रत्याशी मीना शर्मा का धरना और उससे जुड़ा ऑडियो वायरल होना इस पूरी राजनीति में नया मोड़ लेकर आया।राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि मीना शर्मा को कथित लालच देकर राजकुमार ठुकराल के विरोध में धरने पर बैठाया गया। कहा जा रहा है कि इस पूरे घटनाक्रम में उन्हें सत्ता पक्ष का अप्रत्यक्ष आशीर्वाद भी प्राप्त था। यही कारण रहा कि धरने के दौरान प्रशासन असामान्य रूप से सक्रिय नजर आया। इस प्रकरण ने स्थानीय राजनीति में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विरोध स्वतःस्फूर्त था या सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा।
राजकुमार ठुकराल के खिलाफ धरने के बाद जिस तेजी से जिला प्रशासन हरकत में आया और मामला दर्ज हुआ, उसने आम जनता के बीच सवाल खड़े कर दिए।
आम धारणा यह बन रही है कि जिन मामलों में विपक्ष वर्षों तक न्याय के लिए भटकता है, वहाँ इतनी तेजी से कार्रवाई क्यों नहीं होती? इस चयनात्मक सक्रियता ने प्रशासन की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा दिया है।
2027 की तैयारी और तीनों सीटों पर हलचल
2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उधम सिंह नगर की तीनों प्रमुख सीटों पर राजनीतिक महासंग्राम अभी से शुरू हो चुका है।
कोई नेता हाशिये पर खड़ा है
कोई बूम में है
कोई सत्ता के सहारे आगे बढ़ रहा है
तो कोई सोशल मीडिया को हथियार बना रहा है
इस पूरी खींचतान में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक को स्थानीय राजनीति में घसीटा जा रहा है।
राजकुमार ठुकराल के पास अब भी दांव
तमाम विवादों और अनिश्चितताओं के बावजूद राजकुमार ठुकराल के पास अभी भी एक मजबूत राजनीतिक दांव बचा हुआ है—उनका अनुभव, नेटवर्क और स्थानीय प्रभाव। यही कारण है कि वे अब भी चर्चा के केंद्र में हैं।
उधम सिंह नगर की राजनीति इस समय “अजब भी है और गजब भी।” यहाँ मुद्दों से ज्यादा व्यक्ति हावी हैं और विकास से ज्यादा वर्चस्व की लड़ाई चल रही है।
2027 के चुनाव से पहले यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन नेता इस राजनीतिक जंग में टिकता है और कौन हाशिये पर चला जाता है।
इतना तय है कि इस जिले की राजनीति में आखिरी पत्ता अभी फेंका नहीं गया है—और आने वाले दिनों में कई बड़े खुलासे संभव हैं।

यदि यह चर्चा सत्य मान ली जाए, तो मीना शर्मा का राजनीतिक करियर अब कांग्रेस से अधिक बीजेपी की परिक्रमा करता नजर आ सकता है। सत्ता पक्ष का आशीर्वाद मिलने की बात उनके भविष्य की दिशा तय करने का संकेत देती है। दूसरी ओर, यदि राजकुमार ठुकराल कांग्रेस का दामन थामते हैं, तो यह मुकाबला और तीखा होगा। ऐसे में मीना शर्मा की भूमिका बीजेपी की रणनीतिक तैयारी का हिस्सा बन सकती है। क्या




