“पोलिहाउस योजना: किसान के सपनों पर सिस्टम का प्रहार या संगठित घोटाले की पटकथा?”“अजब-गजब” ठेके: क्या उत्तराखंड बना प्रयोगशाला?

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उत्तराखंड की पहचान देवभूमि के साथ-साथ कृषि और बागवानी की भूमि के रूप में भी रही है। पहाड़ों में सीमित संसाधनों के बावजूद किसानों ने अपनी मेहनत से फल, सब्ज़ी और फूल उत्पादन में नई मिसालें कायम की हैं। लेकिन जब सरकार की योजनाएं ही किसानों के विश्वास को तोड़ने लगें, तो सवाल सिर्फ एक योजना का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नीयत और नीतियों का हो जाता है।
अल्मोड़ा जनपद के किसानों द्वारा नाबार्ड की आर.आई.डी.एफ. योजना के अंतर्गत पोलिहाउस निर्माण के लिए जमा की गई अग्रिम धनराशि और उसके बाद की घटनाएं अब एक गंभीर प्रशासनिक विफलता ही नहीं, बल्कि संभावित घोटाले की ओर इशारा कर रही हैं।
किसानों का दर्द: कर्ज लेकर जमा किया पैसा, लेकिन मिला सिर्फ आश्वासन
अल्मोड़ा के सैकड़ों किसानों ने 50 से 200 वर्ग मीटर तक के पोलिहाउस निर्माण के लिए 20% अग्रिम राशि जमा की। यह पैसा किसी अतिरिक्त आमदनी से नहीं, बल्कि कर्ज लेकर, जमीन गिरवी रखकर, और उम्मीदों के सहारे जुटाया गया था।
लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी:
न पोलिहाउस बना
न सामग्री पहुँची
न कोई ठोस जवाब मिला
यह केवल देरी नहीं, बल्कि विश्वास का टूटना है।
कार्यदायी संस्था पर सवाल: “ब्रेथ वैट एंड कंपनी” की भूमिका संदिग्ध
सबसे बड़ा सवाल उस कंपनी पर उठता है जिसे पोलिहाउस निर्माण का ठेका दिया गया। आरोप है कि:
कंपनी को इस क्षेत्र का अनुभव नहीं था
चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी
कार्य प्रारंभ होने से पहले ही योजना ठप हो गई
जब सरकार खुद यह स्वीकार कर रही है कि कंपनी से काम वापस ले लिया गया है, तो यह मान लेना चाहिए कि कहीं न कहीं गंभीर गड़बड़ी हुई है।
“अजब-गजब” ठेके: क्या उत्तराखंड बना प्रयोगशाला?
सूत्रों के अनुसार:
पोलिहाउस का काम रेलवे से जुड़ी किसी कंपनी को देने की चर्चा
पौधारोपण या अन्य कार्यों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एंट्री
यह सवाल खड़ा करता है—क्या उत्तराखंड के कृषि प्रोजेक्ट्स अब अनुभवहीन या बाहरी कंपनियों के प्रयोग बनते जा रहे हैं?
सरकार की चुप्पी और किसानों का बढ़ता आक्रोश
किसानों का कहना है कि:
कई बार शिकायत की गई
अधिकारियों से गुहार लगाई गई
लेकिन कोई समाधान नहीं मिला
अब स्थिति यह है कि किसान:  पोलिहाउस नहीं चाहते
अपनी जमा राशि ब्याज और मुआवजे के साथ वापस चाहते हैं
यह मांग जायज है, क्योंकि जब सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही, तो किसानों पर बोझ क्यों?
“साइलेंट विरोध” से “संगठित आंदोलन” की ओर
अंदरखाने जो हलचल है, वह आने वाले समय की बड़ी चेतावनी है:
गांव-गांव में किसानों के छोटे-छोटे समूह बन रहे हैं
सरकार की नीतियों के खिलाफ साइलेंट विरोध चल रहा है
जल्द ही पहाड़ों में किसान सम्मेलन शुरू होने की तैयारी
यह वही उत्तराखंड है, जहां से राज्य आंदोलन की चिंगारी भड़की थी। अगर किसान एकजुट हो गए, तो यह आंदोलन बड़ा रूप ले सकता है।
2027 की आहट: क्या किसान बदलेंगे सत्ता का समीकरण?
राजनीति में यह कहा जाता है कि किसान नाराज हो जाए तो सत्ता बदल जाती है। उत्तराखंड में भी 2027 के चुनाव दूर नहीं हैं।
अगर:
किसानों का पैसा नहीं लौटा
जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हुई
पारदर्शिता नहीं आई
तो यह मुद्दा सिर्फ एक योजना का नहीं रहेगा, बल्कि सरकार के खिलाफ जनमत बन सकता है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
ठेका किस आधार पर दिया गया?
कंपनी की योग्यता क्या थी?
अब तक जमा राशि का हिसाब क्या है?
दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?
किसानों को पैसा कब और कैसे वापस मिलेगा?
अब सिर्फ जांच नहीं, जवाबदेही जरूरी
पोलिहाउस योजना का यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
सरकार को चाहिए कि:
उच्च स्तरीय जांच कराए
दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे
किसानों को तुरंत राहत दे
क्योंकि अगर किसान ही टूट गया, तो उत्तराखंड की आत्मा टूट जाएगी।
“यह सिर्फ एक योजना का घोटाला नहीं, यह उस विश्वास का संकट है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है।”


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