प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित है। हर माह दो प्रदोष व्रत आते हैं और साल में इस दिन 24 प्रदोष व्रत पड़ते हैं। 3 नवंबर को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि है और सोमवार है।

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इसलिए इस दिन सोम प्रदोष व्रत रखा जाएगा। सोम प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। गौरतलब है कि प्रदोष व्रत पर पूजा सूर्यास्त के बाद की जाती है। तो आइए जानते हैं सोम प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त और कथा।

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये,
शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी,
नारायणी नमोस्तुते।।

इस मंत्र का अर्थ है कि

“हे सभी प्रकार के शुभ मंगल करने वाली, कल्याणकारी,
सभी मनोरथों को पूरा करने वाली माँ,
शरण लेने योग्य,
तीन नेत्रों वाली (भूत, वर्तमान, भविष्य देखने वाली) और गौरी (तेजस्वी मुख वाली) नारायणी देवी,
आपको हमारा नमस्कार है”।

मंत्र:
ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।

अर्थ:

हे देवी जो सभी के लिए मंगल और शुभ हैं,
जो कल्याणकारी हैं,

जो सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं,
जिन्हें शरण देने वाली और तीन नेत्रों वाली, गौरी और नारायणी कहा जाता है,
मैं आपको नमस्कार करता हूँ।।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

सोम प्रदोष व्रत पूजा का शुभ मुहूर्त
त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ – 3 नवंबर 2025, प्रातः 5:07 बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त – 4 नवंबर 2025, प्रातः 2:05 बजे
प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त – शाम 5:34 से रात्रि 8:11 बजे तक

सोम प्रदोष व्रत कथा
सोम प्रदोष व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक ब्राह्मण महिला रहती थी। उसके पति का देहांत हो जाने के कारण वह अकेली रहती थी। ब्राह्मण महिला और उसका पुत्र बेरोजगार थे, इसलिए वे सुबह-सुबह भीख मांगने निकल जाते थे। हालाँकि वह बहुत तंगहाल थी, फिर भी वह हमेशा प्रदोष व्रत रखती थी। इस तरह ब्राह्मण महिला और उसका पुत्र जीवनयापन करते थे। एक बार भिक्षाटन से लौटते समय उसने रास्ते में एक युवक को घायल अवस्था में देखा। वह उसे घर ले आई। दरअसल, यह युवक विदर्भ राज्य का राजकुमार था, जो शत्रुओं से बचकर भाग रहा था। उसके पिता को शत्रुओं ने बंदी बना लिया था। राजकुमार एक ब्राह्मणी और उसके पुत्र के साथ रहने लगा।

एक बार एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। उस गंधर्व कन्या का नाम अंशुमती था। अंशुमती ने अपने माता-पिता को राजकुमार के बारे में बताया। एक दिन भगवान शिव अंशुमती के माता-पिता के स्वप्न में प्रकट हुए और उन्हें अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार से करने का आदेश दिया। अंशुमती के माता-पिता ने उसका विवाह राजकुमार से तय कर दिया। तत्पश्चात, राजकुमार ने गंधर्व राजा के साथ मिलकर शत्रुओं को अपने राज्य से खदेड़ दिया। राजकुमार ने ब्राह्मणी के पुत्र को अपने राज्य का युवराज बना दिया और ब्राह्मणी के जीवन में सुख आने लगा। जिस प्रकार प्रदोष व्रत के प्रभाव से भगवान शिव ने ब्राह्मणी और उसके पुत्र का भाग्य बदल दिया, उसी प्रकार भगवान शिव सभी पर कृपा करें।✧ धार्मिक और अध्यात्मिक


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