

रुद्रपुर का इतिहास गवाह है कि यहां हमेशा से ही रसूखदारों को बचाने की परंपरा रही है। स्मार्ट सिटी परियोजना के नाम पर मजदूर वर्ग और गरीबों की झुग्गियों को एक ही दिन में बुलडोजर से मटियामेट कर दिया जाता है, लेकिन जब मामला बड़े अतिक्रमणों का आता है, तब प्रशासन और शासन की “कार्रवाई” रसूखदारों के दरवाजे पर जाकर दम तोड़ देती है। यह दोहरा रवैया रुद्रपुर की जनता को गहरे सवाल पूछने पर मजबूर कर रहा है।

काशीपुर बायपास इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वर्षों से हो रही है, लेकिन सत्ताधारी नेताओं और नौकरशाहों का गठबंधन उन्हें बचाने में ही व्यस्त दिखाई देता है। प्रशासन के शीर्ष अधिकारी सत्ता पक्ष के प्रति इतनी वफादारी दिखा रहे हैं कि मानो वे जनता के सेवक नहीं, बल्कि राजनीतिक रसूखदारों के निजी कर्मचारी हों।
सवाल यह है कि हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए है और क्या बड़े-बड़े कार बाजार, शो-रूम और होटल मालिकों के लिए अलग व्यवस्था है? रुद्रपुर में यही पक्षपात सबसे बड़ा संकट बन चुका है।
शासन-प्रशासन की इस मानसिकता ने यह साबित कर दिया है कि न्याय और नियम यहां रसूख के हिसाब से लागू किए जाते हैं। जिन मजदूरों ने अपनी मेहनत की कमाई से झोपड़ी बनाई, उन पर बुलडोजर चल जाता है। लेकिन जिनके पास सत्ता का संरक्षण है, उनके लिए सिस्टम चुप्पी साध लेता है। यही कारण है कि ग्रीन बेल्ट से लेकर बायपास तक, हर जगह अतिक्रमण फली-फूल रहा है।
जनता जानना चाहती है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और स्थानीय विधायक शिव अरोड़ा इस पर चुप क्यों हैं। क्या स्मार्ट सिटी का मतलब केवल गरीबों की बस्तियां उजाड़ना और बड़े रसूखदारों की गैरकानूनी इमारतों को संरक्षण देना है?
हाई कोर्ट के आदेश की अनदेखी करके रुद्रपुर में शासन और प्रशासन ने खुद को कठघरे में खड़ा कर लिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा न केवल स्थानीय राजनीति में उभर सकता है, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव में सत्ता पक्ष की साख पर भी सीधा असर डाल सकता है। क्योंकि जनता सब देख रही है—और इस बार सवाल सिर्फ स्मार्ट सिटी का नहीं, बल्कि न्याय और समानता के अधिकार का है।
रुद्रपुर एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति और विकास की प्रयोगशाला बन गया है। समय के साथ यहां सत्ता, नौकरशाही और माफिया का गठजोड़ ग्रीन बेल्ट और सार्वजनिक जमीनों पर कब्जे का पर्याय बन चुका था। लेकिन मौजूदा दौर में स्थिति बदलती दिख रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, स्थानीय विधायक शिव अरोड़ा और नगर निगम महापौर विकास शर्मा की सक्रियता ने रुद्रपुर को नई दिशा दी है।
।✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
धामी सरकार के नेतृत्व में स्मार्ट सिटी की योजनाओं पर फोकस किया जा रहा है। शिव अरोड़ा लगातार सड़क चौड़ीकरण, ट्रैफिक सुधार और अवैध कब्जों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वहीं, महापौर विकास शर्मा इंदौर जैसी आधुनिक ट्रैफिक प्रणाली को रुद्रपुर में लागू करने का खाका तैयार कर रहे हैं। यह निश्चित रूप से रुद्रपुर की जनता के लिए उम्मीद जगाने वाला कदम है।
लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या सच में रुद्रपुर स्मार्ट सिटी बनेगा? ग्रीन बेल्ट पर हुए कब्जे अब तक जस के तस हैं, और नैनीताल रोड पर हर महीने 15–20 दुर्घटनाएं होना विकास पर सवालिया निशान छोड़ता है। अगर यही हाल रहा, तो जनता यह मानने पर मजबूर होगी कि नेता और अधिकारी केवल कागजों में ही स्मार्ट सिटी बना रहे हैं।
फिर भी, सकारात्मकता यह है कि वर्तमान नेतृत्व ने कम से कम इस मुद्दे पर पहल की है। अब जनता की नजर इस पर टिकी है कि क्या 2027 तक रुद्रपुर वास्तव में बदलेगा या फिर यह भी अधूरी योजनाओं का हिस्सा बन जाएगा। क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक है—अगर सड़कें सुरक्षित नहीं हुईं, अगर ग्रीन बेल्ट वापस नहीं मिली, तो 2027 में रुद्रपुर की जनता “स्मार्ट वोटिंग” से जवाब देने में देर नहीं करेगी।
उत्तराखंड राज्य का निर्माण विकास और जनकल्याण की आकांक्षाओं पर आधारित था। पहाड़ की नाजुक पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखते हुए उद्योग, शिक्षा और रोज़गार के अवसर बढ़ाना ही इसका मूल उद्देश्य था। लेकिन 25 साल बाद स्थिति यह है कि राज्य के शहर और कस्बे उसी अंधाधुंध शहरीकरण, प्रदूषण और अराजक विकास के शिकार हो रहे हैं, जिनसे बचने के लिए यह राज्य अस्तित्व में आया था।
रुद्रपुर इसका ताज़ा उदाहरण है। नगर के बीच से गुजरने वाले नैनीताल राजमार्ग की दोनों ओर बनाई गई ग्रीन बेल्ट, जिसका मकसद था – हरियाली बढ़ाना, प्रदूषण नियंत्रित करना और यात्रियों को स्वच्छ वातावरण देना – रसूखदारों की भूख और सरकारी तंत्र की लापरवाही की भेंट चढ़ चुकी है। डेढ़ किलोमीटर लंबी यह पूरी ग्रीन बेल्ट अब कार बाजार में बदल गई है। नियम साफ कहते हैं कि राजमार्ग के दोनों ओर 30-30 फीट ग्रीन ज़ोन होना चाहिए, लेकिन आज वहां सिर्फ सीमेंट, टीनशेड और शो-रूम दिखाई देते हैं।
विडंबना देखिए कि नगर निगम, लोनिवि और एनएचएआई तीनों विभाग जिम्मेदार हैं, लेकिन किसी ने भी इस अतिक्रमण पर अंकुश लगाने की हिम्मत नहीं दिखाई। यही नहीं, यातायात विभाग की रिपोर्ट बताती है कि इसी क्षेत्र में हर महीने 15–20 सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं। सवाल उठता है कि क्या मानव जीवन की कीमत भी रसूखदारों के आगे इतनी सस्ती हो गई है?
उत्तराखंड राज्य की मूल अवधारणा हरियाली, स्वच्छता और जनसरोकार पर आधारित थी। लेकिन आज रुद्रपुर जैसे औद्योगिक नगरों में न तो पर्यावरण की परवाह है और न ही योजनाओं की आत्मा की। यह स्थिति बताती है कि यहां शासन और प्रशासन दोनों ही ‘गहरी नींद’ में हैं।
अगर आज ग्रीन बेल्ट की रक्षा नहीं हुई तो कल पूरे नगर का पर्यावरण संकट में होगा। वायु प्रदूषण बढ़ेगा, सड़कें और संकरी होंगी और दुर्घटनाएं और बढ़ेंगी। सवाल सिर्फ एक ग्रीन बेल्ट का नहीं है, बल्कि राज्य की उस सोच का है जिसके तहत प्रकृति और विकास में संतुलन का सपना देखा गया था।
अब समय है कि उत्तराखंड सरकार और प्रशासन यह तय करें कि वे ग्रीन बेल्ट को बचाएंगे या फिर उसे भी सिर्फ कागज़ी योजना बनाकर छोड़ देंगे। जनता को भी चाहिए कि वह चुप्पी तोड़े, क्योंकि हरियाली और सुरक्षित सड़कें किसी सरकार या रसूखदार की दया पर नहीं, बल्कि समाज की जागरूकता और संघर्ष पर निर्भर करती हैं।
संपादकीय रुद्रपुर: न्याय सबके लिए, न कि सिर्फ गरीबों के लिए रुद्रपुर की दो हालिया घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या कानून और न्याय वास्तव में सबके लिए बराबर है, या फिर यहां भी उसका चेहरा रसूख और सत्ता देखकर बदल जाता है।
पहला उदाहरण किच्छा रोड हाईवे पर नगर निगम की कार्रवाई का है। महापौर विकास शर्मा के नेतृत्व में नगर निगम ने वर्षों से कब्जाई गई करोड़ों की नजूल भूमि को अतिक्रमणकारियों से मुक्त कराया। अदालत से फैसला नगर निगम के पक्ष में आने के बाद जेसीबी चली, कब्जे हटे और भूमाफिया को कड़ा संदेश गया कि अब लैंड जिहाद या किसी भी नाम पर कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह कार्रवाई निश्चित ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सख्त नीति और स्थानीय प्रशासन की तत्परता का प्रमाण है। इससे जनता का विश्वास जागता है कि सरकारी संपत्ति सुरक्षित है और भविष्य में यह जनकल्याण के काम आ सकती है।
लेकिन दूसरी तरफ, ग्रीन बेल्ट और काशीपुर बायपास जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की तस्वीर बिल्कुल उलट है। यहां हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद रसूखदार कार बाजार और शोरूम मालिकों के खिलाफ कार्रवाई आज तक ठंडी पड़ी है। यही वह दोहरा रवैया है, जो रुद्रपुर की न्याय व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़ा करता है। गरीब मजदूर की झुग्गी तो एक दिन में ढहा दी जाती है, लेकिन रसूखदारों की अवैध इमारतें सालों तक प्रशासन की छत्रछाया में फलती-फूलती रहती हैं।
अगर किच्छा रोड पर बैठे अतिक्रमणकारी भू-माफिया हैं, तो फिर ग्रीन बेल्ट पर कब्जा जमाने वाले भी भू-माफिया ही हैं। कानून के दायरे में दोनों बराबर होने चाहिए। एक जगह तो नगर निगम अदालत के आदेश का पालन कर दिखाता है, लेकिन दूसरी जगह वही अदालत का आदेश रसूखदारों के दबाव में धरा रह जाता है। यह दोहरा न्याय न सिर्फ रुद्रपुर, बल्कि उत्तराखंड राज्य की मूल परिकल्पना के भी विपरीत है।
रुद्रपुर की जनता चाहती है कि हर इंच भूमि पर जनता का अधिकार हो, न कि सत्ता और पैसे के गठजोड़ का। अगर वाकई रुद्रपुर को स्मार्ट सिटी बनाना है और उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना को सार्थक करना है, तो जिला प्रशासन, नगर निगम और सत्ताधारी नेताओं को इस पक्षपातपूर्ण रवैये से बाहर आना होगा। ग्रीन बेल्ट पर भी उसी तरह बुलडोजर चलना चाहिए जैसे किच्छा रोड की जमीन पर चला। तभी जनता का विश्वास शासन-प्रशासन में टिकेगा।
अन्यथा, यह संदेश जाएगा कि कानून गरीबों के लिए कठोर है और अमीरों-रसूखदारों के लिए महज औपचारिकता। लोकतंत्र में यह असमानता लंबे समय तक नहीं टिक सकती। 2027 में जनता उसी स्मार्ट तरीके से अपना जवाब देगी।




