क़ुम पर प्रहार: इज़राइल की निर्णायक कार्रवाई से ईरान की सत्ता संरचना हिली

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संपादकीय:मध्य–पूर्व में तेज़ी से बदलते घटनाक्रमों के बीच इज़राइल और ईरान के बीच छिड़ा संघर्ष वैश्विक राजनीति का केंद्र बन चुका है। क़ुम में कथित रूप से हुई उस भीषण एयर स्ट्राइक, जिसमें असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स (मजलिस-ए-खोब्रेगान) के परिसर को निशाना बनाया गया, ने क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। ईरानी मीडिया इसे “इस्लामी गणराज्य के हृदय पर हमला” बता रहा है, जबकि Israeli Defense Forces का दावा है कि यह कार्रवाई “कमान और नियंत्रण ढांचे को पंगु करने” की रणनीति का हिस्सा थी।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


अभी तक स्वतंत्र और आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से इन दावों की पूरी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि यह घटना तथ्यात्मक रूप से सही है, तो इसका असर केवल तेहरान की सत्ता-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की दिशा तय करेगा।
संपादकीय दृष्टिकोण: आतंक के ढांचे पर प्रहार या राजनीतिक जुआ?
इज़राइल लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि ईरान क्षेत्र में प्रॉक्सी संगठनों को समर्थन देकर अस्थिरता फैलाता है। लेबनान, सीरिया, ग़ाज़ा और यमन में सक्रिय समूहों को लेकर इज़राइल की सुरक्षा चिंताएँ जगज़ाहिर हैं। ऐसे में यदि इज़राइल ने नेतृत्व चयन की प्रक्रिया के दौरान हमला किया है, तो उसका रणनीतिक उद्देश्य स्पष्ट है—ईरानी सत्ता-परिवर्तन को अस्थिर करना और युद्धकाल में सशक्त नेतृत्व के उभरने को रोकना।
समर्थकों का तर्क है कि यह “रक्षात्मक आक्रामकता” (defensive offense) है—एक ऐसी रणनीति जिसमें भविष्य के खतरे को जन्म लेने से पहले ही समाप्त करने की कोशिश की जाती है। इज़राइल का यह भी मानना रहा है कि वैचारिक रूप से कठोर नेतृत्व के हाथों में परमाणु या बैलिस्टिक क्षमता का केंद्रीकरण पूरे क्षेत्र के लिए घातक हो सकता है।
अमेरिका की भूमिका और लागत का गणित
संयुक्त राज्य अमेरिका इस संघर्ष में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। खाड़ी क्षेत्र में एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप की तैनाती, मिसाइल डिफेंस सिस्टम की सक्रियता और उच्च तकनीक वाले विमानों की उड़ानें इस बात का संकेत हैं कि वॉशिंगटन स्थिति को “सीमित लेकिन निर्णायक” रखना चाहता है।
रक्षा बजट लगभग 900 अरब डॉलर के आसपास होने के बावजूद, अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 35 खरब डॉलर से ऊपर है। अल्पकालिक हवाई अभियान वित्तीय रूप से संभव है, परंतु यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो बजट और मुद्रास्फीति पर गंभीर दबाव पड़ेगा।
असली दांव: होरमुज़ और वैश्विक अर्थव्यवस्था
मध्य–पूर्व की हर जंग अंततः ऊर्जा बाजारों पर असर डालती है। Strait of Hormuz से होकर दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति गुजरती है। यदि यहां अवरोध होता है तो तेल की कीमतें 120–150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिसका सीधा असर वैश्विक महंगाई, शेयर बाजारों और विकास दर पर पड़ेगा।
इतिहास गवाह है कि ऊर्जा संकट का प्रभाव बमबारी से अधिक दीर्घकालिक होता है।
क्या यह ईरान में बदलाव का अवसर है?
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि बाहरी सैन्य दबाव से कट्टरपंथी ढांचे कमजोर पड़ सकते हैं और आंतरिक राजनीतिक सुधार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। वहीं दूसरी ओर यह भी आशंका है कि बाहरी हमला राष्ट्रवादी एकजुटता को जन्म देता है, जिससे कठोर तत्व और मजबूत होकर उभरते हैं।
यदि वास्तव में सत्ता-परिवर्तन की प्रक्रिया बाधित हुई है, तो ईरान के भीतर राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ सकती है। यह स्थिति या तो सुधार की राह खोलेगी या और अधिक सैन्यीकरण को जन्म देगी—यह आने वाला समय तय करेगा।
समर्थन, लेकिन संयम के साथ
संपादकीय दृष्टि से देखें तो यदि किसी राष्ट्र की सुरक्षा और अस्तित्व पर प्रत्यक्ष खतरा हो, तो आत्मरक्षा का अधिकार अंतरराष्ट्रीय कानून में मान्य है। इज़राइल की सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
परंतु साथ ही यह भी आवश्यक है कि सैन्य कार्रवाई नागरिक संरचनाओं और धार्मिक संस्थानों को न्यूनतम क्षति पहुंचाए तथा क्षेत्रीय स्थिरता को दीर्घकालिक समाधान की दिशा में ले जाए। युद्ध कभी स्थायी समाधान नहीं होता—राजनीतिक संवाद और संतुलित कूटनीति ही अंततः शांति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
मध्य–पूर्व की यह जंग केवल मिसाइलों की नहीं, बल्कि नेतृत्व, विचारधारा, ऊर्जा और वैश्विक अर्थव्यवस्था की भी जंग है। आने वाले सप्ताह तय करेंगे कि यह संघर्ष सीमित रहता है या विश्वव्यापी संकट का रूप लेता है।


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