

रुद्रपुर की राजनीति में 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का संघर्ष नहीं, बल्कि विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच टकराव का आईना बनने जा रहा है। करोड़ों की लागत से बना रिंग रोड बाईपास, जिसे विधायक शिव अरोड़ा ने अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बताया था, अब सवालों के घेरे में है। जिस परियोजना को विकास की ‘अमर गाथा’ बनाकर जनता के सामने पेश किया जा रहा था, वह कुछ घंटों की हल्की बारिश में ही ध्वस्त होकर भ्रष्टाचार की परतें खोलने लगी।
यह विडंबना ही है कि जिस सड़क पर भविष्य की राजनीति की नींव रखी जानी थी, वही सड़क सत्ता की साख को डुबोने का कारण बनती दिख रही है। 10 एमएम की मामूली बारिश ने जिस तरह सड़क को धंसा दिया, उससे यह स्पष्ट हो गया कि निर्माण में गुणवत्ता से अधिक ‘कमीशन’ का ध्यान रखा गया।
इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ भी कम दिलचस्प नहीं रही। उधम सिंह नगर-नैनीताल के सांसद अजय भट्ट ने भी मीडिया के सामने यह कहने में देर नहीं लगाई कि यह परियोजना उनकी पहल पर केंद्र सरकार से स्वीकृत हुई। यानी सफलता का श्रेय लेने में सब आगे, लेकिन असफलता की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं।
2027 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस रिंग रोड का जमकर प्रचार किया गया। प्रशासनिक दबाव में कई बार मीडिया को बुलाकर परियोजना का महिमामंडन किया गया, लेकिन सच्चाई पहली ही बारिश में सामने आ गई। अब सवाल यह है कि जब हल्की बारिश में यह हाल है, तो मानसून की तेज बारिश में क्या स्थिति होगी? क्या यह सड़क जनता के लिए सुविधा बनेगी या दुर्घटनाओं का कारण?
विकास के नाम पर जनता को सपने दिखाना नई बात नहीं है, लेकिन उन सपनों का इतनी जल्दी टूट जाना निश्चित ही चिंताजनक है। अब जब विकास का यह मॉडल फेल होता दिख रहा है, तो राजनीतिक विमर्श एक बार फिर पुराने नारों की ओर मुड़ता नजर आ रहा है। “हिंदू खतरे में है” जैसे भावनात्मक मुद्दे फिर से हवा में तैरने लगे हैं।
रुद्रपुर की राजनीति में एक और दिलचस्प मोड़ यह है कि पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल की छवि आज भी मजबूत बनी हुई है। यदि वे मैदान में आते हैं, तो मुकाबला सिर्फ पार्टी बनाम पार्टी नहीं रहेगा, बल्कि व्यक्तित्व बनाम व्यक्तित्व हो जाएगा। ऐसे में यदि दोनों ओर ‘हिंदूवादी’ छवि वाले नेता आमने-सामने होते हैं, तो यह मुकाबला ‘नारे बनाम काम’ की असली परीक्षा बन सकता है।
कभी काशीपुर बायपास को लेकर भी बड़े दावे किए गए थे, लेकिन वह भी हास्य का विषय बनकर रह गया। यही स्थिति अब रुद्रपुर रिंग रोड की होती दिख रही है। विकास परियोजनाएं कागजों और भाषणों में जितनी मजबूत दिखाई देती हैं, जमीनी स्तर पर उतनी ही खोखली साबित हो रही हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रशासन की कार्रवाई भी अब चयनात्मक नजर आने लगी है। जहां आम लोगों के खिलाफ बुलडोजर तेजी से चलता है, वहीं सत्ता से जुड़े लोगों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों की दुकानों तक पहुंचते-पहुंचते वही बुलडोजर धीमा पड़ जाता है। यह दोहरा मापदंड न सिर्फ प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि जनता के विश्वास को भी कमजोर करता है।
2027 का चुनाव अब सिर्फ एक राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि जनता के धैर्य और समझदारी की परीक्षा भी होगा। क्या जनता विकास के नाम पर किए गए अधूरे वादों को नजरअंदाज कर भावनात्मक नारों के साथ जाएगी, या फिर जमीनी सच्चाई को आधार बनाकर अपना निर्णय लेगी?
रुद्रपुर की सड़कों पर पड़ा यह पानी सिर्फ बारिश का नहीं है, यह उस व्यवस्था का प्रतिबिंब है जिसमें विकास की परत के नीचे भ्रष्टाचार की गहराई छिपी होती है। अब देखना यह है कि इस पानी में कौन डूबता है—सत्ता, विपक्ष या फिर जनता का भरोसा।





