

रुद्रपुर में इन दिनों आस्था, उत्सव और अपनत्व के रंगों से सराबोर है। अटरिया मंदिर में लगने वाला पारंपरिक अटरिया मेला केवल एक धार्मिक आयोजन , लोकसंस्कृति, विश्वास और जनजीवन का जीवंत उत्सव बन चुका है। प्रतिदिन 10,000 से अधिक श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि मां अटरिया के प्रति लोगों की आस्था कितनी गहरी और अटूट है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
करीब ढाई एकड़ में फैले इस मेले की रौनक देखते ही बनती है। एक ओर मंदिर परिसर में श्रद्धालु भक्तिभाव से देवी के दर्शन कर रहे हैं, तो दूसरी ओर मेले में सजी दुकानों पर खरीदारी का अलग ही उत्साह नजर आता है। खास बात यह है कि यहां व्यापार में भी ईमानदारी और सादगी का अनूठा उदाहरण देखने को मिलता है—हर दुकान के सामने स्पष्ट रूप से लिखा है, “हर माल ₹10”, “हर माल ₹20” या “हर माल ₹50”। न मोलभाव की झंझट, न किसी प्रकार की ठगी—बस सादगी और भरोसे का व्यापार।
इस आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संगम में हमने भी अपने जीवनसाथी, हमारी अर्धांगिनी मोहनी बिष्ट के साथ मेले का आनंद लिया। चूड़ियों की खनक, बिंदियों की चमक, लिपस्टिक और सौंदर्य प्रसाधनों की रंगीन दुनिया—इन सबके बीच खरीदारी का अनुभव केवल वस्तुओं का लेन-देन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव बन गया। यह वह क्षण था जब आस्था और जीवन के छोटे-छोटे सुख एक साथ मिलकर एक मधुर स्मृति का रूप ले लेते हैं।
अटरिया मेला हमें यह भी सिखाता है कि आध्यात्मिकता केवल मंदिर की चौखट तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह हमारे व्यवहार, हमारे रिश्तों और हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी झलकती है। यहां का हर दृश्य—चाहे वह देवी के जयकारों से गूंजता मंदिर हो या मुस्कुराते हुए दुकानदार—मानो यह संदेश देता है कि सच्चा उत्सव वही है जिसमें मन की शांति और समाज का सामूहिक आनंद दोनों शामिल हों।
अगर आप रुद्रपुर या उसके आसपास हैं, तो इस अद्भुत मेले का अनुभव जरूर करें। यह केवल एक मेला नहीं, बल्कि आस्था, सादगी और जीवन के रंगों का ऐसा संगम है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बांध पाना मुश्किल है—इसे महसूस करना ही असली आनंद है।




