

रुद्रपुर के गांधी पार्क में आयोजित सरस मेला एक सांस्कृतिक उत्सव होना चाहिए था—लोकगीत, लोकसंस्कृति और जनभागीदारी का पर्व। लेकिन इस बार चर्चा कलाकारों की नहीं, बल्कि खाली कुर्सियों की रही। सवाल यह नहीं कि भीड़ आई या नहीं। सवाल यह है कि जब हजारों लोग मैदान के बाहर और पीछे खड़े थे, तब बीच की सफेद कुर्सियों के दो पूरे ब्लॉक खाली क्यों थे?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
आगे VVIP क्षेत्र—हाउसफुल।
सबसे पीछे लाल कुर्सियों का ब्लॉक—ठसाठस भरा।
बीच में सफेद कुर्सियों के दो ब्लॉक—सुरक्षा की अभेद्य दीवारों के बीच सुनसान!
“परिंदा भी पर न मार सके” वाली व्यवस्था
पुलिस और प्रशासन की मुस्तैदी देखने लायक थी। हर एंट्री गेट पर कड़ी निगरानी। बैरिकेडिंग ऐसी कि मानो सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, कोई उच्च स्तरीय सुरक्षा अभ्यास चल रहा हो। वीडियो में भी साफ दिखता है कि आम दर्शक सफेद कुर्सियों तक पहुँचने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहा था।
कल बंगाली गायकों का कार्यक्रम था—भीड़ भी ठीक-ठाक थी, परिवार आए थे, बच्चे थे, महिलाएँ थीं। लेकिन दृश्य अजीब था। लोग एक गेट से प्रवेश कर रहे थे, दूसरे से निकल रहे थे। लाल कुर्सियाँ भर चुकी थीं, लोग खड़े होकर कार्यक्रम देख रहे थे, लेकिन सफेद कुर्सियों तक पहुँच पाना मानो किसी वीआईपी पास से कम नहीं था।
सवाल उठता है—क्या सफेद कुर्सियाँ भी सुरक्षा श्रेणी में आती हैं?
मुख्यमंत्री की सभा और वही कहानी
यही दृश्य उस दिन भी था, जब पुष्कर सिंह धामी के आगमन पर सरस मेले का उद्घाटन हुआ और त्रिशूल चौक की स्थापना की गई। हजारों की भीड़ सड़कों पर उमड़ी थी। शहर में उत्साह था। लेकिन जब गांधी पार्क में मुख्यमंत्री का संबोधन शुरू हुआ—तो वही बीच की कुर्सियाँ खाली दिखीं।
सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल हुईं। विपक्ष ने तंज कसा। समर्थकों ने सफाई दी। लेकिन असली कारण क्या था?
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की पड़ताल में जो तथ्य सामने आए, वे चौंकाने वाले नहीं, बल्कि विडंबनापूर्ण हैं—व्यवस्था इतनी सख्त थी कि आमजन सफेद कुर्सियों तक पहुँच ही नहीं पा रहा था। सुरक्षा घेरे ऐसे थे कि लोग असहज महसूस कर रहे थे। परिणाम—कुर्सियाँ खाली।
प्रशासन का गणित बनाम जनता की मनोविज्ञान
नगर निगम, जिला प्रशासन और सत्ताधारी दल—तीनों को यह समझना होगा कि भीड़ केवल संख्या नहीं होती, वह मनोविज्ञान भी होती है। जब आप कार्यक्रम को तीन श्रेणियों में बाँट देते हैं—VVIP, सफेद कुर्सियाँ, और सबसे पीछे लाल कुर्सियाँ—तो आप अनजाने में सामाजिक दूरी भी निर्मित करते हैं।
लाल कुर्सियाँ भर गईं। लोग खड़े रहे। बच्चों को कंधे पर बैठाकर कार्यक्रम देखा। लेकिन बीच का ब्लॉक खाली रहा—क्योंकि वहाँ तक पहुँचने का रास्ता ‘अनुमति आधारित’ था।
क्या यह सांस्कृतिक आयोजन था या प्रोटोकॉल अभ्यास?
व्यंग्य की असली धार
कल्पना कीजिए—एक तरफ कलाकार मंच पर पूरी ऊर्जा से गा रहे हैं, सामने खाली कुर्सियाँ उनका स्वागत कर रही हैं, और पीछे खड़े लोग तालियाँ बजा रहे हैं। यह दृश्य किसी नाटक से कम नहीं।
यदि सुरक्षा इतनी ही सख्त रखनी थी कि कोई आम व्यक्ति सफेद कुर्सियों पर बैठ ही न सके—तो फिर वे कुर्सियाँ लगाई ही क्यों गईं?
क्या वे केवल कैमरे के फ्रेम के लिए थीं?
क्या वे “प्रबंधकीय सौंदर्य” का हिस्सा थीं?
या फिर यह मान लिया गया था कि भीड़ को नियंत्रित करना, उसे बैठाने से अधिक महत्वपूर्ण है?
“खाली कुर्सियाँ” – एक प्रतीक
खाली कुर्सियाँ केवल प्लास्टिक नहीं होतीं। वे संकेत होती हैं—संचार के अभाव का, जनसंपर्क की कमी का, या फिर अति-सुरक्षा के दुष्परिणाम का।
जब मुख्यमंत्री की सभा में बीच की कुर्सियाँ खाली दिखती हैं, तो राजनीतिक संदेश भी जाता है—चाहे वह वास्तविकता कुछ और ही क्यों न हो। जनता बाहर खड़ी हो और कैमरे के फ्रेम में खाली कुर्सियाँ दिखें—तो तस्वीर ही कथा बन जाती है।
प्रशासन को समझना होगा—भीड़ को नियंत्रित करना जरूरी है, लेकिन उसे असहज करना घातक है।
सुरक्षा बनाम सहभागिता
कोई भी यह नहीं कह रहा कि सुरक्षा में ढील दी जाए। मुख्यमंत्री का कार्यक्रम हो, तो सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। लेकिन सुरक्षा का अर्थ यह नहीं कि दर्शक स्वयं को ‘अवांछित’ महसूस करे।
जब एक साधारण नागरिक सफेद कुर्सी की ओर बढ़ता है और सुरक्षाकर्मी उसे रोक देते हैं—तो उसके मन में दो भाव आते हैं:
पहला—मैं यहाँ स्वागत योग्य नहीं हूँ।
दूसरा—यह कार्यक्रम मेरे लिए नहीं है।
यही मनोविज्ञान आगे चलकर दूरी बनाता है।
जिला प्रशासन से प्रश्न
यदि सफेद कुर्सियाँ आम जनता के लिए थीं, तो उन तक पहुँचने का स्पष्ट मार्ग क्यों नहीं था?
यदि वे विशेष श्रेणी के लिए थीं, तो उन्हें बीच में क्यों लगाया गया?
यदि सुरक्षा कारणों से उन्हें खाली रखना था, तो उन्हें हटाया क्यों नहीं गया?
नगर निगम और जिला प्रशासन को इन प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए।
भाजपा और सरकार के लिए संदेश
चूँकि राज्य में सरकार भाजपा की है, इसलिए जिम्मेदारी भी उन्हीं की बनती है। सांस्कृतिक आयोजनों को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाना एक बात है, लेकिन जनता को मनोवैज्ञानिक दूरी पर रखना दूसरी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की छवि एक जनप्रिय नेता की है। वे स्वयं जनता के बीच जाने में विश्वास रखते हैं। ऐसे में यदि उनके कार्यक्रम में खाली कुर्सियाँ दिखती हैं, तो वह उनकी लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि आयोजन प्रबंधन पर प्रश्नचिह्न है।
सोशल मीडिया का युग और दृश्य राजनीति
आज राजनीति भाषण से नहीं, दृश्य से बनती है। एक फोटो हजार शब्दों पर भारी पड़ती है। खाली कुर्सियों की तस्वीरें विपक्ष को अवसर देती हैं। जबकि वास्तविकता यह हो सकती है कि बाहर हजारों लोग मौजूद हों।
इसलिए प्रशासन को समझना होगा—कैमरा सुरक्षा घेरे को नहीं, दृश्य को रिकॉर्ड करता है।
कल का बंगाली कार्यक्रम – एक केस स्टडी
बंगाली कलाकारों का कार्यक्रम सफल था। भीड़ आई। तालियाँ बजीं। लेकिन फिर वही दृश्य—लाल कुर्सियाँ भरीं, सफेद खाली।
लोग आ रहे थे, जा रहे थे। बच्चों के साथ परिवार खड़े थे। लेकिन सुरक्षा का दायरा ऐसा कि सफेद ब्लॉक तक जाना ‘अनुचित’ समझा जा रहा था।
यह आयोजन की सफलता नहीं, प्रबंधन की विफलता का संकेत है।
यदि कुर्सियाँ खाली ही रखनी थीं—
तो उन पर “आरक्षित: केवल दृश्य प्रभाव हेतु” लिख देना चाहिए था।
यदि जनता को पीछे ही खड़ा रखना था—
तो बीच में कुर्सियों का द्वीप बनाकर दूरी क्यों दिखाई गई?
यदि सुरक्षा इतनी सख्त थी कि परिंदा भी पर न मार सके—
तो फिर सरस मेला को जनमेला कहने का औचित्य क्या है?
प्रशासन के लिए सुझाव
बैठने की श्रेणियाँ स्पष्ट रूप से चिह्नित हों।
आमजन के लिए मध्य ब्लॉक तक नियंत्रित लेकिन सहज पहुँच हो।
सुरक्षा और जनसहभागिता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।
कैमरा फ्रेम और वास्तविक भीड़ प्रबंधन में तालमेल रखा जाए।
खाली कुर्सियों पर व्यंग्यात्मक स्लोगन
“गांधी पार्क में कुर्सियाँ सुरक्षित थीं…
बस जनता से दूरी बनाए रखना अनिवार्य था!”
या
“जब सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी हो कि दर्शक भी संदिग्ध लगें—
तब खाली कुर्सियाँ ही सबसे आज्ञाकारी नागरिक बन जाती हैं।”
अंतिम प्रश्न
सरस मेला जनता का उत्सव है या प्रोटोकॉल का प्रयोगशाला?
यदि जनता बाहर खड़ी रहे और कुर्सियाँ भीतर खाली—
तो यह व्यवस्था की सफलता है या विडंबना?
गांधी पार्क की यह तस्वीर केवल एक आयोजन की कहानी नहीं कहती। यह उस मानसिकता को भी उजागर करती है, जहाँ सुरक्षा का अर्थ सहभागिता से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
और जब व्यवस्था इतनी सुदृढ़ हो जाए कि कुर्सियाँ तो सुरक्षित रहें, पर जनभावना आहत हो जाए—
तब समीक्षा आवश्यक है।




