

संपादकीय खबर:रुद्रपुर के स्वर्णिम हिल व्यू सिटी स्थित श्री राजेंद्र सिंह बोहरा एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती किरण बोहरा के निवास पर आयोजित खड़ी होली का सांस्कृतिक आयोजन उत्तराखंड की आत्मा में रची-बसी उस परंपरा का जीवंत रूप था, जिसे कुमाऊं और गढ़वाल पिंडर घाटी ने सदियों से संजोकर रखा है। यह वही खड़ी होली है, जिसकी स्वर-लहरियों में शास्त्रीय रागों की गरिमा, लोकजीवन की सहजता और सामाजिक एकता की गूंज एक साथ सुनाई देती है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
(अध्यक्ष: उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद, उत्तराखंड
शास्त्रीयता और लोक का अद्भुत संगम
उत्तराखंड की खड़ी होली मूलतः शास्त्रीय रागों—पीलू, भैरवी, काफी, खमाज और जोगिया—पर आधारित थी। यह बैठकी होली की तरह गंभीर और रागप्रधान होते हुए भी अधिक ऊर्जावान और सामूहिक होती थी। दादरा और कहरवा ताल की लय में ढोलक और हुड़का की संगत के साथ जब होलियार गोलाकार खड़े होकर स्वर साधते हैं, तो वातावरण स्वतः ही आध्यात्मिक और उल्लासपूर्ण हो उठता है।
ख“खड़ी होली” पारंपरिक वेशभूषा में सजे पुरुष और महिलाएं आजु ब्रज में होली रे रसिया…”—तो मानो ब्रज की छटा ही रुद्रपुर में उतर आई हो
‘दारका-दारी’ की विशिष्ट शैली
गढ़वाल के पिंडर क्षेत्र और कुमाऊंनी होली की गायकी में ‘दारका’ या ‘दारका-दारी’ शैली विशेष महत्व रखती है। इसका अर्थ केवल गीत गाना नहीं, बल्कि राग को उसकी पूर्ण गहराई और शास्त्रीय विस्तार के साथ प्रस्तुत करना है। एक ही पद को अलग-अलग गति, अलग-अलग भाव और लय परिवर्तन के साथ विस्तार देना, स्वरों में क्रमिक विचरण करना और भावों को गहराई से उकेरना—यही दारका शैली की पहचान है।
बोहरा निवास पर आयोजित इस होली में मंडली ने दारका-दारी की परंपरा का अनुपम प्रदर्शन किया। गीता बिष्ट अपने सहयोगी के साथ गीत के बोलों को तोड़कर, उनके भावों को विस्तृत कर और स्वर-साधना के माध्यम से श्रोताओं को जिस प्रकार मंत्रमुग्ध किया गया, वह खड़ी होली की शास्त्रीय गरिमा का प्रमाण था।
वसंत पंचमी से होली तक: घर-घर गूंजती परंपरा
कुमाऊं और गढ़वाल में खड़ी होली का प्रारंभ वसंत पंचमी से होता है और यह होली पर्व तक निरंतर चलती है। मंडलियां घर-घर जाकर होली गाती हैं। दिनभर अलग-अलग घरों में स्वर गूंजते हैं और सायंकाल किसी एक परिवार के यहां सामूहिक आयोजन होता है। इस वर्ष भी यही परंपरा निभाई जा रही है।
हर दिन की तरह आज भी मंडली दिनभर विभिन्न परिवारों के यहां होली गाते हुए शाम 6 बजे बोहरा परिवार के यहां पहुंची। ढोल, दमाऊं, हुड़का और ताल की संगत के साथ जब स्वर उठे तो लगा जैसे पहाड़ की घाटियां स्वयं यहां उपस्थित हों।
बोहरा परिवार का स्नेहिल आतिथ्य
श्रीमती किरण बोहरा एवं श्री राजेंद्र सिंह बोहरा द्वारा किया गया यह आयोजन केवल एक पारिवारिक उत्सव नहीं था, बल्कि रुद्रपुर के पर्वतीय समाज को एक सूत्र में पिरोने का स्नेहिल प्रयास था। होली की मंडली के स्वागत से लेकर भजन, जलपान और भोजन की पूर्ण व्यवस्था तक हर व्यवस्था आत्मीयता से परिपूर्ण रही।
जब मंडली किसी घर पहुंचती है तो वह घर केवल एक परिवार का नहीं रह जाता—वह पूरे समाज का आंगन बन जाता है। आज बोहरा निवास पर भी यही दृश्य था। सभी लोग मानो एक ही परिवार के सदस्य हों। बड़ों को सम्मान, समवयस्कों को स्नेह और बच्चों को आशीर्वाद—यही खड़ी होली की आत्मा है।
महिला होलियारों की सशक्त भागीदारी
इस आयोजन की विशेषता यह रही कि महिला होलियारों की भागीदारी अत्यंत सक्रिय और प्रेरणादायी रही। श्रीमती किरण बोहरा के साथ गीता बिष्ट, चंदा बम, सुधा पटवाल, सरोजिनी रावत, मोहिनी बिष्ट,नीलम कांडपाल, दीपा पहाड़ी, राधा बिष्ट, शोभा मिश्रा, भावना मेहरा, विनीता लखेडा और मीनू जोशी आदि सैकड़ो देवी तुल्य महिलाओं ने सामूहिक स्वर में होली गाकर वातावरण को मधुर बना दिया।
महिलाओं की स्वर लहरियों में जहां कोमलता थी, वहीं भावों की गहराई भी स्पष्ट झलक रही थी। पर्वतीय समाज में महिलाओं की यह सांस्कृतिक सहभागिता नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण
उपस्थित जनों में राजेंद्र बोहरा, गोपाल सिंह पटवाल, दिनेश बम, जगदीश बिष्ट, त्रिलोचन पनेरु, महेश कांडपाल, सहित अनेक गणमान्यजन मौजूद रहे। सभी ने मिलकर सामूहिक गान, संवाद और भोजन का आनंद लिया।
आज जब पर्वों का स्वरूप औपचारिकता में सिमटता जा रहा है, ऐसे में इस प्रकार का घर-घर जाकर होली गाना और सामूहिक रूप से किसी एक परिवार के यहां संध्या आयोजन करना सामाजिक सौहार्द का सशक्त संदेश देता है।
“जय पहाड़, जय पहाड़ी” का वास्तविक अर्थ
“जय पहाड़, जय पहाड़ी” केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि भावनात्मक एकता का सूत्र है। यह उद्घोष हमें अपनी जड़ों की याद दिलाता है। खड़ी होली के ऐसे आयोजन पर्वतीय समाज को भीतर से जोड़ते हैं। यहां कोई बड़ा-छोटा नहीं, सब एक परिवार हैं।
जब सभी लोग एक साथ बैठकर भजन-कीर्तन के बाद जलपान और भोजन ग्रहण करते हैं, तो वह केवल भोजन नहीं, बल्कि विश्वास और अपनत्व का आदान-प्रदान होता है।
निरंतरता की परंपरा
यह होली पर्व निरंतर चलता रहेगा। प्रतिदिन मंडली अलग-अलग परिवारों के यहां जाकर गीत गाएगी और शाम को सामूहिक आयोजन होगा। 3 मार्च को कोई आयोजन निर्धारित नहीं है, जबकि 4 मार्च को विधिवत होली मनाई जाएगी।
आज बोहरा परिवार के यहां जो सांस्कृतिक संध्या सजी, कल किसी अन्य परिवार के यहां सजेगी। यही इस परंपरा की खूबसूरती है—यह किसी एक घर की नहीं, पूरे समाज की होली है।
रंगों से अधिक रिश्तों का पर्व
खड़ी होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि हृदयों के मिलन का अवसर है। यह हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है, पीढ़ियों के बीच संवाद स्थापित करती है और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करती है।
श्री राजेंद्र सिंह बोहरा एवं श्रीमती किरण बोहरा का यह प्रयास निश्चित ही समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनका यह स्नेहिल आंगन सदैव प्रेम, समृद्धि और सांस्कृतिक एकता का केंद्र बना रहे।
होली मंगलमय हो।
समाज संगठित हो।
और रिश्तों के रंग कभी फीके न पड़ें।
जय पहाड़। जय




