

रुद्रपुर की पहचान यदि किसी एक सांस्कृतिक प्रतीक से जुड़ती है, तो वह है अटरिया मंदिर। यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि स्मृतियों, परंपराओं और पीढ़ियों की श्रद्धा का जीवंत केंद्र है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के बदायूं, बरेली, बिलासपुर और मुरादाबाद अंचल तक के श्रद्धालुओं की आस्था इससे जुड़ी रही है। अटरिया मंदिर की परिधि में स्थित भूमि को लेकर जब कुछ लोग उसे “खाली भूखंड” कहकर संबोधित करते हैं, तो वे वस्तुतः उस भावभूमि को नकार रहे होते हैं जिसमें लाखों लोगों की आस्था रची-बसी है।
मंदिर केवल गर्भगृह की चार दीवारें नहीं होता। मंदिर वह संपूर्ण क्षेत्र है, जहां श्रद्धा का स्पंदन है; जहां लोग मन्नतें मांगते हैं, जहां मेले लगते हैं, जहां पीढ़ियां माथा टेकती हैं। यदि कोई व्यक्ति बार-बार उस स्थान पर नमाज अदा करने का प्रयास करता है, और मना करने पर भी वही कृत्य दोहराता है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उद्देश्य क्या है—आस्था का सम्मान या टकराव का निर्माण?
यह भी उतना ही सत्य है कि यदि किसी महंत या पुजारी ने कानून हाथ में लिया, तो वह भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। कानून का शासन सर्वोपरि होना चाहिए। किंतु प्रश्न यह है कि जो लोग आज केवल पुजारी को “हिस्ट्रीशीटर” कहकर पूरा विमर्श वहीं समाप्त कर देना चाहते हैं, क्या वे उतनी ही मुखरता से उन संगठित अपराधियों के विरुद्ध आवाज उठाते हैं जो दूसरे राज्यों से आकर यहां सामाजिक संगठन बनाते हैं, मंच सजाते हैं, और सम्मान समारोहों के जरिए अपनी छवि का शोधन कर लेते हैं?
रुद्रपुर से लेकर देहरादून और पहाड़ तक, यह कोई छिपा तथ्य नहीं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान या झारखंड से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुछ लोग उत्तराखंड की शांत भूमि में शरण लेते हैं। वे संगठन बनाते हैं, मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री, विधायक, सांसद और शहर के प्रतिष्ठित जनों को मंच पर आमंत्रित करते हैं। 200-400 रुपये की शॉल और स्मृति-चिह्न के साथ फोटो खिंचते हैं, और तालियों की गड़गड़ाहट में उनका अतीत जैसे धुल जाता है। तब वही बुद्धिजीवी, वही कथित प्रगतिशील और वही सोशल मीडिया के योद्धा मौन क्यों हो जाते हैं?
क्या आस्था पर बहस करना आसान है और संगठित अपराध पर बोलना कठिन? क्या मंदिर की भूमि को “खाली भूखंड” कहना अधिक सुविधाजनक है, क्योंकि वहां से कोई आर्थिक लाभ या राजनीतिक संरक्षण नहीं मिलता?
अटरिया मंदिर का विवाद केवल धार्मिक टकराव का प्रश्न नहीं है; यह चयनात्मक सक्रियता का आईना है। जो लोग मंदिर परिसर में नमाज को “सांप्रदायिक सौहार्द” का प्रतीक बताने की कोशिश करते हैं, वे यह क्यों नहीं स्वीकारते कि सौहार्द पारस्परिक सम्मान से बनता है, एकतरफा अतिक्रमण से नहीं? यदि किसी मस्जिद की परिधि में जाकर कोई अन्य धार्मिक अनुष्ठान करने लगे, तो क्या वही लोग उसे भी “खाली भूखंड” कहकर वैध ठहराएंगे?
दूसरी ओर, सत्ता की भूमिका भी सवालों से परे नहीं है। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, उत्तराखंड में भी उसी दल की सरकार है। मंचों से हिंदुत्व के नारे बुलंद होते हैं, “जय श्री राम” के उद्घोष से भीड़ को उत्साहित किया जाता है। किंतु जब ऐसे प्रकरणों में एकतरफा एफआईआर दर्ज होती है, और हिंदू युवाओं पर ही कठोर धाराएं लगती हैं, तो यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि नारे और नीति के बीच यह दूरी क्यों?
कोटद्वार हो या अटरिया, यदि हर विवाद में पहले हिंदू युवाओं पर ही प्राथमिकी दर्ज हो जाती है, तो यह संदेश जाता है कि राजनीतिक नेतृत्व भावनाओं को उभारने में तो आगे है, पर सुरक्षा की गारंटी देने में पीछे। जयकारों से उत्साह तो मिलता है, पर न्याय की समानता से विश्वास बनता है।
यह भी सच है कि युवाओं को सावधान रहने की आवश्यकता है। वोट बैंक की राजनीति अक्सर भावनाओं को भड़काकर युवाओं को मोहरा बना देती है। जाति, वर्ग और उपवर्ग के नाम पर विभाजन की नीतियां—चाहे वे शिक्षा में हों या प्रशासन में—समाज को खांचों में बांटती हैं। “फूट डालो और राज करो” का सिद्धांत यदि किसी भी रूप में जीवित है, तो वह लोकतंत्र की आत्मा के लिए खतरा है।
जो दल स्वयं को हिंदुओं का मसीहा कहता है, उसकी कसौटी केवल नारे नहीं, बल्कि निष्पक्ष शासन है। यदि अपराधी सम्मानित होते रहें और आस्था से जुड़े सामान्य नागरिक कठघरे में खड़े किए जाएं, तो यह विडंबना है। यदि सरकारें वास्तव में हिंदू हितों की बात करती हैं, तो उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून सब पर समान रूप से लागू हो—न किसी के लिए विशेष कठोरता, न किसी के लिए विशेष उदारता।
अटरिया मंदिर का मुद्दा अंततः एक व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करता है—क्या हम अपनी आध्यात्मिक धरोहरों को केवल राजनीतिक बहस का उपकरण बनने देंगे? या हम यह स्वीकार करेंगे कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा—सभी की गरिमा पारस्परिक सम्मान से ही सुरक्षित रह सकती है?
समाज को चाहिए कि वह अपराधीकरण और आस्था के बीच स्पष्ट रेखा खींचे। यदि पुजारी ने कानून तोड़ा है, तो विधि अपना कार्य करे। यदि कोई जानबूझकर टकराव उत्पन्न करता है, तो उस पर भी समान रूप से कार्रवाई हो। परंतु चयनात्मक आक्रोश और अवसरवादी मौन—दोनों ही लोकतंत्र के लिए घातक हैं।
रुद्रपुर और उत्तराखंड की पहचान शांत सह-अस्तित्व की रही है। इसे बचाना केवल सरकार का दायित्व नहीं, समाज का भी कर्तव्य है। आस्था का सम्मान हो, पर कानून सर्वोपरि रहे। राजनीति हो, पर सिद्धांतों के साथ। और सबसे बढ़कर—युवाओं को यह समझना होगा कि भावनात्मक उकसावे की आग में जलकर वे किसी दल का वोट बैंक तो बन सकते हैं, पर अपने भविष्य के निर्माता नहीं।
इतिहास उन्हीं को याद रखता है, जो शोर से ऊपर उठकर न्याय, संतुलन और सत्य का पक्ष लेते हैं। अटरिया मंदिर का प्रकरण हमें यही सीख देता है कि आस्था की रक्षा केवल नारों से नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण आचरण और समान न्याय से होती है।




