

देहरादून। उत्तराखंड राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर जहां पूरा प्रदेश रजत जयंती वर्ष के उत्सव में डूबा हुआ है, वहीं राज्य आंदोलनकारियों के चेहरे पर भी नई उम्मीद की चमक लौट आई है। राज्य निर्माण के लिए जिन्होंने अपने प्राण, युवावस्था और जीवन समर्पित कर दिया, अब उन्हीं आंदोलनकारियों के पुनः चिन्हीकरण और पेंशन बढ़ोतरी को लेकर सरकार से बड़ी घोषणा की उम्मीद की जा रही है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद के उपाध्यक्ष सुभाष बर्थवाल ने इस दिशा में सरकार से महत्वपूर्ण वार्ता की है। उन्होंने बयान जारी कर बताया कि राज्य आंदोलनकारियों से जुड़ी लंबित मांगों — चिन्हीकरण, क्षैतिज आरक्षण, पेंशन वृद्धि — पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। गृह सचिव से उनकी हालिया बैठक में इन सभी विषयों पर ठोस चर्चा हुई है और 8 नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा कोई बड़ा निर्णय या घोषणा की जा सकती है।
सुभाष बर्थवाल ने कहा कि यह राज्य जनसंघर्षों के गर्भ से जन्मा है। माताओं, बहनों, युवाओं और पहाड़ के लोगों ने अपने त्याग और बलिदान से इसे गढ़ा है। ऐसे में राज्य आंदोलनकारियों का सम्मान और उनका सामाजिक-आर्थिक संरक्षण राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
परिषद के उपाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री से स्पष्ट मांग रखी है, सरकार से सहमति भी बन चुकी है कि लोकतंत्र सेनानियों की तर्ज पर प्रत्येक राज्य आंदोलनकारी को मासिक पेंशन दी जाए और वर्तमान में जो ₹5,000 या ₹7,000 पेंशन पा रहे हैं, उनमें समान पेंशन नीति के तहत वृद्धि की जाए। वृद्ध अवस्था में अधिकांश आंदोलनकारी आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, इसलिए यह पेंशन वृद्धि उनके लिए संजीवनी सिद्ध होगी।
यदि 8 नवंबर को मुख्यमंत्री धामी इस दिशा में कोई ठोस और ऐतिहासिक घोषणा करते हैं, तो न केवल राज्य आंदोलनकारियों की वर्षों पुरानी मांग पूरी होगी, बल्कि सम्मान परिषद के उपाध्यक्ष सुभाष बर्थवाल का रुतबा भी आंदोलनकारी वर्ग में और अधिक बढ़ जाएगा। यह परिषद के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि उनके अथक प्रयासों और संवाद के परिणामस्वरूप ही यह विषय दोबारा सरकार की प्राथमिकता सूची में आया है।
हालांकि, यदि अपेक्षानुरूप निर्णय नहीं होता है, तो स्वाभाविक रूप से असंतोष की लहर उठेगी, जिसका राजनीतिक और सामाजिक असर सरकार को स्वयं देखना होगा। आंदोलनकारी अब केवल सम्मान नहीं, बल्कि अपने हक की वास्तविक प्राप्ति चाहते हैं।
राज्य स्थापना दिवस पर पूरे प्रदेश में तहसील स्तर पर भी आंदोलनकारियों का सम्मान करने की तैयारी की जा रही है। कई आंदोलनकारी आज चलने-फिरने की अवस्था में नहीं हैं, ऐसे में प्रशासनिक अधिकारी उनके घर जाकर उन्हें सम्मानित करेंगे — यह कदम निश्चय ही एक संवेदनशील और प्रशंसनीय पहल है।
यह समय सरकार के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है। यदि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी रजत जयंती वर्ष में राज्य आंदोलनकारियों को “पेंशन वृद्धि” और “पुनः चिन्हीकरण” की सौगात देते हैं, तो वे न केवल आंदोलनकारियों का दिल जीतेंगे, बल्कि इस राज्य के इतिहास में “राज्य निर्माता मुख्यमंत्री” के रूप में दर्ज होंगे।
उत्तराखंड की रजत जयंती केवल जश्न का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है — यह वह क्षण है जब राज्य अपने मूल उद्देश्यों, “जनसंघर्ष, न्याय और समानता” की भावना की ओर लौट सकता है। यदि इस अवसर पर राज्य आंदोलनकारियों को उनका वास्तविक सम्मान और हक मिलता है, तो यह वर्ष इतिहास में “आंदोलनकारियों के स्वर्णिम सम्मान वर्ष” के रूप में अमर रहेगा।




