

रुद्रपुर, 12 फरवरी।होली जैसे प्रमुख त्योहार से पूर्व खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा ऊधम सिंह नगर में विशेष चेकिंग अभियान चलाया गया। खाद्य सुरक्षा आयुक्त उत्तराखण्ड सचिन कुर्वे के निर्देश पर कुमाऊं मंडल के खाद्य सुरक्षा उपायुक्त डा. राजेन्द्र सिंह कठायत के नेतृत्व में टीम ने पुलभट्टा-किच्छा स्थित मिल्क चिलिंग सेंटर, शक्तिफार्म की ऑयल व फ्लोर मिल तथा सितारगंज की शीतल पेय वितरक फर्मों पर छापेमारी कर दूध, सरसों तेल, आटा और कोल्ड ड्रिंक के कुल 6 नमूने जांच हेतु प्रयोगशाला भेजे।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
निरीक्षण के दौरान मिल्क चिलिंग यूनिट में गंदगी और मानकों के उल्लंघन पाए जाने पर नोटिस जारी किया गया। शक्तिफार्म की श्री श्याम एजेंसीज के पास एफएसएसएआई लाइसेंस न होने पर विधिक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। संबंधित आपूर्तिकर्ता फर्मों के विरुद्ध भी न्यायालय में वाद दायर करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
अभियान में ललित मोहन पाण्डे (सहायक आयुक्त), अपर्णा साह (वरिष्ठ खाद्य सुरक्षा अधिकारी), आशा आर्या (खाद्य सुरक्षा अधिकारी) सहित अन्य अधिकारी शामिल रहे।
पर सवाल यह है…
क्या मिलावट केवल होली और दीपावली जैसे त्योहारों में ही दिखाई देती है?
क्या खाद्य सुरक्षा विभाग की सक्रियता केवल “सीजनल” है?
रुद्रपुर शहर की वास्तविकता कुछ और कहानी कहती है। सूत्रों के अनुसार—
दिल्ली से प्रतिदिन प्रातः 4 बजे के आसपास दूध और पनीर की बड़ी खेप रुद्रपुर पहुंचती है।
दिल्ली में निर्मित डेयरी उत्पाद उत्तराखंड के बाजारों में खुलेआम बिक रहे हैं।
रुद्रपुर के 40 वार्डों में 300 से अधिक डेयरी केंद्र संचालित हैं।
पनीर, दूध और अन्य डेयरी उत्पादों का स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा है।
शहर की लगभग 80% मिठाई और खाद्य सामग्री फैक्ट्री आधारित उत्पादन से बाजार में आ रही है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या इन इकाइयों का नियमित निरीक्षण होता है?
क्या इन सभी के पास वैध एफएसएसएआई लाइसेंस है?
क्या प्रतिदिन बनने और बिकने वाले पनीर, मावा और दूध की गुणवत्ता की जांच होती है?
जनस्वास्थ्य से खिलवाड़?
त्योहारों के समय दिखावटी कार्रवाई कर कुछ नमूने उठाना पर्याप्त नहीं है। यदि वाकई मिलावट पर अंकुश लगाना है तो—
वर्षभर नियमित और आकस्मिक निरीक्षण आवश्यक है।
बाहरी राज्यों से आने वाले दूध और डेयरी उत्पादों की सीमा पर ही जांच हो।
हर वार्ड में संचालित डेयरी इकाइयों का सत्यापन सार्वजनिक किया जाए।
जांच रिपोर्ट सार्वजनिक पोर्टल पर डाली जाए।
मध्यप्रदेश की तर्ज पर यदि व्यापक और पारदर्शी जांच हो जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।
कटघरे में कौन?
यह केवल एक-दो फैक्ट्रियों का मामला नहीं है।
यह जिम्मेदारी है—
खाद्य सुरक्षा विभाग
नगर निगम प्रशासन
जिला प्रशासन
एफएसएसएआई लाइसेंसिंग प्राधिकरण
और स्थानीय निगरानी तंत्र की
यदि शहर में मिलावट का जाल फैला है तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
हम आरोप नहीं, आगाह कर रहे हैं
यह लेख किसी व्यक्ति विशेष पर संदेह नहीं, बल्कि व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है।
यदि सब कुछ मानकों के अनुरूप है तो विभाग को चाहिए कि—
सभी लाइसेंसधारी इकाइयों की सूची सार्वजनिक करे।
पिछले एक वर्ष की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करे।
दोषी पाए गए प्रतिष्ठानों के नाम उजागर करे।
जनता को केवल टोल-फ्री नंबर 18001804246 देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता और निरंतर निगरानी जरूरी है।
होली के रंगों से पहले यदि दूध और पनीर में मिलावट के धब्बे हैं, तो यह केवल कानून का नहीं, जनस्वास्थ्य का प्रश्न है।
त्योहार बीत जाने के बाद यदि निरीक्षण बंद हो जाते हैं, तो यह अभियान नहीं, औपचारिकता है।
अब समय है कि अधिकारी स्वयं आगे आकर स्पष्ट करें—
क्या मिलावट केवल “सीजन” में होती है, या पूरे साल?
रुद्रपुर की जनता जवाब चाहती है।




