रुद्रपुर में मंदिर, नज़ूल भूमि और सत्ता का टकरावचंद्र देव मंदिर: आस्था से सत्ता और संपत्ति की जंग तक

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रुद्रपुर (उधम सिंह नगर)।
रुद्रपुर का चंद्र देव मंदिर अब केवल श्रद्धा और पूजा का स्थल नहीं रह गया है। यह मंदिर आज नज़ूल भूमि, स्वामित्व के दावे, सामाजिक अधिकार और राजनीतिक हस्तक्षेप के टकराव का केंद्र बन चुका है। जिस स्थल को भुज (भुर्जी) समाज दशकों से अपना इष्ट देव स्थल मानता आ रहा है, वहां अब सवाल आस्था से आगे बढ़कर कानून, प्रशासन और सत्ता की प्राथमिकताओं पर खड़े हो गए हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
नज़ूल भूमि पर मंदिर, स्वामित्व पर विवाद
विवाद की जड़ नज़ूल भूमि है, जिस पर चंद्र देव मंदिर का निर्माण हुआ। आरोप है कि के.पी. गंगवार द्वारा इस भूमि पर निर्माण कराया गया और बाद में उनकी पत्नी काजल गंगवार ने मंदिर और भूमि पर स्वामित्व का दावा ठोक दिया। दूसरी ओर, भुज समाज का कहना है कि यह मंदिर वर्षों से उनकी आस्था का केंद्र रहा है और किसी निजी व्यक्ति की संपत्ति नहीं हो सकता।
पुजारी की पिटाई और वायरल वीडियो
मामले ने तब तूल पकड़ लिया जब मंदिर के पुजारी और एक महिला के साथ कथित रूप से सार्वजनिक मारपीट का वीडियो सामने आया। वीडियो के वायरल होते ही शहर में आक्रोश फैल गया। सवाल उठे कि क्या धार्मिक स्थल पर दबंगई के जरिए दावे मनवाए जा रहे हैं और क्या कानून व्यवस्था केवल तमाशबीन बनकर रह गई है?
हाई कोर्ट के आदेश और अवहेलना के आरोप
मंदिर प्रकरण में माननीय हाई कोर्ट द्वारा यथास्थिति बनाए रखने के आदेश भी सामने आए, लेकिन इसके बावजूद हस्तक्षेप और गतिविधियों को लेकर आरोप लगते रहे। स्थानीय पुलिस चौकी की भूमिका पर भी उंगलियां उठीं कि क्या न्यायालय के आदेशों का पूर्ण पालन कराया गया या दबाव में आंखें मूंद ली गईं।
विधायक शिव अरोड़ा की एंट्री
विवाद में नया मोड़ तब आया जब रुद्रपुर विधायक शिव अरोड़ा स्वयं मैदान में उतरे। उन्होंने इसे हिंदू आस्था और समाज के अधिकार से जोड़ते हुए मौके पर पहुंचकर यथास्थिति बहाल कराने की बात कही। विधायक की मौजूदगी में मंदिर परिसर में जयकारों और शक्ति प्रदर्शन के दृश्य सामने आए, जिसने बहस को और तेज कर दिया—क्या यह आस्था की रक्षा थी या राजनीति का खुला प्रदर्शन?
आस्था बनाम कानून?
पूरा प्रकरण एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है—क्या कानून सर्वोपरि है या राजनीतिक प्रभाव?
यदि भूमि नज़ूल है तो उस पर स्वामित्व का निर्णय न्यायालय और प्रशासन का विषय है, न कि सड़क पर शक्ति प्रदर्शन का। वहीं, यदि मंदिर दशकों से समाज की आस्था का केंद्र रहा है, तो उसकी सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना भी राज्य की जिम्मेदारी है।
प्रशासन की अग्निपरीक्षा
चंद्र देव मंदिर विवाद अब केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रहा। यह रुद्रपुर में भूमि प्रबंधन, धार्मिक स्थलों की स्थिति, और सत्ता–प्रशासन के रिश्ते की अग्निपरीक्षा बन गया है। जनता की नजर अब प्रशासन और न्यायपालिका पर है—क्या निष्पक्ष जांच और कानूनसम्मत समाधान निकलेगा या यह मामला भी प्रभाव और दबाव की भेंट चढ़ जाएगा।
फिलहाल, चंद्र देव मंदिर रुद्रपुर में आस्था, संपत्ति और सत्ता के टकराव का प्रतीक बन चुका है—जहां हर कदम पर यह सवाल गूंज रहा है कि राज चलेगा या कानून?
✍️ अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
(उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी)


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