

कोटद्वार में सात दिन के भीतर 104 लोगों को आवारा कुत्तों द्वारा काटे जाने की घटनाएं किसी एक शहर की विफलता नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के शहरी तंत्र की गंभीर लापरवाही की तस्वीर हैं। यह आंकड़ा केवल अस्पताल में दर्ज मामलों का है, जबकि हकीकत इससे कहीं अधिक भयावह हो सकती है। स्थिति यह है कि कोटद्वार शहर, विकास नगर, लकड़ी पड़ाव, मानपुर, लालपानी, ध्रुवपुर, कलालघाटी, झंडीचौड़ और बालासौड़ जैसे क्षेत्रों में रोजाना 15 से 20 लोग बेस चिकित्सालय पहुंच रहे हैं। इसके बावजूद नगर निगम की नींद नहीं खुल रही।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यही कहानी उधम सिंह नगर के रुद्रपुर में भी दोहराई जा रही है। बीते दिनों रुद्रपुर के एक रिहायशी इलाके में स्कूल जा रहे एक किशोर पर आवारा कुत्तों के झुंड ने हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल बच्चा जिला अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उसे एंटी-रैबीज इंजेक्शन लगाए गए। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने पहले भी नगर निगम से कई बार शिकायत की थी, लेकिन केवल आश्वासन ही मिले। यह घटना बताती है कि आवारा कुत्तों का खतरा अब केवल बड़ी उम्र के लोगों तक सीमित नहीं, बल्कि बच्चों के लिए भी जानलेवा बन चुका है।
नैनीताल जिले में हालात और भी चिंताजनक हैं। पर्यटन नगरी होने के बावजूद यहां भी आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पर कोई ठोस नीति नजर नहीं आती। माल रोड, तल्लीताल और भीमताल जैसे क्षेत्रों में पर्यटक तक इनका शिकार बन रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार कुत्तों के झुंड रात के समय राहगीरों पर हमला कर देते हैं, जिससे डर का माहौल बन गया है। सवाल यह है कि जब नैनीताल जैसे वीआईपी और पर्यटन केंद्र सुरक्षित नहीं हैं, तो छोटे शहरों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि समस्या सबको दिख रही है, पीड़ित रोज सामने आ रहे हैं, अस्पतालों में रैबीज इंजेक्शन की खपत लगातार बढ़ रही है, लेकिन नगर निगम, नगर पालिकाएं और जिला प्रशासन केवल फाइलों में योजनाएं बनाकर चैन की चादर ओढ़े बैठे हैं। कभी नसबंदी अभियान की बात होती है, कभी टीकाकरण की, लेकिन जमीन पर नतीजा शून्य है।
यह भी एक कड़वा सच है कि शहरों में खुले में पड़े कूड़े, होटल-रेस्टोरेंट का बिना नियंत्रण के कचरा और स्लॉटर वेस्ट आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। प्रशासन अगर चाहे तो सख्ती से कूड़ा प्रबंधन लागू कर, नियमित नसबंदी और टीकाकरण से इस समस्या पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जब तक कोई बड़ी मौत नहीं हो जाती, तंत्र हर बार “सब ठीक है” का ढोल पीटता रहता है।
कोटद्वार के 104 पीड़ित, रुद्रपुर का घायल बच्चा और नैनीताल में डरे हुए पर्यटक — ये तीनों घटनाएं एक ही सवाल खड़ा करती हैं: क्या आम आदमी की सुरक्षा अब भी प्रशासन की प्राथमिकता में नहीं है? अगर अब भी समन्वित अभियान नहीं चला, तो यह संकट केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाएगा।




