“बल्ला घूमा मैदान में, पर कानून व्यवस्था क्लीन बोल्ड!”

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रुद्रपुर,देहरादून के महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज में जब पुष्कर सिंह धामी ने क्रिकेट बॉल पर शॉट लगाया, तो तालियों की गूंज में मानो उत्तराखंड “खेल प्रदेश” बनता हुआ दिखाई दिया। मंच पर भाषणों में अनुशासन, टीमवर्क और नेतृत्व की बातें गूंज रही थीं—और मैदान के बाहर प्रदेश अपनी ही “अनियंत्रित पारी” खेल रहा था।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


क्रिकेट के इस चमचमाते उद्घाटन के बीच सवाल यह है कि क्या यह वही उत्तराखंड है, जहां देहरादून में अपराधों की बाउंसर लगातार सिर पर लग रही है? जहां रुद्रपुर में लावारिस लाशें “नो बॉल” की तरह बार-बार सामने आ रही हैं और कोई अंपायर उन्हें रोकने वाला नहीं दिखता?
मैदान में “दून डेयरडेविल्स” और “दून सुपर जायंट्स” जीत की पटकथा लिख रहे थे, लेकिन असली मैच तो सड़कों पर चल रहा है—जहां भू-माफिया बिना विकेट गंवाए चौके-छक्के जड़ रहे हैं। यहां कानून की फील्डिंग ढीली है, और व्यवस्था बार-बार कैच छोड़ रही है।
मुख्यमंत्री खिलाड़ियों के बीच जाकर उत्साह बढ़ा रहे थे—यह अच्छी बात है। लेकिन क्या कभी वही उत्साह अपराध से जूझते आम नागरिकों के बीच भी दिखाई देगा? क्या “फिट इंडिया” के साथ “सेफ उत्तराखंड” का भी कोई अभियान चलेगा?
विडंबना देखिए—एक ओर युवा क्रिकेट में भविष्य तलाश रहे हैं, दूसरी ओर वही युवा अपराध, नशे और बेरोजगारी के दलदल में फंसते जा रहे हैं। खेल के मैदान में “मैन ऑफ द मैच” चुना जा रहा है, लेकिन समाज में “विलेन ऑफ द सिस्टम” कौन है—इसका जवाब कोई नहीं दे रहा।
यह क्रिकेट टूर्नामेंट भले ही “मंजूल सिंह मांजिला स्मृति” में हो, लेकिन असली स्मृति तो उन अनगिनत घटनाओं की बन रही है, जो रोज अखबारों की सुर्खियां बनती हैं और फिर फाइलों में दफन हो जाती हैं।
अंत में सवाल सीधा है—
क्या उत्तराखंड क्रिकेट खेलेगा या कानून-व्यवस्था की टूटी पिच पर यूं ही विकेट गिराता रहेगा?


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