

किच्छा की सड़कों पर हुई यह दर्दनाक घटना केवल एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक संवेदनहीनता का आईना है, जो आज धीरे-धीरे हमारी व्यवस्था और मानसिकता दोनों में घर कर चुकी है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
एक ओर सरकार और प्रशासन लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को तुरंत अस्पताल पहुंचाना हर नागरिक का कर्तव्य है, वहीं दूसरी ओर इस घटना में जो सामने आया, वह इस पूरे अभियान की विफलता को उजागर करता है।
रामवीर, जो एक साधारण फैक्ट्री कर्मी था, अपने रोजमर्रा के काम से घर लौट रहा था। उसे क्या पता था कि हाईवे पर लापरवाही से दौड़ रही एक ट्रैक्टर-ट्रॉली उसकी जिंदगी को यूं बेरहमी से कुचल देगी। हादसा अपने आप में दुखद था, लेकिन उससे भी अधिक भयावह वह अमानवीय व्यवहार था, जो दुर्घटना के बाद सामने आया।
ट्रैक्टर-ट्रॉली चालक और उसके साथियों ने घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के बजाय स्वयं ही “डॉक्टर” बनकर यह फैसला कर लिया कि वह मर चुका है। इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है—शव को छिपाने का प्रयास, सबूत मिटाने की कोशिश और मानवता को दफनाने का घिनौना कृत्य।
घटनास्थल पर मिला रामवीर के हाथ का पंजा इस क्रूरता की मूक गवाही दे रहा था। यह केवल एक शरीर का अंग नहीं था, बल्कि उस समाज की कटी हुई संवेदनाओं का प्रतीक था, जो अब दर्द को महसूस करना भूल चुका है।
सीसीटीवी फुटेज में कैद गतिविधियां इस पूरे घटनाक्रम को और भी संदिग्ध बनाती हैं। दुर्घटना के बाद मौके पर लोडर मशीन और अन्य वाहनों का पहुंचना, फिर शव को दबाने की आशंका—ये सब दर्शाते हैं कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित अपराध की ओर इशारा करता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून का डर अब पूरी तरह खत्म हो चुका है?
इस घटना का दूसरा पहलू भी उतना ही गंभीर है—रात के समय ओवरलोड और ओवरहाइट ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की दौड़। सीसीटीवी में जिस तरह भूसे से भरी ट्रालियों के बीच एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ दिखाई दी, वह सीधे-सीधे प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है।
क्या यह संभव है कि इतनी बड़ी संख्या में ओवरलोड ट्रैक्टर-ट्रॉलियां बिना किसी रोक-टोक के सड़कों पर दौड़ती रहें और पुलिस को इसकी भनक तक न लगे? या फिर यह मान लिया जाए कि यह सब कुछ “जानबूझकर नजरअंदाज” किया जा रहा है?
यह घटना केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है, जो न तो नियमों का पालन सुनिश्चित कर पा रही है और न ही नागरिकों में संवेदनशीलता जगा पा रही है।
आज जरूरत केवल कड़ी कार्रवाई की नहीं, बल्कि एक व्यापक आत्ममंथन की है। समाज को यह समझना होगा कि दुर्घटना में घायल व्यक्ति की मदद करना केवल कानून नहीं, बल्कि मानवता का मूल धर्म है। वहीं प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि सड़कों पर इस तरह की लापरवाही और अवैध गतिविधियों पर सख्ती से अंकुश लगे।
किच्छा की यह घटना एक चेतावनी है—अगर अब भी हम नहीं जागे, तो अगला “रामवीर” कोई भी हो सकता है।
(संपादकीय : मानवता तभी जिंदा रह सकती है, जब हम दूसरों के दर्द को अपना समझें, वरना ऐसी घटनाएं केवल खबर बनकर रह जाएंगी और संवेदनाएं हमेशा के लिए मर जाएंगी।)




