

भारतीय राजनीति में विचारधाराओं की यात्रा अक्सर घोषणापत्रों, आंदोलनों और नारों से होती रही है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस यात्रा को कांस्य और पत्थर का स्थायित्व भी मिलने लगा है। अब विचार केवल भाषणों में नहीं, बल्कि 65 फीट ऊंची मूर्तियों में खड़े होकर जनता को निहार रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने भी इस सांस्कृतिक-राजनीतिक शिल्प में प्रवेश करते हुए अपने “शिखर पुरुषों” को शाब्दिक रूप से शिखर पर स्थापित करने का निर्णय लिया है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
लखनऊ में 65 एकड़ भूमि पर 230 करोड़ रुपये की लागत से बना “राष्ट्र प्रेरणा स्थल” इसी राजनीति का भव्य उदाहरण है, जहां अटल बिहारी वाजपेयी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय—तीनों 65-65 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमाओं में एक साथ खड़े हैं। संयोग देखिए—ऊंचाई भी उतनी ही, जितनी पार्टी की वैचारिक आकांक्षा।
अटल जी के जन्म शताब्दी वर्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस स्थल का उद्घाटन होना इस संदेश को और स्पष्ट करता है कि यह केवल पार्क नहीं, बल्कि पार्टी की वैचारिक आत्मकथा है—जिसे अब पत्थर में गढ़ दिया गया है।
जब विचारधारा मूर्ति बन जाए
बीजेपी के लिए ये तीन नाम केवल नेता नहीं, बल्कि तीन स्तंभ हैं—
श्यामा प्रसाद मुखर्जी : एक देश, एक संविधान, एक ध्वज
दीनदयाल उपाध्याय : अंत्योदय और एकात्म मानववाद
अटल बिहारी वाजपेयी : राजनीति में नैतिकता और राष्ट्रीय नेतृत्व
इन तीनों को एक ही परिसर में स्थापित करना यह बताता है कि पार्टी अपनी वैचारिक यात्रा को अब “टाइमलाइन” नहीं, “टाइमलेस” बनाना चाहती है।
दिलचस्प यह है कि कभी उत्तर प्रदेश में ही बसपा शासनकाल में जब विशाल पार्कों और मूर्तियों की राजनीति शुरू हुई थी, तब यही सवाल उठते थे—“क्या विकास की जगह मूर्तियां?”
आज वही सवाल मुस्कान के साथ दोहराया जा रहा है, फर्क बस इतना है कि अब मूर्तियों के साथ ‘मिशन स्टेटमेंट’ भी जुड़ा है।
श्यामा प्रसाद से धारा 370 तक : मूर्ति के पीछे की राजनीति
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा केवल इतिहास नहीं, एक राजनीतिक दावा है। जनसंघ से लेकर भाजपा तक, कश्मीर को लेकर जो वैचारिक संघर्ष चला, वह 2019 में धारा 370 की समाप्ति के साथ एक निष्कर्ष तक पहुंचा।
अब जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी 65 फीट ऊंचे होकर खड़े हैं, तो संदेश साफ है—
“जिस विचार को हमने जिया, उसे हमने पूरा किया।”
यह मूर्ति केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रमाणपत्र है।
दीनदयाल उपाध्याय : अंत्योदय का कांस्य संस्करण
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मूर्ति उस राजनीति की प्रतीक है, जो सत्ता से पहले समाज को देखती है—या कम से कम देखने का दावा करती है।
उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, जनधन, मुफ्त राशन, पीएम आवास—ये सभी योजनाएं अब सरकारी फाइलों से निकलकर मूर्ति के चरणों में रखी हुई प्रतीत होती हैं, मानो कह रही हों—
“देखिए, हमने अंत्योदय को मूर्त रूप दे दिया।”
दीनदयाल जी के जीवन में सत्ता कभी केंद्र में नहीं थी, लेकिन आज उनकी प्रतिमा सत्ता के केंद्र में खड़ी है—यह भी भारतीय राजनीति का एक रोचक विरोधाभास है।
अटल जी : कविता से कांस्य तक
अटल बिहारी वाजपेयी शायद उन चुनिंदा नेताओं में से हैं, जिनकी स्वीकार्यता पार्टी की सीमाओं से बाहर भी है। कवि, पत्रकार, वक्ता, प्रधानमंत्री—उनका जीवन स्वयं में एक राजनीतिक साहित्य था।
अब वही साहित्य कांस्य में बदल गया है।
अटल जी की मूर्ति दरअसल उस राजनीति की याद दिलाती है, जब विरोध में भी गरिमा होती थी, जब संसद में तालियां विपक्ष के लिए भी बजती थीं, और जब भाषणों में कटाक्ष के साथ करुणा भी होती थी।
और अब रुद्रपुर…
लखनऊ की मूर्तियों की गूंज अब रुद्रपुर तक आ पहुंची है।
अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर नगर निगम परिसर में आयोजित प्रदर्शनी, महापौर विकास शर्मा की घोषणा और वरिष्ठ नेताओं का सम्मान—यह सब मिलकर संकेत देता है कि कांस्य यात्रा अब महानगरों तक सीमित नहीं रहेगी।
महापौर द्वारा आवास विकास स्थित पार्क में अटल जी की विशाल मूर्ति और एक मार्ग के नामकरण की घोषणा ने शहर की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।
हालांकि एक सवाल अब भी हवा में तैर रहा है—
“मूर्ति आखिर किस चौराहे पर लगेगी?”
रुद्रपुर का चौराहा-इतिहास और गांधी पार्क की नियति
रुद्रपुर का इतिहास गवाह है कि जब भी किसी नए महापुरुष की मूर्ति किसी चौराहे पर स्थापित होती है, तो किसी पुरानी मूर्ति को “सम्मानपूर्वक” गांधी पार्क में स्थानांतरित कर दिया जाता है।
गांधी पार्क अब पार्क कम और “मूर्ति संग्रहालय” ज्यादा लगता है—
जहां हर शासन की स्मृति खड़ी है, कुछ मुस्कुराते हुए, कुछ उपेक्षित भाव में।
अब यदि अटल जी की मूर्ति किसी प्रमुख चौराहे पर स्थापित होती है, तो स्वाभाविक प्रश्न है—
“अब गांधी पार्क की शोभा कौन-सी नई मूर्ति बढ़ाएगी?”
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि वह मूर्ति कौन-सी होगी, लेकिन रुद्रपुर की राजनीति में कल्पनाओं की कमी कभी नहीं रही।
व्यंग्य यहीं है…
राजनीति में मूर्तियां लगना नई बात नहीं है, नई बात यह है कि अब मूर्तियों के साथ पूरा वैचारिक पाठ्यक्रम भी जुड़ गया है।
आज मूर्ति केवल देखने की चीज नहीं रही— वह बयान है, वह संदेश है, वह रणनीति है।
और जनता?
वह हमेशा की तरह पूछ रही है— “मूर्ति के नीचे बैठने की जगह होगी या नहीं?”
“पार्क में लाइट जलेगी या नहीं?”
“सफाई रहेगी या नहीं?”
क्योंकि अंततः लोकतंत्र में मूर्ति चाहे 65 फीट की हो,
नजरें तो नीचे खड़े आम आदमी पर ही टिकी रहती हैं।
अंत में…
बीजेपी ने अपने शिखर पुरुषों की मूर्तियां यूं ही नहीं बनाईं। यह केवल अतीत की पूजा नहीं, बल्कि वर्तमान की राजनीति और भविष्य की रणनीति है।
लखनऊ से लेकर रुद्रपुर तक, कांस्य में ढली ये प्रतिमाएं आने वाली पीढ़ियों को इतिहास बताएंगी—
और वर्तमान को यह याद दिलाती रहेंगी कि
राजनीति में विचार जब ऊंचे होते हैं, तो मूर्तियां भी ऊंची बनती हैं।
अब देखना यह है कि रुद्रपुर के किस चौराहे पर अटल जी खड़े होकर मुस्कुराएंगे—
और गांधी पार्क में अगली “ऐतिहासिक शिफ्टिंग” किसकी होगी।
राजनीति में सवाल हमेशा चलते रहते हैं,
मूर्तियां खामोश रहती हैं,
और व्यंग्य…




