

उत्तराखंड के लोकनृत्य — परंपरा, आध्यात्म, सामाजिकता और सामुदायिक चेतना की अनंत यात्रा

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
उत्तराखंड की आत्मा को यदि किसी एक शब्द में बांधा जाए तो वह है— “लोक”। देवभूमि कहलाने वाला यह पर्वतीय प्रदेश जितना धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ा है, उतना ही समृद्ध है अपने गीतों, वाद्यों और नृत्यों की धरोहरों से। यहाँ का हर गांव, हर घाटी, हर त्योहार और हर सुख-दुख एक ताल, एक लय और एक गति से जुड़ा हुआ है। नृत्य यहाँ केवल मनोरंजन या कला नहीं— बल्कि सामुदायिक जीवन, अध्यात्म, इतिहास और भावनाओं का जीवंत दस्तावेज है।
उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ— दोनों संभाग अपनी‐अपनी पहचान और शैलियों के साथ लोकनृत्यों की ऐसी दुनिया रचते हैं, जो पीढ़ियों को जोड़ती है, मनुष्यों को एक करती है, और सामाजिक मूल्यों को जीवित रखती है। इन नृत्यों में पहाड़ का जीवन बोलता है— खेतों की बोआई, फसलों की कटाई, प्रेम-विरह, लोककथाएं, युद्ध वीरता, ऋतुओं का चक्र, मृत्यु-विचार, और देवताओं-पूर्वजों का आशीर्वाद।
लोकनृत्यों की सामुदायिक आत्मा
उत्तराखंड के नृत्य व्यक्तिगत कौशल से अधिक सामूहिक ऊर्जा और एकता पर आधारित होते हैं। झोड़ा, चांचरी, झुमैलो, चौफुला, मंडाण जैसे नृत्य केवल कदमों का मेल नहीं, बल्कि हाथों में हाथ डालकर साथ चलने की मनोवृत्ति हैं। जाति-भेद, वर्ग-भेद, संपन्नता-दरिद्रता— सब इन नृत्यों में धुल जाते हैं।
एक समय था जब नृत्य गाँवों की अदालत था— वहीँ पर लोग मिलते थे, सुलह होती थी, निर्णय होते थे और रिश्ते बनते-बिगड़ते-जुड़ते थे। इसलिए उत्तराखंड का लोकनृत्य केवल संस्कृति नहीं— सामुदायिक संवाद की परंपरा है।
प्रमुख लोकनृत्य और उनका दार्शनिक–सामाजिक अर्थ।
- झोड़ा — एकता का विराट वृत
झोड़ा का गोलाकार घेरा प्रतीक है— मानव जीवन के चक्र, प्रकृति की निरंतरता और सामूहिक चेतना का।
जब महिलाएँ और पुरुष एक-दूसरे का हाथ थामकर तालबद्ध गति में डोलते हैं, तब जैसे पूरे समाज की अलग-अलग धड़कन एक महा-हृदय बनकर धड़कने लगती है।
ऋतुओं के उत्सव और शादियों से लेकर विजय उत्सव और पवित्र आयोजनों तक— झोड़ा हर खुशी का साझा रूप है।
- छोलिया — शौर्य और अस्मिता का नृत्य
कुमाऊँ की वीरभूमि में जन्मा छोलिया नृत्य हजार साल पुरानी तलवार परंपरा का प्रतीक है। रणभेरी, रणसिंग, ढोल और दमाऊ की ध्वनि के साथ जब नर्तक तलवारें झंकृत करते हैं, तब ऐसा लगता है जैसे अतीत की रणभूमियां वर्तमान पल में उतर आई हों।
कभी यह नृत्य युद्ध के लिए सैनिकों में जोश भरने और दुष्ट शक्तियों को परास्त करने की प्रतीक प्रार्थना था। आज भी विवाहों में इसका उद्देश्य होता है—
नवविवाहित दंपती की रक्षा, समृद्धि और शक्ति का आशीर्वाद।
- पांडव नृत्य — पौराणिक कथा और तांत्रिक आध्यात्म
उत्तराखंड का यह अनोखा नृत्य महाभारत की कथा के पात्रों का अवतार-रूप नाट्य है। कलाकारों के बारे में मान्यता है कि चरम अवस्था में पांडवों की चेतना उनके शरीर में प्रवेश करती है।
ढोल-दमाऊ की गूंज, देव-आगमन, पात्रों के स्वभाव, युद्ध और दर्शन— यह सब मिलकर लोकधर्म और सनातन अध्यात्म का अद्भुत संगम रचते हैं।
यह नृत्य सिर्फ मंच नहीं— एक अनुष्ठान है।
- झुमैलो — नारी वेदना और प्रेम की देहभाषा
झुमैलो केवल नृत्य नहीं— भावनाओं का विलाप और उम्मीद का झूला है। इसमें स्त्री मन प्रेम, प्रतीक्षा, तड़प और सामाजिक बंधनों की कथा गाता है।
बसंत पंचमी से बैसाखी तक किया जाने वाला यह नृत्य ऋतु परिवर्तन के साथ स्त्री-हृदय के उतार-चढ़ाव को प्रकट करता है।
यह केवल वेदना नहीं— वेदना में शक्ति खोजने की यात्रा है।
- चांचरी — दानपुर की मनमोहक लय
चांचरी में कदम जितने सौम्य होते हैं, ऊर्जा उतनी विशाल।
यह नृत्य गांवों की आपसी मित्रता और जीवन के सरल आनंद का प्रतीक है।
कम बोलना और अधिक जीना— यही चांचरी का संदेश है।
- थड़िया — आंगन का उत्सव
“थाड़” अर्थात घर का आंगन — यानी खुशी परिवार से शुरू होनी चाहिए।
थड़िया विशेषकर विवाहित बेटियों के प्रथम मायका-आगमन पर किया जाता है।
कदमों में संगीत और आंखों में आशीर्वाद— यह नृत्य मातृत्व, बहनभाव और परिवार की भावनाओं का संगम है।
- चौफुला — जीवन का उत्सव।
चौफुला के गीत कहते हैं
“जीवन आनंद और संघर्ष — दोनों का संगम है।”
गरबा और बिहू की तरह यह नृत्य पूरी रात चल सकता है।
इसमें सुख, दुख, प्रेम, विछोह, संघर्ष और आशा— सब एक ही लय में सम्मिलित होते हैं।
मानव जीवन की संपूर्णता इस नृत्य में प्रतिध्वनित होती है।
अन्य महत्वपूर्ण नृत्य
नृत्य अर्थ / सामाजिक भूमिका।
लंगवीर खंभों पर चढ़कर किया जाने वाला अद्भुत नृत्य— अदम्य साहस का प्रतीक
रणभूत (सिपैया) वीरगति प्राप्त योद्धाओं को श्रद्धांजलि
सरौं / पौणा युद्ध गीत— भोटिया परंपरा
मंडाण (केदार नृत्य) शुभ अवसरों पर— देव आशीर्वाद
छपेली प्रेम और रूप सौंदर्य का संवाद नृत्य
बौछड़ो युवाओं का उल्लास— भांगड़ा शैली
मुखोटा नृत्य देव-राक्षस प्रतीकों के मुखौटे, वैशाख उत्सव
नृत्य और सामुदायिक समरसता।
उत्तराखंड के लोकनृत्यों में धर्म से पहले मानवता आती है।
यहाँ नृत्य के समय—
कोई हिन्दू, कोई मुस्लिम, कोई राजपूत, कोई ब्राह्मण नहीं होता;
सब केवल नर्तक होते हैं, गीत और धुन के उपासक होते हैं।
यही कारण है कि पहाड़ों में कहा जाता है —
“नाच-गान वाला गांव झगड़ों से दूर रहता है।”
नृत्य यहाँ सामुदायिक तनावों का उपचार और सामाजिक संवाद का सर्वोत्तम माध्यम है।
आधुनिकता के दौर में यह विरासत,
आज इंटरनेट, टीवी और माइग्रेशन के दौर में लोकनृत्य चुनौतियों से गुजर रहे हैं,
फिर भी पर्वतीय समाज उन्हें साँस की तरह बचाए हुए है।
स्कूल, मेले, मंच, राज्य उत्सव, पर्यटन और सांस्कृतिक मंच—
इन सबने इन नृत्यों को नए अर्थ और नया भविष्य दिया है।
नई पीढ़ी जब रणसिंग की आवाज़ या झोड़ा की ताल पर कदम मिलाती है,
तो स्पष्ट होता है कि यह संस्कृति कभी समाप्त नहीं होगी।
नृत्य, जो समाज को जोड़ता है।
उत्तराखंड के लोकनृत्य केवल रंग–बिरंगे परिधान, गीत और कदम नहीं—
जीवन, अध्यात्म, इतिहास, संघर्ष, प्रेम, कर्तव्य और सामूहिक चेतना का महाकाव्य हैं।
इन नृत्यों में— स्त्री-पुरुष का संतुलन है,
धर्म-समाज-प्रकृति का संतुलन है,
अतीत-वर्तमान-भविष्य का संतुलन है,
जब ढोल-दमाऊ की थाप गूंजती है,
और लोकगीतों की आवाज़ पहाड़ों से टकराकर लौटती है,
तो ऐसा लगता है कि देवभूमि कह रही है—
“मैं जीवित हूँ, अपनी संस्कृति के साथ, अपने नृत्यों के साथ।”




