“तराई की पहचान, जनसेवा का तीर्थ: स्व० पं० रामसुमेर शुक्ला की विरासत और जननायक राजेश शुक्ला का संकल्प”श्रद्धा का दिवस, संकल्प का संदेश: पं० राम सुमेर शुक्ला को नमन”

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रुद्रपुर स्थित शुक्ला पार्क आज भावनाओं और कृतज्ञता से भरा हुआ था। स्वर्गीय पं० राम सुमेर शुक्ला की पुण्यतिथि पर बड़ी संख्या में लोगों ने उपस्थित होकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। केवल पुष्पांजलि नहीं हुई — स्मृतियों और आदर्शों का पुनर्जागरण भी हुआ। सूचना सेनानी के वंशज, शिक्षकों, साहित्यकारों, मीडिया जगत से जुड़े लोगों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने मिलकर यह प्रमाणित किया कि शुक्ला जी केवल इतिहास नहीं, तराई की आत्मा हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

विशेष बात यह रही कि बड़ी संख्या में महिलाओं की सहभागिता ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ाया। गृहिणियों से लेकर शिक्षिका और सामाजिक कार्यकर्ता तक सभी ने इस बात पर जोर दिया कि पं० शुक्ला का संघर्ष केवल बसावट का नहीं, नारी सम्मान और सामाजिक न्याय की स्थापना का भी था। बच्चों और युवाओं ने भी श्रद्धांजलि दी, यह बताने के लिए कि आदर्श पीढ़ियों में स्थानांतरित होते हैं।

संपादकीय,आज का दिन केवल स्मरण का नहीं, संकल्प का दिन रहा —
कि पं० राम सुमेर शुक्ला की विरासत तराई के विकास, शिक्षा, एकता और जनसेवा के रूप में आगे भी जगमगाती रहेगी।श्रद्धा के दीप जलते रहेंगे, प्रेरणा अमर रहेगी।

उत्तराखंड की तराई का इतिहास केवल भूगोल नहीं है—यह संघर्षों, बलिदानों, सपनों और निर्माण का जीवित ग्रंथ है। इस ग्रंथ के प्रथम पृष्ठ पर जो नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है, वह है स्वर्गीय पं० रामसुमेर शुक्ला। एक ऐसे व्यक्तित्व, जिनके सपनों में केवल स्वयं के जीवन का उत्थान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बसता था। एक ऐसे राष्ट्रभक्त, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की तपिश अपनी आत्मा में महसूस की और आज़ादी के बाद भी राष्ट्र व समाज के लिए कभी विश्राम नहीं किया।

जब तराई बियाबान, दलदलों और जंगलों से भरा अनाथ भूभाग था, जब यहां बसावट और सभ्यता का विचार भी असंभव प्रतीत होता था, तब पं० रामसुमेर शुक्ला ने दूरदर्शिता, श्रम और संकल्प का दीपक जलाया। उन्होंने केवल खेतों में हल नहीं चलाया—उन्होंने सपनों की फसल बोई। उन्होंने केवल गांव नहीं बसाए—उन्होंने भविष्य बसाया।
आज रुद्रपुर, किच्छा, पंतनगर और समूची तराई औद्योगिक व शैक्षणिक शक्ति का केंद्र है, पर इसकी नींव में श्रम का जो पहला ईंट रखा गया, वह इन्हीं महापुरुष के हाथों से रखा गया था।


सपनों की खेती करने वाला किसान, समाज का मार्गदर्शक

पं० रामसुमेर शुक्ला के व्यक्तित्व का मूल तत्व था — कर्म की पूजा और समाज के प्रति समर्पण
वे जमीन को केवल उपजाऊ नहीं बनाते थे, वे मनुष्य की उम्मीदों को भी उपजाऊ बनाते थे।
उनके लिए तराई मात्र भूमि नहीं थी, बल्कि मातृभूमि थी — जिसे सींचना, संवारना और समृद्ध करना उनका आजीवन संकल्प था।

उन्होंने —बसावट की मुहिम को नेतृत्व दिया

प्रवासियों और विस्थापितों को आश्रय व पहचान दिलाई

कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य के ढांचे के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई

सामुदायिक एकता को सामाजिक संस्कृति बनाया

यही कारण था कि तराई के लोग उन्हें नेता नहीं, परिवार के मुखिया के रूप में देखते थे। उनके निर्णय मान लिए जाते थे, उनके शब्द प्रेरणा बन जाते थे।


विरासत जो खून में उतरती है — जनसेवा का संस्कार

समय बीतता गया, किन्तु पं० रामसुमेर शुक्ला की विरासत केवल स्मृति तक नहीं सिमटी।
यह विरासत संस्कार के रूप में उनके सुपुत्र, उत्तराखंड के लोकप्रिय नेता एवं पूर्व विधायक किच्छा — श्री राजेश शुक्ला में जीवित है।

ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं जब किसी पिता का अधूरा सपना बेटा अपना लक्ष्य बनाकर पूरा करे।
राजेश शुक्ला वही उदाहरण हैं।

उन्होंने राजनीति को वर्चस्व या सत्ता नहीं, सेवा और विकास का साधन बनाया।
किच्छा विधानसभा से दो बार विधायक रहते हुए उन्होंने बार-बार सिद्ध किया कि नेतृत्व वही है जिसमें वाणी से अधिक कर्म बोलते हैं।

जहां पं० रामसुमेर शुक्ला ने तराई को बसाया, वहीं राजेश शुक्ला ने इसे आधुनिक विकास की राह पर चलाया

अवसंरचना का विस्तार

सड़कों, बिजली-पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा में बड़े सुधार

रोजगारपरक योजनाओं के लिए विशेष प्रयास

युवाओं और किसानों के लिए नीति-स्तर पर संघर्ष

उनकी राजनीति का मूल केंद्र रहा — जनता पहले


पिता की प्रेरणा, जनता की ताकत

जन-आक्रोश और जन-आशीर्वाद दोनों को स्वीकार करने की क्षमता हर नेता में नहीं होती।
लेकिन राजेश शुक्ला ने आलोचना को भी विकास के ईंधन में बदलना सीखा है
वे मंचों पर बोलने से अधिक मैदान में काम करने में विश्वास रखने वाले नेता हैं।

पंडित रामसुमेर शुक्ला के संस्कारों से मिली तीन शिक्षाएँ उनके जन-जीवन में स्पष्ट दिखाई देती हैं —
समाज के लिए समर्पण,
ईमानदारी और पारदर्शिता,
व्यक्ति नहीं, क्षेत्र और जनता सर्वोपरि, इसलिए आज भी किच्छा-तराई में बुजुर्ग कह उठते हैं —पिता ने बसाया, बेटे ने संवार दिया।”


जब विरासत मार्ग दिखाती है, तो वर्तमान भविष्य गढ़ता है

आज तराई नए विकास के मोड़ पर खड़ी है —
उद्योग, हवाई अड्डा विस्तार, मेडिकल-एजुकेशन हब, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था, नई रोजगार संभावनाएं…
लेकिन विकास सबसे स्थायी तब होता है जब वह नींव और मूल्य दोनों पर खड़ा हो

पं० रामसुमेर शुक्ला ने नींव तैयार की,
और राजेश शुक्ला उसे ऊंचाई दे रहे हैं।

पिता और पुत्र की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि —

  • इतिहास सम्मान से लिखा जाता है
  • वर्तमान संकल्प से निर्मित होता है
  • और भविष्य कर्म से सुरक्षित होता है

पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि — स्मृति नहीं, संकल्प का दिवस

आज पं० रामसुमेर शुक्ला की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देना केवल औपचारिकता नहीं है।
यह आत्ममंथन का समय है —
क्या हम उस विरासत के अनुरूप भविष्य बना रहे हैं?यदि तराई को सतत, संतुलित और समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ना है,
तो पितृपुरुषों के सपनों को आगे बढ़ाने वाले नेताओं का समर्थन ही हमारी जवाबदेही है।

और यह तथ्य निर्विवाद है कि —
तराई की पहचान, जनविश्वास और विकास की निरंतरता — राजेश शुक्ला के अनुभव, ईमानदारी और जनसेवा के बिना अधूरी है।


स्व० पं० रामसुमेर शुक्ला ने कहा था —
“विरासत वह नहीं जो पीछे छोड़ दी जाए… विरासत वह है जिसे आगे बढ़ाया जाए।”

आज तराई की जनता उसी विरासत के साक्षी भी हैं और संरक्षक भी।
इतिहास के पन्ने बदल चुके हैं, नेतृत्व की पीढ़ी बदल चुकी है,
पर उद्देश्य वही है — तराई का विकास, समाज की उन्नति, और जनसेवा की अखंड परंपरा।

पुण्यतिथि पर यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है —
आदर्शों को याद रखना ही नहीं, उन्हें यथार्थ में बदलना भी है।


✍️ स्व० पं० रामसुमेर शुक्ला amar रहेंगे और उनकी विरासत को जनसेवा व विकास में बदलने का संकल्प भविष्य की पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन बना रहेगा।


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