सूर्य-चंद्र का प्रकाश सकारात्मकता है और राहु-केतु का अंधकार नकारात्मकता है, इसीलिए सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के दौरान दान, धर्म-कर्म पर विशेष ध्यान देने के लिए कहा जाता है.

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उत्तराखंड से दिखेगा साल 2022 के बाद का सबसे लंबा पूर्ण चंद्रग्रहण

सात सितंबर, रविवार की रात उत्तराखंडवासियों के लिए खगोलीय दृष्टि से बेहद खास होगी। साल 2022 के बाद का सबसे लंबा पूर्ण चंद्रग्रहण इस दिन दिखाई देगा। खगोलविदों के अनुसार इसकी शुरुआत रात 8 बजकर 58 मिनट पर होगी और यह रात 12 बजे तक चलेगा। कुल मिलाकर एक घंटा अट्ठाईस मिनट छह सेकेंड तक लोग इस अद्भुत नजारे को देख पाएंगे।देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी, रुद्रपुर, पिथौरागढ़ और मसूरी जैसे पहाड़ी व मैदानी इलाकों से लोग साफ आसमान होने पर इसे स्पष्ट रूप से देख सकेंगे। वैज्ञानिक दृष्टि से यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें चंद्रमा पूरी तरह पृथ्वी की छाया में आ जाएगा और उसका रंग रहस्यमयी लाल (ब्लड मून) दिखाई देगा।जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं और पृथ्वी सूर्य की रोशनी को चांद तक पहुंचने से रोक देती है, तो चंद्रग्रहण होता है। पूर्ण चंद्रग्रहण में चांद पूरी तरह धरती की छाया में समा जाता है। इस दौरान वायुमंडल से छनकर गुजरने वाली लाल किरणें चंद्रमा तक पहुंचती हैं, जिससे वह लालिमा लिए हुए दिखता है। इसे ही ब्लड मून कहा जाता है।
यह ग्रहण भारत समेत एशिया, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और पूर्वी अफ्रीका के अधिकांश हिस्सों में दिखाई देगा। भारत के सभी बड़े शहरों के साथ-साथ उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से भी लोग इसे देख पाएंगे। वैज्ञानिकों के मुताबिक बादलों से मुक्त साफ आसमान वाले इलाके में यह खगोलीय घटना बेहद शानदार दृश्य प्रस्तुत करेगी।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार ग्रहण काल के दौरान सूतक लगता है। उत्तराखंड के मंदिरों—जैसे हरिद्वार के हरकी पैड़ी, काशी विश्वनाथ मंदिर उत्तरकाशी, नैनीताल का नैनादेवी मंदिर और जागेश्वर धाम में इस दौरान विशेष परंपराएं निभाई जाएंगी। सूतक काल में देवपूजन और भोजन वर्जित रहेगा। ग्रहण समाप्ति के बाद गंगा स्नान, मंदिरों में अभिषेक और शुद्धि का विधान किया जाएगा।
पितृ पक्ष और चंद्रग्रहण का संयोग।इस बार का पूर्ण चंद्रग्रहण पितृ पक्ष के दौरान पड़ रहा है, जिससे धार्मिक महत्व और भी बढ़ गया है। उत्तराखंड के हरिद्वार, ऋषिकेश, श्रीनगर, बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे क्षेत्रों में गंगा और अलकनंदा तटों पर पितरों के तर्पण और दान की विशेष व्यवस्था की जा रही है। माना जाता है कि इस संयोग में किए गए तर्पण और दान से पितरों की आत्मा तृप्त होती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
,भारतीय खगोलविदों और विज्ञान संस्थानों ने साफ किया है कि ग्रहण पूरी तरह एक प्राकृतिक खगोलीय घटना है। इसका मानव जीवन पर किसी प्रकार का अशुभ प्रभाव नहीं होता। वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रग्रहण का उपयोग लोग ब्रह्मांडीय गतियों को समझने और अंतरिक्ष अध्ययन में करते हैं।

भारत के वैज्ञानिकों ने इसे आकाशीय घटनाओं को समझने और खगोलशास्त्र में युवाओं की रुचि बढ़ाने का अवसर बताया है।

श्राद्ध कर्म पितरों को नकारात्मकता से मुक्ति दिलाने का अवसर है, इसलिए ऐसे में श्राद्ध की शुरुआत में चंद्र ग्रहण और समाप्ति पर सूर्य ग्रहण के कारण नकारात्मकता का असर होगा, इस नकारात्मकता को समाप्त करने के लिए इस दौरान धर्म-कर्म के विशेष प्रयास करने होंगे, यथाशक्ति मंत्र जाप करें, दान दें.
कई वर्षों बाद श्राद्ध के अवसर पर चंद्र और सूर्य ग्रहण आए हैं.
खग्रास चन्द्र ग्रहण….
चन्द्र ग्रहण प्रारम्भ – 21:58
चन्द्र ग्रहण समाप्त – 01:26, 8 सितम्बर 2025
स्थानीय ग्रहण की अवधि – 3 घण्टे 28 मिनट्स 2 सेकण्ड्स
उपच्छाया से पहला स्पर्श – 20:59
प्रच्छाया से पहला स्पर्श – 21:58
खग्रास प्रारम्भ – 23:01
परमग्रास चन्द्र ग्रहण – 23:42
खग्रास समाप्त – 00:22, 8 सितम्बर 2025
प्रच्छाया से अन्तिम स्पर्श – 01:26, 8 सितम्बर 2025
उपच्छाया से अन्तिम स्पर्श – 02:24, 8 सितम्बर 2025
सूर्य ग्रहण दर्शनीय नहीं होगा….
सूतक प्रारम्भ – लागू नहीं है.
सूतक समाप्त – लागू नहीं है.
इस वर्ष 21 सितम्बर 2025 का आंशिक सूर्य ग्रहण दर्शनीय, लेकिन यह ग्रहण प्रमुखता से दक्षिणी गोलार्ध से दिखायी देगा, खासकर दक्षिण प्रशान्त महासागर, न्यूज़ीलैण्ड, अन्टार्कटिका और दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के कुछ क्षेत्रों से दिखायी देगा, सर्वाधिक 85 प्रतिशत ढका सूर्य ग्रहण न्यूज़ीलैण्ड के दक्षिणी महासागरीय क्षेत्रों से दिखायी देगा, जबकि भारत, श्रीलंका, नेपाल, अफ़ग़ानिस्तान, यूएई सहित शेष एशियाई देशों से यह ग्रहण दिखायी नहीं देगा, तो अफ्रीका, यूरोप, उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका आदि के ज्यादातर क्षेत्रों से भी यह ग्रहण नजर नहीं आएगा!

।✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


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