

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी द्वारा लाए गए नए नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने इन नियमों को अस्पष्ट बताते हुए कहा कि इनमें भेदभाव की परिभाषा संकुचित है। याचिकाओं में आरोप है कि नियम केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों को संरक्षण देते हैं, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को शिकायत निवारण से बाहर रखते हैं। सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब तलब किया है। अब अदालत नियमों की संवैधानिक वैधता की जांच करेगी।

पीठ ने इसे अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताते हुए कहा कि इस नियम को स्पष्ट करने की जरूरत है. तब तक के लिए 2012 के पुराने UGC नियम लागू रहेंगे. इस पीठ में चीफ जस्टिस सूर्यकांत (Justice Surya Kant) और जस्टिस जोयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) शामिल रहे. देश में ज्वलंत मुद्दा बने इस गाइडलाइन पर रोक लगाने वाले दोनों जज आखिर कौन हैं?
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा, ‘इस गाइडलाइंस दखल नहीं दिया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इससे समाज में बंटवारे की स्थिति होगी और उसके परिणाम खतरनाक होंगे. हमें लगता है कि इन रेगुलेशंस की भाषा स्पष्ट नहीं है.’ दोनों जजों की बेंच ने समीक्षा की बात करते हुए 19 मार्च को अगली सुनवाई की तारीख तय की है.
1. चीफ जस्टिस सूर्यकांत
चीफ जस्टिस सूर्यकांत भारत के वर्तमान 53वें मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) हैं. उन्होंने 24 नवंबर 2025 को पद की शपथ ली थी और उनका कार्यकाल 9 फरवरी 2027 तक रहेगा, जब वे सेवानिवृत्त होंगे. 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ. उनकी शिक्षा 1981 में गवर्नमेंट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, हिसार से स्नातक में हुई. 1984 में महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, रोहतक से कानून में स्नातक (LL.B.) किया.
न्यायिक कैरियर की बात करें तो 1984 में हिसार जिला अदालत में वकालत शुरू की. इसके बाद 1985 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की. वह 2000 में मात्र 38 वर्ष की आयु में हरियाणा के सबसे युवा एडवोकेट जनरल बने. 2001 में सीनियर एडवोकेट नामित हुए. 9 जनवरी 2004 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने. 5 अक्टूबर 2018 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस नियुक्त हुए. 24 मई 2019 को सुप्रीम कोर्ट के जज बने. वे हरियाणा से आने वाले पहले मुख्य न्यायाधीश हैं.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत सामाजिक न्याय, लिंग समानता, मानवाधिकार, जेल सुधार और कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों स्तर पर कई महत्वपूर्ण और लैंडमार्क फैसले दिए हैं. वह जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 वाली बेंच का हिस्सा रहे. इसके साथ ही राजद्रोह कानून, पेगासस जासूसी, जेल सुधार, DNA टेस्ट के दुरुपयोग, पंजाब में पीएम नरेंद्र मोदी की सुरक्षा चूक के मामले में जांच समिति गठित की.
2.जस्टिस जोयमाल्या बागची
जस्टिस जोयमाल्या बागची भारत के वरिष्ठ और चर्चित न्यायाधीशों में गिने जाते हैं. उनकी पहचान एक संवेदनशील, संविधान-केंद्रित और मानवाधिकार-उन्मुख जज के रूप में रही है. कानूनी बैकग्राउंड वाले जॉयमाल्या बागची प्रतिष्ठित वकील परिवार से ताल्लुक रखते हैं. 3 अक्टूबर 1968 को जन्मे जस्टिस बागची की कानूनी शिक्षा कोलकाता विश्वविद्यालय से हुई. उन्होंने लंबे समय तक कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत की. खासकर संवैधानिक कानून, आपराधिक कानून, नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में उनकी विशेषज्ञता रही है. जस्टिस बागची 2011 में कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त हुए. हालांकि बाद में उनका तबादला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में हुआ. इसके बाद वे कलकत्ता हाईकोर्ट वापस लौटे, जहां उन्होंने कई अहम फैसले दिए.
जस्टिस बागची को आम तौर पर ऐसे जज के रूप में देखा जाता है जो राज्य शक्ति पर सवाल उठाने से नहीं हिचकते हैं. पुलिस और जांच एजेंसियों की मनमानी पर सख्त टिप्पणी करते हैं. नागरिक स्वतंत्रता, निष्पक्ष जांच और कानून के शासन पर जोर देते हैं. उनके कई फैसलों में यह साफ दिखता है कि वे ‘कानून को सिर्फ सजा का औज़ार नहीं, बल्कि नागरिक की ढाल’ के रूप में देखते हैं.
चर्चित फैसले और टिप्पणियां
उन्होंने फर्जी मुठभेड़, हिरासत में मौत और पुलिस अत्याचार के मामलों में उन्होंने कड़ी टिप्पणियां की हैं. यूएपीए जैसे सख्त कानूनों के दुरुपयोग पर चिंता जताई. जस्टिस बागची ने बार-बार कहा कि राज्य की सुरक्षा नागरिकों के अधिकारों को कुचल कर नहीं हो सकती. उनकी प्रतिष्ठा भी रही है. वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में उन्हें ईमानदार और निर्भीक जज माना जाता है. उनके फैसले अकसर अकादमिक और पत्रकारिता चर्चाओं का हिस्सा बनते हैं.
यूजीसी गाइडलाइन्स का विरोध क्या है?
दरअसल यूजीसी गाइडलाइन्स का विरोध कर रहे लोगों के अनुसार यूनिवर्सिटी और कॉलेज में इक्विटी कमिटी (Equity Committee) के गठन संबंधी इन नियमों में जनरल कास्ट के लोगों को पहले से ही दोषी मान लिया गया है. जांच कमेटी में उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित नहीं किया गया है. इसके अलावा एससी, एसटी के साथ ही ओबीसी को भी भेदभाव के दायरे में लाए जाने को लेकर भी ऐतराज था.




