

हाल के वर्षों में यह प्रक्रिया और भी तेजी पकड़ चुकी है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1990 से 2020 के बीच इस पूरे क्षेत्र में ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल लगभग 12 प्रतिशत घटा है, जबकि बर्फ का भंडार करीब 09 प्रतिशत कम हो गया।
खास बात यह है कि 21वीं सदी में बर्फ पिघलने की दर, 20वीं सदी के अंतिम वर्षों की तुलना में लगभग दोगुनी हो चुकी है। अध्ययन में 63 हजार से अधिक ग्लेशियरों का विश्लेषण किया गया।
इसमें पाया गया कि 2010 के बाद ग्लेशियरों के सिकुड़ने की गति अचानक बढ़ी है, खासकर पूर्वी और मध्य हिमालय में। छोटे ग्लेशियर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं और कई जगह वह टूटकर छोटे हिस्सों में बंट गए या पूरी तरह खत्म हो गए।
गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन में ज्यादा असर
क्षेत्रीय स्तर पर भी बड़ा अंतर देखने को मिला। जहां काराकोरम क्षेत्र में अपेक्षाकृत स्थिरता रही, वहीं गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई। इन इलाकों में ग्लेशियर क्षेत्र में क्रमशः लगभग 21 और 16 प्रतिशत की कमी आई।
एशिया का वाटर टावर खतरे में
हिंदूकुश हिमालय को एशिया का वाटर टावर कहा जाता है, क्योंकि यहां की नदियां करीब दो अरब लोगों की जल जरूरतों को पूरा करती हैं। ग्लेशियर सूखे मौसम में पानी का स्थायी स्रोत बने रहते हैं। लेकिन इनके घटने से भविष्य में पानी की उपलब्धता पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
बाढ़ से लेकर भूस्खलन तक के खतरे बढ़ने का अंदेशा
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ग्लेशियरों के पिघलने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ), भूस्खलन और हिमस्खलन जैसे खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं।
हाल के वर्षों में सिक्किम और उत्तराखंड में आई आपदाएं इसी बदलते परिदृश्य की ओर इशारा करती हैं।
क्यों तेजी से पिघल रहे हैं ग्लेशियर
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे मुख्य कारण बढ़ता तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव है। 5500 मीटर से नीचे स्थित ग्लेशियर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, जबकि ऊंचाई वाले ग्लेशियर अपेक्षाकृत धीमी गति से पिघल रहे हैं।
इसके अलावा, दक्षिण और पूर्व दिशा की ओर मुख वाले ग्लेशियरों में सूर्य की अधिक गर्मी के कारण तेजी से क्षरण हो रहा है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बड़े ग्लेशियर टूटकर छोटे हिस्सों में बंट रहे हैं। ये छोटे ग्लेशियर अधिक संवेदनशील होते हैं और तेजी से खत्म हो जाते हैं, जिससे कुल नुकसान और बढ़ जाता है।
भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले समय में जल संकट, कृषि उत्पादन और ऊर्जा क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट ने साफ कहा है कि इस चुनौती से निपटने के लिए ठोस नीतियां, बेहतर निगरानी और क्षेत्रीय सहयोग बेहद जरूरी है।
कुल मिलाकर, हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से सिकुड़ना केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़ा बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट बनता जा रहा है।




