नजूल की रजिस्ट्री का रास्ता: विधायक शिव अरोड़ा की पहल?नजूल की जमीन से सम्मान तक: रुद्रपुर के गरीबों को मालिकाना हक दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक पहल,

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रुद्रपुर शहर का इतिहास जितना विकास की कहानियों से जुड़ा है, उतना ही वह नजूल भूमि पर बसे हजारों परिवारों के संघर्ष से भी जुड़ा हुआ है। दशकों से रुद्रपुर के अधिकांश हिस्से में रहने वाले लोग अपने ही घरों में अस्थायी निवासी की तरह जीवन जीते रहे। उनके पास छत तो थी, लेकिन उस छत पर अधिकार नहीं था। यह स्थिति केवल प्रशासनिक या कानूनी समस्या नहीं थी, बल्कि सामाजिक और मानवीय पीड़ा का प्रतीक भी थी।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही रुद्रपुर की मलिन बस्तियों और नजूल भूमि पर रहने वाले गरीब परिवारों की सबसे बड़ी मांग यही रही कि उन्हें उनके घरों का मालिकाना हक दिया जाए। यह मांग कई बार उठी, आंदोलन हुए, ज्ञापन दिए गए, लेकिन समाधान हमेशा अधूरा ही रहा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


अब पहली बार यह उम्मीद मजबूत दिखाई दे रही है कि यह ऐतिहासिक समस्या स्थायी समाधान की ओर बढ़ रही है। रुद्रपुर के विधायक सीए शिव अरोरा द्वारा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंपा गया पत्र इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस पत्र में नजूल भूमि पर रहने वाले अति निर्धन परिवारों के लिए मालिकाना हक की रजिस्ट्री पर लगने वाली स्टांप ड्यूटी को पूरी तरह निशुल्क करने का प्रस्ताव रखा गया है।
मुख्यमंत्री द्वारा इस प्रस्ताव पर तुरंत सचिव आवास और सचिव वित्त को आवश्यक कार्यवाही के निर्देश देना यह संकेत देता है कि सरकार इस विषय को गंभीरता से ले रही है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो रुद्रपुर की हजारों गरीब परिवारों की वर्षों पुरानी समस्या का समाधान संभव हो सकता है।
नजूल भूमि का पुराना इतिहास और रुद्रपुर की वास्तविकता
रुद्रपुर शहर का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा नजूल भूमि पर बसा हुआ है। नजूल भूमि वह जमीन होती है जो मूल रूप से सरकार के स्वामित्व में होती है और जिस पर लोग वर्षों से बसे होते हैं, लेकिन उनके पास कानूनी स्वामित्व नहीं होता।
रुद्रपुर के 40 वार्डों में हजारों परिवार ऐसे हैं जो पिछले 30–40 वर्षों से इसी जमीन पर रह रहे हैं। इन परिवारों ने अपने छोटे-छोटे घर बनाए, बच्चों को पढ़ाया, रोजगार किया और शहर के विकास में योगदान दिया, लेकिन उनके पास जमीन का कोई वैध दस्तावेज नहीं था।
इसी कारण वे हमेशा एक अनिश्चितता के साये में जीवन जीते रहे। उन्हें यह डर रहता था कि किसी दिन प्रशासनिक कार्रवाई के तहत उनका घर उजड़ सकता है।
नजूल नीति में संशोधन: एक महत्वपूर्ण मोड़
वर्ष 2023 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार ने नजूल नीति में संशोधन करते हुए आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मालिकाना हक देने की प्रक्रिया शुरू की।
इस नीति के तहत 50 वर्ग मीटर तक की नजूल भूमि पर निवास कर रहे गरीब परिवारों को मालिकाना हक देने का निर्णय लिया गया। यह फैसला उन लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं था, जो दशकों से अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे थे।
इस प्रक्रिया के तहत अब तक लगभग 3500 परिवारों को मालिकाना हक का प्रमाण पत्र दिया जा चुका है। लेकिन इसके बावजूद एक बड़ी समस्या सामने आई – रजिस्ट्री पर लगने वाली भारी स्टांप ड्यूटी।
गरीबों के लिए सबसे बड़ी बाधा: स्टांप ड्यूटी
हालांकि सरकार ने मालिकाना हक देने की प्रक्रिया शुरू कर दी, लेकिन जब रजिस्ट्री की बात आई तो गरीब परिवारों के सामने एक बड़ी आर्थिक बाधा खड़ी हो गई।
50 वर्ग मीटर के छोटे से भूखंड की रजिस्ट्री पर लगभग एक लाख रुपये तक की स्टांप ड्यूटी लग रही है।
एक दिहाड़ी मजदूर या आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए यह रकम जुटाना लगभग असंभव है। ऐसे में मालिकाना हक का प्रमाण पत्र मिलने के बावजूद वे रजिस्ट्री नहीं करा पा रहे हैं।
यही वह समस्या है जिसे विधायक शिव अरोरा ने गंभीरता से उठाया है। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि नजूल भूमि पर रहने वाले अति निर्धन परिवारों के लिए स्टांप ड्यूटी पूरी तरह माफ की जाए, ताकि वे बिना किसी आर्थिक बोझ के अपनी जमीन की रजिस्ट्री करा सकें।
शिव अरोरा की राजनीतिक पहल
रुद्रपुर के विधायक बनने के बाद से शिव अरोरा लगातार नजूल भूमि के मुद्दे को प्राथमिकता देते रहे हैं।
उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि नजूल नीति में संशोधन हुआ और हजारों परिवारों को मालिकाना हक देने की प्रक्रिया शुरू हुई।
अब उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए रजिस्ट्री को भी गरीबों के लिए आसान बनाने की पहल की है।
उनका कहना है कि यदि सरकार मालिकाना हक दे रही है तो यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि गरीब परिवार रजिस्ट्री कराने में सक्षम हों।
उनकी यह पहल केवल प्रशासनिक कदम नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
मुख्यमंत्री धामी की त्वरित प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इस प्रस्ताव पर तुरंत सचिव आवास और सचिव वित्त को कार्रवाई के निर्देश देना यह दर्शाता है कि सरकार इस विषय को संवेदनशीलता के साथ देख रही है।
यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो रुद्रपुर के हजारों गरीब परिवारों को न केवल मालिकाना हक मिलेगा बल्कि उनकी जमीन की कानूनी रजिस्ट्री और खसरा-खतौनी भी बन सकेगी।
यह कदम गरीब परिवारों के जीवन में स्थायित्व और सुरक्षा की भावना पैदा करेगा।
हाईकोर्ट की रोक और कानूनी चुनौतियां
नजूल भूमि से जुड़ा मामला केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि कानूनी भी है।
नजूल भूमि के फ्रीहोल्ड से जुड़े कुछ मामलों पर उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाई गई है, जिसके कारण कई परिवारों को अभी तक मालिकाना हक नहीं मिल पाया है।
विधायक शिव अरोरा ने अपने पत्र में यह भी आग्रह किया है कि सरकार अदालत में सशक्त पैरवी करे ताकि नजूल भूमि पर बसे अन्य परिवारों को भी न्याय मिल सके।
2027 चुनाव और राजनीतिक प्रभाव
राजनीतिक दृष्टि से भी यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रुद्रपुर के 40 वार्डों में रहने वाले हजारों परिवार इस निर्णय से सीधे प्रभावित होंगे। यदि रजिस्ट्री निशुल्क होती है और लोगों को खसरा-खतौनी मिलती है, तो यह रुद्रपुर की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय आने वाले 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक कदम साबित हो सकता है।
गरीबों के जीवन में बदलाव की उम्मीद
यदि नजूल भूमि पर रहने वाले परिवारों को पूरी तरह कानूनी मालिकाना हक मिल जाता है, तो इसका प्रभाव केवल जमीन के कागजों तक सीमित नहीं रहेगा।
इसके कई सामाजिक और आर्थिक परिणाम होंगे –
लोग अपनी संपत्ति को बैंक से ऋण लेने के लिए उपयोग कर सकेंगे।
घरों का विकास और निर्माण संभव होगा।
परिवारों को स्थायी सुरक्षा मिलेगी।
शहर के विकास की नई संभावनाएं खुलेंगी।
एक ऐतिहासिक अवसर
रुद्रपुर के इतिहास में यह शायद पहला मौका है जब नजूल भूमि पर रहने वाले गरीब परिवारों के अधिकार को इतनी गंभीरता से उठाया गया है।
यदि सरकार स्टांप ड्यूटी को निशुल्क कर देती है, तो यह फैसला न केवल रुद्रपुर बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए एक ऐतिहासिक उदाहरण बन सकता है।
रुद्रपुर की नजूल भूमि का मुद्दा सम्मान, सुरक्षा और सामाजिक न्याय का मुद्दा है।
विधायक शिव अरोरा की  शानदार पहल और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सकारात्मक प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि अब इस समस्या का स्थायी समाधान होने जा रहा है।

नजूल भूमि की रजिस्ट्री का यह फैसला केवल रुद्रपुर ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है।
मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami और विधायक Shiv Arora की पहल से शुरू हुई यह प्रक्रिया हजारों गरीब परिवारों को मालिकाना हक दिलाने का रास्ता खोल रही है।


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