प्लान था कि चार-पांच दिन हमला करेंगे, इसी बीच ईरान के टॉप लीडर्स को मार गिराएंगे, सरकार से नाराज लोगों को सड़कों पर उतारेंगे और तख्तापलट करके अपनी पसंद की नई लीडरशिप ले आएंगे। ईरान पर हमले के वक्त अमेरिका और इजरायल का यही प्लान था।

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उन्हें लगा था कि चार-पांच दिन में खेल खत्म करके वापस लौट आएंगे, लेकिन ये पूरा प्लान बुरी तरह पिट गया है। जंग को 25 दिन हो गए हैं, पर ईरान से न तो किसी बड़े विरोध प्रदर्शन की खबर है और न ही सत्ता परिवर्तन के कोई आसार दिख रहे हैं। इसके उलट, ईरान ने अमेरिका और इजरायल को तगड़ा झटका देते हुए जंग का दायरा बढ़ा दिया है और तेल और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

ईरान में सत्ता बदलना इजरायल और अमेरिका का बहुत पुराना सपना रहा है। भले ही वे ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने, लोकतंत्र समर्थकों पर हमले बंद कराने या आतंकी गुटों की मदद रोकने जैसे कई कारण गिनाते रहे हों, लेकिन इस जंग का असली मकसद हमेशा से ईरान की मौजूदा सरकार को उखाड़ फेंकना ही था। अमेरिका और इजरायल ने इसी के हिसाब से योजनाएं बनाई थीं। जंग शुरू होने पर ट्रंप और नेतन्याहू को पूरा यकीन था कि उनका प्लान कामयाब होगा। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद की एक रिपोर्ट के आधार पर ही नेतन्याहू ने राष्ट्रपति ट्रंप को इसके लिए राजी किया था। न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिका और इजरायल के 14 सुरक्षा और खुफिया अधिकारियों से बात करके अपनी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है।

मोसाद का प्लान, नेतन्याहू और ट्रंप का भरोसा

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सब की शुरुआत मोसाद के एक प्लान से हुई थी। जब अमेरिका और इजरायल जंग की तैयारी कर रहे थे, तब मोसाद के चीफ डेविड बार्निया यह प्लान लेकर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पास पहुंचे। मोसाद चीफ ने कहा कि वे ईरान के विपक्षी गुटों को इस तरह से लीड कर सकते हैं कि जंग शुरू होने के कुछ ही दिनों में सत्ता पलट दी जाएगी। जनवरी के मध्य में वॉशिंगटन दौरे पर गए मोसाद चीफ ने ट्रंप प्रशासन के बड़े अधिकारियों के सामने भी यह प्लान पेश किया।

नेतन्याहू ने इस प्लान को हरी झंडी दे दी। हालांकि, अमेरिका के कुछ सीनियर अधिकारियों और इजरायल की दूसरी खुफिया एजेंसियों के कुछ लोगों को इस प्लान के कामयाब होने पर शक था। लेकिन नेतन्याहू और राष्ट्रपति ट्रंप बहुत उम्मीद में थे। उन्हें लगा कि जंग की शुरुआत में ही ईरान के बड़े नेताओं को मारकर और खुफिया ऑपरेशनों के जरिए सत्ता परिवर्तन को बढ़ावा देकर जंग जल्दी खत्म की जा सकती है। इसी सोच के साथ ट्रंप ने जंग की शुरुआत में ईरान के लोगों को संबोधित करते हुए कहा था, ‘जब हम यह सब खत्म कर लेंगे, तो आप अपनी सरकार वापस ले लेना।’

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका के सीनियर अधिकारियों और इजरायली डिफेंस फोर्स की खुफिया एजेंसी ‘अमान’ के एक्सपर्ट्स ने मोसाद के इस प्लान को शुरू से ही शक की नजर से देखा था। अमेरिकी सेना ने ट्रंप को साफ-साफ बता दिया था कि जब अमेरिका और इजरायल बमबारी करेंगे, तो ईरान के लोग सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन नहीं करेंगे। अमेरिकी खुफिया विभाग ने भी तभी साफ कर दिया था कि ईरान में सत्ता बदलने लायक किसी बड़े जन-आंदोलन की संभावना बहुत कम है और इस हमले से कोई गृह युद्ध नहीं छिड़ेगा।

मोसाद के प्लान का रास्ता

CIA ने इस पर विस्तार से स्टडी की थी कि अगर जंग शुरू हुई तो ईरान में क्या होगा। CIA का मानना था कि ईरान की सरकार के पूरी तरह से ढहने की संभावना नहीं है। हां, सरकार के अंदर मौजूद हथियारबंद गुटों में आपसी लड़ाई हो सकती है, जिससे गृह युद्ध जैसे हालात बन सकते हैं। लेकिन ऐसा हुआ भी तो वे लोकतंत्र की जगह अपने धार्मिक नेताओं का ही साथ देंगे। यानी, कट्टरपंथी सोच वाले लोगों के ही सत्ता में आने की संभावना ज्यादा थी।

ईरान में सत्ता परिवर्तन इजरायल की बहुत पुरानी ख्वाहिश रही है। मौजूदा मोसाद चीफ डेविड बार्निया से पहले योसी कोहेन भी इस पर विचार कर चुके थे। लेकिन उनका मानना था कि अंदरूनी प्रदर्शनों से सत्ता बदलना मुमकिन नहीं है और इसमें मेहनत करना वक्त की बर्बादी है। इसलिए, उन्होंने इस प्लान को ठंडे बस्ते में डालने का आदेश दिया। इसके बजाय, उन्होंने प्रतिबंध लगाने, परमाणु वैज्ञानिकों और सैन्य नेताओं की हत्या करने और परमाणु ठिकानों पर हमला करने को प्राथमिकता देने का फैसला किया। लेकिन जब डेविड बार्निया नए चीफ बने, तो उन्होंने पुराना फैसला बदल दिया। सत्ता परिवर्तन फिर से मोसाद की टॉप लिस्ट में आ गया। उन्होंने मोसाद को यकीन दिलाया कि ईरान पर हमला करके और उसके बड़े नेताओं को मारकर सत्ता पलटी जा सकती है। बार्निया, नेतन्याहू और ट्रंप को भी यह बात समझाने में कामयाब रहे। और इसी तरह ईरान पर हमले के प्लान को फाइनल किया गया।

प्लान में कहां हुई चूक?

ईरान में एक बड़ा अंदरूनी विद्रोह भड़काने का यही भरोसा बुरी तरह फेल हो गया। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जंग की तैयारियों में यह सबसे बड़ी बुनियादी गलती थी। नेतन्याहू और ट्रंप अब इस गलती को महसूस कर रहे हैं और यह उनकी बातों में भी झलक रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नेतन्याहू इस बात पर बेहद गुस्से में थे। जंग शुरू होने के कुछ दिनों बाद एक सुरक्षा बैठक में, नेतन्याहू ने गुस्से में कहा कि ट्रंप किसी भी पल जंग खत्म करने का फैसला कर सकते हैं, लेकिन मोसाद की कोशिशों का अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है।

गुरुवार को नेतन्याहू की प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह बदला हुआ रुख और भी साफ दिखा। उन्होंने कहा, ‘क्रांतियां आसमान से नहीं कराई जा सकतीं, इसके लिए जमीन पर भी दखल देना जरूरी है।’ उन्होंने यह भी कहा, ‘अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईरानी लोग हालात का फायदा उठाकर सड़कों पर उतरेंगे या नहीं। मैं उम्मीद करता हूं कि ऐसा हो। हम उसी लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। यह होगा या नहीं, यह सिर्फ उन पर निर्भर करता है।’ जंग के दो हफ्ते बाद ही राष्ट्रपति ट्रंप भी इसी नतीजे पर पहुंच गए थे। 12 मार्च को फॉक्स न्यूज रेडियो पर बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान की सुरक्षा सेना सड़कों पर उतरने वाले प्रदर्शनकारियों को मशीनगनों से भून रही है। ट्रंप ने कहा, ‘बिना हथियारों वाले आम लोगों के लिए इससे पार पाना बहुत मुश्किल होगा। क्रांति होगी, लेकिन शायद तुरंत नहीं होगी।’

कुर्द प्लान भी हुआ फेल

जब ईरान के प्रदर्शनकारी सड़कों पर नहीं उतरे, तो दूसरा प्लान उत्तरी इराक में सक्रिय ईरानी कुर्दिश हथियारबंद गुटों को मैदान में उतारने का था। हाल के सालों में CIA और मोसाद ने कुर्दिश सेना को हथियार दिए थे। जंग के शुरुआती दिनों में, इजरायल ने उत्तर-पश्चिमी ईरान में बमबारी भी की ताकि कुर्दिश सेना को आगे बढ़ने का रास्ता मिल सके। लेकिन, कुर्द सेना ने ईरान में घुसने से इनकार कर दिया। ‘पेट्रियोटिक यूनियन ऑफ कुर्दिस्तान’ के अध्यक्ष बाफेल तलबानी ने फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि ऐसा कोई प्लान नहीं है। उन्होंने कहा, ‘कुर्दों के आगे बढ़ने से उल्टा असर होगा। ईरानी लोग बहुत राष्ट्रवादी हैं। अगर उन्हें बाहरी कुर्दों के हमले से देश के बंटवारे का डर हुआ, तो वे कुर्दों के खिलाफ एकजुट हो जाएंगे।’

बाद में अमेरिका भी कुर्दों को जमीनी लड़ाई में उतारने के प्लान से पीछे हट गया। ट्रंप ने खुद खुलासा किया कि जंग शुरू होने के एक हफ्ते बाद उन्होंने कुर्द नेताओं से साफ कह दिया था कि वे अपनी सेना को ईरान न भेजें। ट्रंप ने कहा कि वह नहीं चाहते कि कुर्द वहां जाएं। तुर्की ने भी ट्रंप प्रशासन को कुर्दों के इस कदम का समर्थन न करने की चेतावनी दी थी।


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