बांग्लादेश की राजनीति ने बड़ा मोड़ ले लिया है. शेख हसीना अब सत्ता में नहीं हैं और लगभग डेढ़ साल बाद हुए संसदीय चुनाव में जनता ने नया विकल्प चुन लिया है. नतीजों से साफ है कि लोगों ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को बहुमत देकर सत्ता सौंपने का फैसला किया है.

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हालांकि पाकिस्तान की उम्मीद के मुताबिक यह परिणाम नहीं है. क्योंकि वह चाहता था, कि कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी को जीत मिले. लेकिन जमात का गठबंधन 70 सीटों तक सिमटता दिख रहा है. बांग्लादेश वही देश है जहां 2024 के छात्र आंदोलन ने सरकार को गिरा दिया था. उस आंदोलन से निकले नेताओं ने बाद में नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) बनाई और खुद को बदलाव का चेहरा बताया. लेकिन चुनावी मैदान में वही छात्र नेतृत्व बुरी तरह पिछड़ गया. पार्टी के ज्यादातर उम्मीदवार हार गए और उसके प्रमुख नेता सिर्फ अपनी सीट बचाने में सफल रहे.

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

बांग्लादेश चुनाव क्यों हारी छात्रों वाली पार्टी?

माना जा रहा है कि तख्तापलट के बाद चुनाव में हुई देरी ने इस आंदोलन की धार को कमजोर कर दिया. NCP ने जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन के साथ हाथ मिलाया. इसे चुनावी रणनीति बताया गया, लेकिन यही फैसला पार्टी के लिए भारी पड़ गया. उदारवादी और सेकुलर सोच रखने वाले मतदाता इस गठबंधन से असहज हो गए. कई युवाओं ने इसे सिद्धांतों से समझौता माना. पार्टी के भीतर भी नाराजगी बढ़ी और कुछ नेताओं ने इस्तीफा तक दे दिया. नतीजा यह हुआ कि एनसीपी लगभग पूरी तरह हार गई. उसके प्रमुख नेता अपनी-अपनी सीट बचाने में तो सफल रहे, लेकिन पार्टी को व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला.


तारिक रहमान.

BNP की जीत के क्या हैं कारण?

  • चुनाव में देरी के बीच BNP ने खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया. यही कारण है कि वह 211 सीटों पर या तो आगे है या जीत चुकी है.
  • 17 साल के निर्वासन के बाद पार्टी नेता तारिक रहमान की सक्रिय वापसी ने कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भर दी.
  • उनकी चुनावी रैलियों और संदेशों ने समर्थकों को एकजुट किया. कई सीटों पर पार्टी को सीधा फायदा मिला.
  • तारिक रहमान एक युवा चेहरे के तौर पर उभरे.
  • शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग का चुनाव में बैन होने का फायदा भी BNP को मिला. BNP और जमात दोनों ही पाकिस्तान प्रेमी हैं. लेकिन लोगों ने यह देखा कि ज्यादा कट्टरपंथी कौन है और विकल्प की कमी ने ही BNP को बड़ा फायदा दिया.
  • पू्र्व पीएम और तारिक रहमान की मां खालिदा जिया के निधन के कारण भी माना जा रहा है कि BNP को लेकर लोगों में सहानुभूति थी, जिसका फायदा उसे मिला.


जमात ए इस्लामी प्रमुख शफीकुर रहमान.

बांग्लादेश चुनाव में जमात-ए-इस्लामी क्यों हार गई?

जमात-ए-इस्लामी को भी उम्मीद के मुताबिक फायदा नहीं मिला. 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का समर्थन करने का आरोप आज भी उसके साथ जुड़ा हुआ है. 55 साल पुराना यह दाग पूरी तरह मिट नहीं पाया. चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के नेतृत्व, वैवाहिक बलात्कार और सामाजिक मुद्दों पर दिए गए कुछ विवादित बयानों ने भी पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया. युवा और महिला मतदाता उससे दूर होते गए. हालांकि बीएनपी भी पूरी तरह बेदाग नहीं है. उस पर भी पाकिस्तान के प्रति नरम रुख रखने के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन इस बार जनता ने पुराने विवादों से ज्यादा मौजूदा राजनीतिक स्थिरता को तरजीह दी.


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