

रुद्रपुर उत्तराखंड,उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में 5 अगस्त 2025 को आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर महीनों तक तरह-तरह के कयास लगाए जाते रहे। शुरुआत में इसे बादल फटने की घटना बताया गया, फिर चर्चा चली कि किसी ग्लेशियल लेक के फटने से यह आपदा आई होगी। लेकिन अब देश की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की वैज्ञानिक रिपोर्ट ने इस घटना के पीछे की असली वजह उजागर कर दी है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बाढ़ न तो बादल फटने से आई थी और न ही किसी ग्लेशियर झील के टूटने से। बल्कि इसका मुख्य कारण श्रीकांत ग्लेशियर के निवेशन जोन में मौजूद एक बड़े आइस पैच (बर्फ के खुले टुकड़े) का अचानक ढह जाना था। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसी आइस पैच के गिरने ने पूरी घटना को ट्रिगर किया और देखते ही देखते यह एक खतरनाक मलबा-युक्त बाढ़ में बदल गई।
वैज्ञानिक रिपोर्ट में क्या कहा गया
इसरो के वैज्ञानिकों ने “आइस-पैच कोलैप्स और हिमालय में अचानक आई बाढ़ से पहले चेतावनी के असर: डीग्लेसिएशन के तहत उभरते क्रायो-हाइड्रोलॉजिकल खतरे” शीर्षक से एक विस्तृत शोध रिपोर्ट तैयार की है।
रिपोर्ट में मल्टी-टेम्पोरल सैटेलाइट इमेजरी, हाई-रिजॉल्यूशन डिजिटल एलिवेशन मॉडल और स्थानीय लोगों द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो फुटेज का विश्लेषण किया गया। इन आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने पूरी घटना के क्रम को फिर से समझने की कोशिश की।
इस विश्लेषण से पता चला कि बर्फ के एक बड़े हिस्से के अचानक ढहने से भारी गुरुत्वाकर्षण ऊर्जा पैदा हुई। यही ऊर्जा तेजी से नीचे की ओर बहते मलबे और पानी के उफान में बदल गई, जिसने धराली क्षेत्र में भारी तबाही मचाई।
पांच वैज्ञानिकों की टीम ने की जांच
इस अध्ययन को इसरो के पांच वैज्ञानिकों की टीम ने अंजाम दिया। इस टीम में गिरिबाबू दंडबथुला, ओमकार शशिकांत घाटगे, शुभम रॉय, अपूर्व कुमार बेरा और सुशील कुमार श्रीवास्तव शामिल थे।
वैज्ञानिकों के अनुसार जुलाई 2025 की शुरुआत में ली गई सैटेलाइट तस्वीरों में लगभग 5220 मीटर की ऊंचाई पर उत्तर-उत्तर-पूर्व दिशा की ढलान पर बर्फ का एक खुला हिस्सा दिखाई दिया था। बाद में 12 अगस्त को ली गई तस्वीरों में यह पूरा हिस्सा गायब पाया गया।
इससे स्पष्ट हुआ कि वही आइस पैच ढहकर नीचे गिर गया था।
75 हजार क्यूबिक मीटर बर्फ का गिरना
रिपोर्ट के अनुसार गिरने वाली बर्फ की मात्रा लगभग 75,000 क्यूबिक मीटर थी और इसका अनुमानित वजन करीब 69 मिलियन किलोग्राम था।
यह विशाल बर्फ का टुकड़ा खीर गाड चैनल की ओर लगभग 1700 मीटर नीचे गिरा। इस गिरावट से पैदा हुई ऊर्जा ने इसे तेज गति से बहते मलबे और पानी के उफान में बदल दिया।
हालांकि पिघले पानी की मात्रा ज्यादा नहीं थी, लेकिन खड़ी ढलान, गाद और संकरे चैनल के कारण यह बहाव बेहद विनाशकारी साबित हुआ।
वीडियो फुटेज से भी मिला सबूत
स्थानीय लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो फुटेज में पानी, कीचड़ और मलबे का एक छोटा लेकिन अत्यंत तेज उफान दिखाई दिया था। इसके बाद अपेक्षाकृत धीमा बहाव लंबे समय तक जारी रहा।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पैटर्न सामान्य मानसूनी बाढ़ जैसा नहीं था, बल्कि अचानक बड़ी मात्रा में मलबे और पानी के निकलने की घटना जैसा था।
बादल फटने की थ्योरी खारिज
रिपोर्ट में 3 से 5 अगस्त के बीच की बारिश का भी अध्ययन किया गया। इसमें केवल हल्की से मध्यम वर्षा दर्ज हुई।
इस आधार पर वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कहा कि इस घटना के पीछे बादल फटने की संभावना पूरी तरह खत्म हो जाती है।
इसी तरह ऊपरी कैचमेंट क्षेत्र में किसी बड़ी ग्लेशियल झील की मौजूदगी भी नहीं पाई गई, जिससे ग्लेशियर झील फटने की थ्योरी भी गलत साबित हुई।
पहले की जांच में भी अलग निष्कर्ष
इससे पहले वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों ने भी अपनी जांच में बादल फटने या ग्लेशियर टूटने की बात को खारिज किया था।
उनका मानना था कि यह घटना ग्लेशियल मोरेन सामग्री के टूटने और ढलान की अस्थिरता से जुड़ी थी।
नवीनतम इसरो अध्ययन ने इस सिद्धांत को और स्पष्ट करते हुए बताया कि वास्तव में आइस पैच का ढहना ही मुख्य कारण था।
नदी का चैनल भी बदला
सैटेलाइट डेटा के विश्लेषण से यह भी पता चला कि बाढ़ के बाद खीर गाड चैनल काफी चौड़ा हो गया है।
भागीरथी नदी से इसके संगम क्षेत्र में बड़े पैमाने पर किनारे का कटाव हुआ और भारी मात्रा में तलछट जमा हो गई।
धराली गांव के निचले हिस्सों में मलबे से भरे बहाव के कारण कई संरचनाओं को भी नुकसान पहुंचा।
हिमालय में बढ़ते नए खतरे
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में तेजी से हो रहे डीग्लेसिएशन (ग्लेशियरों का पिघलना) ऐसे खतरों को बढ़ा रहा है।
पहले जो बर्फ के हिस्से मोटी बर्फ और फर्न की परतों से ढके रहते थे, अब लंबे समय तक गर्मी के कारण उजागर हो रहे हैं। जब ये उजागर हो जाते हैं तो उनकी संरचना कमजोर हो जाती है और वे अचानक ढह सकते हैं।
अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत
रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने हिमालयी क्षेत्रों में बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है।
उनका कहना है कि खड़ी ढलानों पर दिखाई देने वाले बर्फ के खुले हिस्से संभावित खतरे का शुरुआती संकेत हो सकते हैं।
हालांकि मानसून के दौरान लगातार बादल रहने से ऑप्टिकल सैटेलाइट से निगरानी मुश्किल हो जाती है। इसलिए वैज्ञानिकों ने रडार आधारित सैटेलाइट मॉनिटरिंग को जमीनी निरीक्षण से जोड़ने की सलाह दी है।
चेतावनी का संकेत
धराली की यह घटना केवल एक स्थानीय आपदा नहीं बल्कि पूरे हिमालय के लिए एक चेतावनी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने के कारण हिमालय में नए प्रकार के क्रायो-हाइड्रोलॉजिकल खतरे उभर रहे हैं।
ऐसे में समय रहते वैज्ञानिक निगरानी और मजबूत चेतावनी तंत्र विकसित करना ही भविष्य में होने वाली संभावित आपदाओं से बचने का एकमात्र रास्ता हो सकता




