डिजिटल इंडिया की हकीकत—रसोई गैस संकट में लौटते कदम 80 के दशक की ओर”

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संपादकीय,उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले, विशेषकर रुद्रपुर में इन दिनों रसोई गैस को लेकर जो हालात दिखाई दे रहे हैं, वह केवल एक आपूर्ति संकट नहीं बल्कि व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करने वाला दृश्य बन चुका है। शहर के सबसे बड़े सार्वजनिक मैदान मोदी मैदान (योगी मैदान) में सुबह पांच बजे से ही लोग अपने गैस सिलेंडर लेकर लाइन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। महिलाओं, बुजुर्गों और मजदूर वर्ग के लोग उम्मीद में घंटों इंतजार कर रहे हैं कि गैस की गाड़ी आएगी और उन्हें सिलेंडर मिल जाएगा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


लेकिन जब लंबे इंतजार के बाद भी गाड़ी नहीं पहुंचती, तो स्वाभाविक रूप से लोगों का धैर्य टूटने लगता है। कई स्थानों पर नागरिकों ने सिलेंडर सड़क पर रखकर जाम लगाने की कोशिश की। यह स्थिति केवल एक मैदान या एक मोहल्ले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे रुद्रपुर शहर में गैस सिलेंडर को लेकर मारामारी का माहौल बनता दिखाई दे रहा है।
सरकारें अक्सर “डिजिटल इंडिया” का नारा देती हैं। दावा किया जाता है कि अब सब कुछ ऑनलाइन है—बुकिंग, डिलीवरी, भुगतान और निगरानी। लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी कहती है। उपभोक्ता ऑनलाइन बुकिंग करते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि सिलेंडर कब मिलेगा। टोल-फ्री नंबर जारी किए जाते हैं, लेकिन अधिकतर समय या तो कॉल व्यस्त रहती है या कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता। ऐसे में आम आदमी के मन में एक ही सवाल उठता है—क्या डिजिटल व्यवस्था वास्तव में काम कर रही है, या सिर्फ कागजों में ही मौजूद है?
वैश्विक परिस्थितियां भी इस संकट की पृष्ठभूमि में दिखाई देती हैं। दुनिया के कई हिस्सों में तनाव बढ़ रहा है और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार भी अस्थिर हो रहा है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल स्थानीय प्रशासनिक तैयारी का है। यदि संभावित संकट की जानकारी थी, तो जनता को पहले से सचेत क्यों नहीं किया गया? यदि पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, तो फिर वितरण व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों दिखाई दे रही है?
सबसे बड़ा खतरा ऐसे समय में कालाबाजारी का होता है। जब किसी आवश्यक वस्तु की कमी का माहौल बनता है, तो कुछ लोग इसका फायदा उठाकर मुनाफाखोरी शुरू कर देते हैं। इसलिए गैस एजेंसियों और वितरकों की जिम्मेदारी बनती है कि वे पूरी पारदर्शिता के साथ जानकारी दें—कितना स्टॉक है, कब गाड़ियां आएंगी और वितरण की स्पष्ट व्यवस्था क्या है।
जिला प्रशासन और उत्तराखंड सरकार को भी इस स्थिति को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यदि गैस की आपूर्ति सामान्य है तो पुरानी व्यवस्था के अनुसार नियमित डिलीवरी सुनिश्चित की जानी चाहिए। यदि किसी कारण से आपूर्ति प्रभावित है, तो जनता को स्पष्ट और ईमानदार जानकारी दी जानी चाहिए। भ्रम की स्थिति सबसे अधिक खतरनाक होती है, क्योंकि इससे अफवाहें और असंतोष दोनों बढ़ते हैं।
आज स्थिति ऐसी बनती दिख रही है कि लोग मजबूरी में वैकल्पिक व्यवस्थाओं की बात करने लगे हैं। कई लोग इंडक्शन चूल्हे की ओर झुक रहे हैं, तो कुछ लोग पारंपरिक लकड़ी के चूल्हों की चर्चा करने लगे हैं। यह विडंबना ही है कि जिस देश में डिजिटल क्रांति की बात हो रही है, वहां रसोई गैस जैसी बुनियादी सुविधा के लिए लोगों को 80 के दशक की याद आने लगी है।
लोकतंत्र में जनता की सहनशीलता की भी एक सीमा होती है। जब मूलभूत जरूरतें प्रभावित होती हैं तो असंतोष धीरे-धीरे आक्रोश में बदल सकता है। इसलिए समय रहते प्रशासन, सरकार और गैस एजेंसियों को मिलकर स्थिति स्पष्ट करनी होगी। पारदर्शिता, नियमित आपूर्ति और सही सूचना—यही तीन उपाय हैं जो इस संकट को टाल सकते हैं।
अन्यथा यह सवाल बार-बार उठेगा कि क्या वास्तव में हम डिजिटल युग में आगे बढ़ रहे हैं, या फिर व्यवस्थागत विफलताओं के कारण धीरे-धीरे 80 के दशक की ओर लौट रहे हैं।


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