“कानून का डंडा या विफलता का पर्दा? उत्तराखंड में बढ़ते अपराध और सरकार की कठोर नियमावली पर सवाल”

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रुद्रपुर,उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त नियमावली लागू करने का निर्णय लिया है। बनभूलपुरा (हल्द्वानी) जैसी घटनाओं के बाद यह कदम निश्चित रूप से कठोर प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कानून व्यवस्था की मजबूती का संकेत है या फिर सरकार अपनी विफलताओं पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


देहरादून से लेकर रुद्रपुर और हरिद्वार तक, हालात किसी से छिपे नहीं हैं। रुद्रपुर जैसे औद्योगिक शहर में रोजगार की तलाश में आने वाले युवाओं की लाशें कभी झाड़ियों में मिलती हैं, तो कभी पुलिया के नीचे, सड़क किनारे, डंपर के नीचे या फिर किसी अज्ञात हादसे में कुचली हुई। यह केवल दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि एक भयावह सामाजिक और प्रशासनिक असंतुलन का संकेत हैं।
देहरादून, जो प्रदेश की राजधानी है, वहां भी अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। खुलेआम फायरिंग, तलवारबाजी और गैंगवार की घटनाएं आम हो चुकी हैं। हरिद्वार जैसे धार्मिक शहर में भी अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। सवाल उठता है कि जब आम नागरिक ही सुरक्षित नहीं है, तो फिर सरकार का यह नया कानून किसके लिए है?
सरकार की नई नियमावली में आयोजकों से वचन-पत्र लेने, वीडियोग्राफी कराने और नुकसान की भरपाई वसूलने जैसे प्रावधान शामिल किए गए हैं। लेकिन क्या इससे अपराध रुकेंगे? क्या इससे उन परिवारों को न्याय मिलेगा, जिनके अपने लोग रोज़ाना अपराध की भेंट चढ़ रहे हैं?
वास्तविकता यह है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। अपराधी बेखौफ हैं और प्रशासन अक्सर घटना के बाद ही सक्रिय होता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार का ध्यान अपराध रोकने से ज्यादा, उसके बाद की वसूली पर केंद्रित हो गया है।
उत्तराखंड को “देवभूमि” कहा जाता है, लेकिन आज यह छवि धूमिल होती नजर आ रही है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो देहरादून, हरिद्वार और रुद्रपुर जैसे शहर अपराध की नई पहचान बन सकते हैं।
सरकार को यह समझना होगा कि कानून केवल कागजों पर सख्त होने से नहीं, बल्कि जमीन पर लागू होने से असर दिखाता है। वरना जनता के मन में यह धारणा और मजबूत होगी कि प्रदेश में “कानून नहीं, केवल दिखावा” चल रहा है।


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