हादसों के बीच मानवता की मशाल—रुद्रपुर में सुशील गाबा जैसे समाजसेवी ही असली पहचान

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रुद्रपुर में एक बार फिर रेल हादसे ने एक परिवार को उजाड़ दिया और समाज को झकझोर कर रख दिया। वार्ड नंबर 33 सिंह कॉलोनी के समीप हुई इस दर्दनाक घटना में एक अधेड़ व्यक्ति की जान चली गई, लेकिन इस दुखद क्षण के बीच जो तस्वीर उभरकर सामने आई, वह इंसानियत की मिसाल भी है।
दुर्घटना की सूचना मिलते ही समाजसेवी सुशील गाबा का मौके पर पहुंचना, पुलिस और जीआरपी के साथ समन्वय बनाना और मृतक की पहचान कराने के लिए हर संभव प्रयास करना यह साबित करता है कि समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जो बिना किसी स्वार्थ के मानवता की सेवा में जुटे हुए हैं।
रुद्रपुर की पहचान केवल औद्योगिक शहर के रूप में नहीं, बल्कि समाजसेवा की परंपरा से भी रही है। ऐसे में सुशील गाबा जैसे लोग इस पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं। जिस तरह से उन्होंने “मोक्ष धाम ग्रुप” के माध्यम से मृतक की पहचान के प्रयास किए, और अंतिम क्षणों तक अपनी जिम्मेदारी निभाई, वह निश्चित ही सराहनीय है।
यह घटना हमें एक कड़वी सच्चाई भी दिखाती है—रेलवे ट्रैक को शॉर्टकट के रूप में इस्तेमाल करने की बढ़ती प्रवृत्ति। आधुनिक इलेक्ट्रिक ट्रेनों की कम आवाज के कारण खतरा और बढ़ गया है। ऐसे में आम जनता को जागरूक होना होगा और प्रशासन को भी सख्त कदम उठाने होंगे।
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद की ओर से सुशील गाबा जैसे कर्मठ समाजसेवियों को सम्मान और आशीर्वाद मिलना स्वाभाविक है। ऐसे लोग ही उस उत्तराखंड की परिकल्पना को साकार कर रहे हैं, जहां संवेदनशीलता, सहयोग और मानवता सर्वोपरि हो।
आज जरूरत है कि समाज ऐसे लोगों से प्रेरणा ले और यह संकल्प करे कि किसी भी विपरीत परिस्थिति में हम एक-दूसरे का सहारा बनेंगे—क्योंकि अंततः यही मानवता की असली पहचान है।


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