

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की नगीना तहसील के नंदपुर गांव में मंदिर परिसर में मूर्तियों के चारों ओर लगातार चक्कर लगाता एक कुत्ता—यह दृश्य जितना भावनात्मक था, उतना ही विचलित करने वाला भी। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही इसे “चमत्कार” घोषित कर दिया गया। किसी ने उसे ‘भैरा बाबा’ कहा, किसी ने ‘भैरवनाथ का अवतार’। देखते-देखते आस्था का ऐसा ज्वार उठा कि मंदिर में भीड़ उमड़ पड़ी, मन्नतें मांगी जाने लगीं, पूजा-अर्चना शुरू हो गई।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
लेकिन हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ने इस घटनाक्रम को भावनाओं की लहर में बहकर नहीं, बल्कि विवेक और जिम्मेदारी के साथ देखा—और सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि यह कोई दैवी चमत्कार नहीं, बल्कि एक बीमार पशु की पीड़ा है, जिसे तत्काल चिकित्सकीय सहायता की जरूरत है। आज जब जांच और इलाज के बाद सच्चाई सामने आ चुकी है, तो यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या आस्था का अर्थ संवेदना छोड़ देना है?
आस्था बनाम अंधविश्वास
भारतीय समाज में आस्था हमारी सांस्कृतिक आत्मा का हिस्सा है। मंदिर, मूर्तियां और श्रद्धा—ये सब हमारे जीवन को दिशा देते हैं। लेकिन जब आस्था विज्ञान और करुणा से कट जाती है, तब वह अंधविश्वास का रूप ले लेती है। नंदपुर में हुआ भी यही। कुत्ता पांच दिनों तक भूखा-प्यासा, ठंड और कमजोरी से जूझता रहा। उसे रजाई ओढ़ा दी गई—यह करुणा का एक छोटा सा संकेत था—लेकिन इलाज नहीं मिला, क्योंकि भीड़ उसे ‘अवतार’ मान चुकी थी।
विज्ञान ने खोला रहस्य
एनजीओ प्रेमपथ की टीम—संध्या रस्तोगी और अश्वनी चित्रांश—ने मौके पर पहुंचकर जो किया, वह सच्ची मानवता का उदाहरण है। जांच में स्पष्ट हुआ कि कुत्ता न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित है, जिसकी वजह से वह बार-बार गोल-गोल घूम रहा था। यह कोई दैवी संकेत नहीं, बल्कि एक चिकित्सकीय स्थिति थी।
फ्रूट थैरेपी से शुरू हुआ इलाज, फिर नोएडा के शिवालय वेलनेस सेंटर में एमआरआई और उपचार—इन सबका नतीजा यह है कि कुत्ता अब धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहा है। एक रात में 250 ग्राम पनीर खाना, सुधार का स्पष्ट संकेत है।
आध्यात्मिकता और विज्ञान: टकराव नहीं, संतुलन
यह घटना हमें सिखाती है कि आध्यात्मिकता और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सच्ची आस्था वही है, जो पीड़ित के दर्द को समझे। अगर कोई जीव कष्ट में है, तो उसकी पूजा नहीं, उसकी रक्षा और उपचार धर्म है।
भगवान के नाम पर अगर किसी बीमार प्राणी को इलाज से वंचित रखा जाए, तो वह भक्ति नहीं—अज्ञान है।
जिम्मेदार पत्रकारिता की भूमिका
इस पूरे प्रकरण में एक और बात स्पष्ट होती है—जिम्मेदार पत्रकारिता का महत्व। जब सोशल मीडिया अफवाहों को चमत्कार बनाकर परोस रहा था, तब हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ने तथ्यों के साथ यह बताया कि मामला बीमारी का है। यह न तो आस्था का अपमान था, न भावनाओं की अवहेलना—बल्कि समाज को सही दिशा देने का प्रयास था।
निष्कर्ष
नंदपुर का यह मामला किसी चमत्कार की कहानी नहीं, बल्कि मानव विवेक की परीक्षा है। अच्छा है कि समय रहते सच सामने आया और कुत्ते की जान बच सकी।
अब जरूरत है कि हम सब—आस्था रखते हुए भी—विज्ञान, करुणा और तर्क को साथ लेकर चलें। क्योंकि धर्म का सार यही है कि किसी भी जीव को पीड़ा में देखकर हम आंखें नहीं मूंदें, बल्कि आगे बढ़कर उसकी मदद करें।
यही संतुलन हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की पत्रकारिता की पहचान है—जहां आध्यात्मिक संवेदना और वैज्ञानिक सत्य, दोनों साथ चलते हैं।




