

उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को अपनी मधुर आवाज़ और भावपूर्ण गीतों से जन-जन तक पहुँचाने वाले प्रसिद्ध लोकगायक दीवान कनवाल के आकस्मिक निधन का समाचार पूरे प्रदेश के लिए अत्यंत दुखद और हृदय विदारक है। उनके जाने से लोकसंगीत जगत में एक ऐसा खालीपन पैदा हो गया है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखाई देती।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
दीवान कनवाल केवल एक गायक नहीं थे, बल्कि वे पहाड़ की आत्मा के स्वर थे। उनके गीतों में उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू, लोकजीवन की पीड़ा, पहाड़ी संस्कृति की गरिमा और जनभावनाओं की गहराई साफ झलकती थी। “द्वी दीना का डीयार, शेरुवा यो दूनी में” जैसे उनके लोकप्रिय लोकगीत आज भी लोगों के दिलों में बसते हैं और पहाड़ की संवेदनाओं को जीवंत कर देते हैं।
आज जब उत्तराखंड की नई पीढ़ी आधुनिकता की दौड़ में अपनी लोकपरंपराओं से दूर होती जा रही है, ऐसे समय में दीवान कनवाल जैसे कलाकार अपनी गायकी के माध्यम से लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रहे थे। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि लोकसंगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति और पहचान का आधार भी है।
उनका आकस्मिक निधन उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के लिए एक गहरी क्षति है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोकाकुल परिवार व उनके असंख्य प्रशंसकों को इस दुखद घड़ी को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
कुमाऊँनी लोकसंगीत के प्रख्यात गायक दीवान सिंह कनवाल उन्होंने महान लोककवि शेर दा अनपढ़ की कालजयी रचना “द्दि दिनाका डयार शेरुआ य दुनी में” को डॉ. अजय ढौंडियाल के साथ गाकर अमर बना दिया। उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा।
गाते-गाते ही लोकधुनों के हमारे प्रिय गायक दीवान कनवाल अनंत यात्रा पर निकल गए। बचपन में रेडियो से लेकर कैसेट, सीडी, सोशल मीडिया और मंचों तक उनकी मधुर आवाज़ गूंजती रही। “द्वी दिनाका ड्यार शेरूवा यौ दुनी में…” जैसे गीत हमेशा दिलों में बसे रहेंगे। कुमाऊँनी लोकगायिकी को नई ऊंचाई देने वाले दिवान दा की कमी हमेशा खलेगी। अभी बहुत गाना था आपको… विनम्र श्रद्धांजलि, नमन।
उत्तराखंड की लोकधुनों में दीवान कनवाल की आवाज़ हमेशा गूंजती रहेगी। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।




