

हालाँकि, इस साल नवरात्रि की शुरुआत एक काफी दुर्लभ खगोलीय संयोग के साथ हो रही है। पहले दिन-यानी घटस्थापना के दिन-का समय पंचक और *खरमास* दोनों के प्रभाव में रहेगा। *खरमास* 15 मार्च से 14 अप्रैल तक रहेगा, जबकि *पंचक* 16 मार्च से 20 मार्च तक प्रभावी रहेगा। आइए, इन विशेष परिस्थितियों में *घटस्थापना* के लिए शुभ समय (*शुभ मुहूर्त*) के बारे में जानें।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
चैत्र नवरात्रि 2026 की तिथियाँ
नवरात्रि के दौरान, घटस्थापना (जिसे कलश स्थापना-पवित्र कलश की स्थापना-भी कहा जाता है) पहले दिन की जाती है, जो प्रतिपदा तिथि (चंद्र मास का पहला दिन) के अनुरूप होती है। इस साल, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 06:52 बजे से 20 मार्च को सुबह 04:52 बजे तक रहेगी। उदया तिथि (सूर्योदय के समय प्रचलित चंद्र तिथि) के आधार पर, *घटस्थापना* विशेष रूप से 19 मार्च को की जाएगी। यह दिन भी *पंचक* और *खरमास* दोनों के प्रभाव में रहेगा।
घटस्थापना के लिए शुभ समय
चैत्र नवरात्रि के लिए, 19 मार्च को घटस्थापना का शुभ समय सुबह 06:52 बजे से सुबह 07:43 बजे तक रहेगा। इसके अतिरिक्त, आपके पास घटस्थापना करने का एक और अवसर अभिजीत मुहूर्त* के दौरान होगा, जो दोपहर 12:05 बजे से दोपहर 12:53 बजे के बीच आता है। अब, आइए चर्चा करें कि पंचक और खरमास का *घटस्थापना* की रस्म पर कितना प्रभाव पड़ेगा।
चैत्र नवरात्रि 2026: अमावस्या के साथ एक दुर्लभ संयोग-और जानें
ज्योतिषी अरुणेश कुमार शर्मा के अनुसार, *खरमास* की अवधि को पारंपरिक रूप से *मांगलिक कार्यों (शुभ सामाजिक समारोहों) के लिए अशुभ माना जाता है। इसलिए, इस दौरान विवाह और शादी जैसे उत्सवों को करने से बचना चाहिए। हालाँकि, इस अवधि के दौरान शुभ धार्मिक गतिविधियों-जैसे देवी की पूजा, धार्मिक अनुष्ठान करना, या *घटस्थापना करना-के संबंध में कोई प्रतिबंध नहीं हैं। आप निर्धारित शुभ समय पर पूरी मन की शांति के साथ घटस्थापना कर सकते हैं। इसके अलावा, राज पंचक के नाम से जाना जाने वाला विशिष्ट चरण 16 मार्च से 20 मार्च तक प्रभावी रहेगा। जो पंचक काल सोमवार से शुरू होता है, उसे राज पंचक के नाम से जाना जाता है। अन्य पंचक कालों के विपरीत, इस विशेष काल को अशुभ नहीं माना जाता है; इसलिए, इस दौरान शुभ गतिविधियाँ या धार्मिक अनुष्ठान करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
घटस्थापना कैसे करें?
ईशान कोण-यानी, घर का उत्तर-पूर्वी कोना-*घटस्थापना करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की सुबह, जल्दी उठें और अपनी सुबह की नित्य क्रियाएँ पूरी करें। इसके बाद, एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ और उस पर देवी दुर्गा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। एक मिट्टी के बर्तन में मिट्टी भरें और उसमें जौ के बीज बोएँ। तत्पश्चात, मिट्टी या तांबे का एक कलश (पूजा का पात्र) लें, उसे पानी से भरें, और उसके अंदर एक सुपारी, एक सिक्का और कुछ *अक्षत* (साबुत चावल के दाने) डालें। कलश के मुख के चारों ओर आम या अशोक के पत्ते बाँधें और उसके ऊपर एक नारियल रखें। अंत में, इस कलश को उस चौकी के पास रखें जहाँ देवी को स्थापित किया गया है।✧ धार्मिक और अध्यात्मिक
नवरात्र के दौरान भक्त मां दुर्गा के चरणों में जौ अर्पित कर खुशहाल जीवन की कामना करते हैं. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, तीसरे दिन फूटने वाले ये अंकुर न सिर्फ आपकी साधना की सफलता बताते हैं, बल्कि पूरे साल के उतार-चढ़ाव की भविष्यवाणी भी करते हैं. इसलिए धर्म शास्त्रों के जानकार नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना के दौरान बोए जाने वाले जौ को लेकर विशेष नियमों को पालन करने की सलाह देते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि नवरात्र के दौरान बोए जाने वाले जौ के रंग क्या शुभ-अशुभ संकेत देते हैं.
अंकुरों के रंग देते हैं खास संकेत
सफेद रंग (सबसे शुभ)- अगर जौ के अंकुर दूधिया सफेद रंग के निकलते हैं, तो यह सिद्धियों की प्राप्ति का संकेत है. यह दर्शाता है कि आपकी पूजा सफल हुई और आने वाला साल आर्थिक व मानसिक रूप से अत्यंत लाभकारी रहेगा.
हरा रंग (समृद्धि का प्रतीक)- गहरे हरे रंग के अंकुर घर में धन-धान्य की प्रचुरता का संकेत देते हैं. यह मां दुर्गा की पूर्ण कृपा का प्रतीक है, जो जीवन में स्थिरता और खुशहाली लाता है.
काला रंग (आर्थिक संकट)- अगर जौ काले रंग के उगते हैं, तो यह शुभ संकेत नहीं है. यह पूरे साल दरिद्रता या धन की कमी रहने का अंदेशा देते हैं. ऐसे में विशेष दान-पुण्य की सलाह दी जाती है.
धुएं जैसा या मटमैला रंग (पारिवारिक कलह)- अंकुरों का रंग यदि मटमैला या धुएं जैसा हो, तो यह परिवार में आपसी मनमुटाव, क्लेश या अशांति का पूर्व संकेत होता है.
लाल या रक्त वर्ण (शत्रु और रोग भय)- लाल रंग के अंकुर किसी गंभीर बीमारी या शत्रुओं द्वारा उत्पन्न की गई बाधाओं की ओर इशारा करते हैं.
अंकुरों की बनावट और स्थिति से जुड़े संकेत
जौ का न उगना- अगर पर्याप्त सेवा के बाद भी जौ नहीं उगते, तो यह कार्यों में भारी रुकावट या परिवार में किसी अनहोनी का संकेत हो सकता है.
आधे हरे और आधे पीले- अगर अंकुर नीचे से पीले और ऊपर से हरे हैं, तो इसका अर्थ है कि वर्ष की शुरुआत संघर्षपूर्ण होगी, लेकिन बाद में स्थितियां अनुकूल हो जाएंगी.
अविकसित या तिरछे अंकुर- शकुन शास्त्र के अनुसार, यदि जौ छोटे रह जाएं या तिरछे होकर गिर जाएं, तो यह राष्ट्र और समाज पर बीमारी या बाहरी शत्रुओं के भय को दर्शाते हैं.
नवरात्र में करें जौ से जुड़े से खास उपाय
आर्थिक तंगी दूर करने के लिए- नवरात्र के समापन पर जब आप जौ का विसर्जन करते हैं, तो उसमें से थोड़े से हरे और स्वस्थ अंकुर निकाल लें. इन अंकुरों को एक लाल रेशमी कपड़े में बांधें और साथ में एक चांदी का सिक्का रखें. इसके बाद इसे अपनी तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रख दें. मान्यता है कि ऐसा करने से साल भर घर में अन्न और धन की कमी नहीं होती और मां लक्ष्मी का वास बना रहता है.
नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए- अगर आपको लगता है कि घर में किसी की बुरी नजर है या परिवार के सदस्यों में अक्सर अनबन रहती है, तो यह उपाय बहुत प्रभावी है. इसके लिए विसर्जन के समय थोड़े से जौ के अंकुरों को लेकर पूरे घर के प्रत्येक कमरे में घुमाएं (मंदिर को छोड़कर). इसके बाद इन अंकुरों को जल में प्रवाहित कर दें या पीपल के पेड़ के नीचे रख दें. जौ के इस उपाय से घर की संचित नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेती है और परिवार में शांति का संचार करती है.
अच्छी सेहत के लिए- अगर घर में कोई व्यक्ति लंबे समय से बीमार है, तो जौ के माध्यम से मां दुर्गा से स्वास्थ्य का वरदान मांगा जा सकता है. नवरात्र की नवमी तिथि को थोड़े से अंकुरित जौ बीमार व्यक्ति के सिरहाने रात भर के लिए रख दें. अगले दिन सुबह इन जौ को गाय को खिला दें या बहते जल में प्रवाहित कर दें. शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से सेहत अच्छी रहती है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट इसकी पुष्टि नहीं करता है.)✧ धार्मिक और अध्यात्मिक




