

हल्द्वानी/देहरादून, 2 सितम्बर।
मसूरी गोलीकांड के 31वें शहीद दिवस पर प्रदेशभर में शहीद राज्य आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी हुकुम सिंह कुंवर, श्रीमती बीना कुंवर, नरेश चन्द्र भट्ट, दीपक रौतौला, रजत पंत, जगमोहन चिल्वाल, किरण बोरा, बृजमोहन सिजवाली, योगेश कांडपाल सहित अनेक आंदोलनकारी उपस्थित रहे।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

कार्यक्रम में वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी हुकुम सिंह कुंवर ने भावुक होते हुए कहा कि “मैं स्वयं 1 सितम्बर 1994 को खटीमा में मौजूद था। उस दिन पुलिस की गोली से 8 आंदोलनकारी शहीद हो गए थे। बाद में 2 सितम्बर 1994 को मसूरी गोलीकांड और 2 अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर कांड ने पूरे आंदोलन को नई दिशा दी। 9 नवम्बर 2000 को राज्य तो मिल गया, लेकिन आज 25 साल बाद भी शहीदों के सपनों का राज्य नहीं बन पाया। स्थायी राजधानी गैरसैंण, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे आज भी अधूरे हैं।”

राज्य आंदोलनकारी एवं पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष मोहन पाठक तथा मंच के कुमाऊँ प्रभारी नरेश चन्द्र भट्ट सहित अनेक आंदोलनकारी खटीमा पहुंचे और 1 सितम्बर 1994 के खटीमा गोलीकांड में शहीद हुए राज्य आंदोलनकारियों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि शहीदों की कुर्बानी को भुलाया नहीं जा सकता। उन्हीं की शहादत से राज्य आंदोलन को गति मिली और उत्तराखंड को अलग पहचान मिली। लेकिन आज भी शहीदों के सपनों का उत्तराखंड अधूरा है। श्रद्धांजलि सभा में शहीदों के अमर होने के नारे गूंजते रहे।
श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए मंच के कुमाऊँ प्रभारी नरेश चन्द्र भट्ट ने कहा कि “1 सितम्बर खटीमा गोलीकांड, 2 सितम्बर मसूरी गोलीकांड और 2 अक्टूबर मुजफ्फरनगर कांड उत्तराखंड के इतिहास के काले अध्याय हैं। इन्हीं शहीद आंदोलनकारियों की शहादत से हमें राज्य की पहचान मिली। लेकिन दुर्भाग्य है कि शहीदों के सपनों का उत्तराखंड अब तक नहीं बन पाया। पहाड़ों से पलायन लगातार जारी है, रोजगार और चिकित्सा सुविधाओं की स्थिति दयनीय है, और जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा अभी भी चुनौती बनी हुई है।”
इस अवसर पर खटीमा गोलीकांड में शहीद हुए आंदोलनकारियों प्रताप सिंह, सलीम अहमद, भगवान सिंह, धर्मा नन्द भट्ट, गोपी चन्द, परमजीत सिंह, रामपाल और भुवन सिंह को श्रद्धांजलि दी गई।
✍️ संपादकीय :हल्द्वानी में आयोजित श्रद्धांजलि सभा केवल शहीदों को याद करने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उत्तराखंड की अधूरी आकांक्षाओं का आईना भी था। मसूरी गोलीकांड के 31 वर्ष और राज्य बने 25 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन शहीदों के सपनों का उत्तराखंड आज भी अधूरा है। जिन उद्देश्यों के लिए राज्य आंदोलनकारियों ने प्राणों की आहुति दी – स्थायी राजधानी गैरसैंण, पहाड़ों में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा, पलायन पर रोक और जल-जंगल-जमीन की रक्षा – वे अब भी अधूरे हैं।
श्रद्धांजलि सभा में आंदोलनकारियों ने सही ही कहा कि खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर की त्रासद घटनाएँ इतिहास के काले अध्याय हैं, जिन्होंने राज्य निर्माण की नींव रखी। लेकिन सवाल यह है कि क्या नेताओं ने उस नींव पर मजबूत भवन खड़ा किया? वास्तविकता यह है कि सत्ता में आने वाली सरकारों ने शहीदों की कुर्बानी को केवल राजनीतिक लाभ का साधन बनाया।
आज भी पहाड़ की महिलाएँ पानी के लिए मीलों पैदल चलती हैं, मरीज रेफर होकर मैदानों की ओर भागते हैं और युवा बेरोजगारी के कारण प्रवास करने को मजबूर हैं। ऐसे में श्रद्धांजलि तभी सार्थक होगी जब हम शहीदों के सपनों को जीते हुए उनके अधूरे सपनों को पूरा करने की दिशा में ठोस कदम उठाएँ। वरना श्रद्धांजलि सभाएँ केवल औपचारिकता बनकर रह जाएँगी।
श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित सभी आंदोलनकारियों ने एक स्वर से नारा लगाया –शहीद राज्य आंदोलनकारी अमर रहे… अमर रहे…”




