कर्ज़ में डूबता उत्तराखंड: विकास के नाम पर लूट का गणित और कमीशनखोरी की अर्थव्यवस्था

Spread the love


उत्तराखंड, जिसे राज्य आंदोलनकारियों ने “छोटा, सुंदर और आत्मनिर्भर पर्वतीय राज्य” के रूप में देखा था, आज 25 वर्षों में कर्ज़ का बोझ ढोता हुआ ऐसा प्रदेश बन चुका है, जहां विकास से ज्यादा चर्चा कमीशन, टेंडर, सेटिंग और सत्ता-संरक्षित लूट की होती है।
राज्य पर बढ़ता कर्ज अब केवल वित्तीय चिंता नहीं, बल्कि राजनीतिक और नैतिक पतन का आईना बन चुका है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
कर्ज का डरावना सच
सरकारी दस्तावेज़ और वित्तीय रिपोर्टें खुद चीख-चीख कर बता रही हैं कि उत्तराखंड आर्थिक रूप से किस दिशा में जा रहा है।
2022-23 में राज्य पर कर्ज 72,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका था (कैग रिपोर्ट)
2025 तक यह आंकड़ा 80,000 करोड़ रुपये पार कर चुका है
CEIC डेटा के अनुसार
मार्च 2025 में आंतरिक ऋण: ₹63,931 करोड़
मार्च 2024 में यही आंकड़ा ₹56,721 करोड़ था
यानी एक साल में ही हजारों करोड़ का अतिरिक्त बोझ।
यह कर्ज केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि हर उत्तराखंडी के माथे पर चढ़ा कर्ज है, जो आने वाली पीढ़ियों को चुकाना पड़ेगा।
प्रति व्यक्ति कर्ज: हर नागरिक पर एक लाख का बोझ
अनुमान है कि 2024-25 में प्रति व्यक्ति कर्ज ₹1 लाख तक पहुंच गया।
यह वही उत्तराखंड है जहां—
युवा बेरोजगार हैं
पहाड़ खाली हो रहे हैं
शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था जर्जर है
किसान, सैनिक और मजदूर कर्ज में दबा है
सवाल यह है कि अगर राज्य कर्ज लेकर समृद्ध हो रहा होता, तो जनता गरीब क्यों होती?
कर्ज का असली कारण: विकास नहीं, कमीशन
सरकारें हमेशा कहती हैं—
“कर्ज बुनियादी ढांचे के विकास के लिए लिया गया है।”
लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि उत्तराखंड में विकास से पहले कमीशन तय होता है।
विधायक निधि से लेकर मेगा प्रोजेक्ट तक—40% का खेल
विधायक निधि से काम कराना हो → 40% कमीशन
टेंडर निकालना हो → अलग कमीशन
टेंडर पास कराना हो → अलग कमीशन
इंजीनियर की साइन चाहिए → अलग कमीशन
भुगतान रिलीज़ कराना हो → अलग कमीशन
यानी 100 रुपये का काम → 60 रुपये कागज़ों में, 40 रुपये जेबों में।
और फिर वही नेता, वही मंत्री, वही अफसर मंच से कहते हैं—
“प्रदेश कर्ज में क्यों है, यह चिंता का विषय है।”
राजनेता, जनप्रतिनिधि और नौकरशाह: संपत्ति का पहाड़
उत्तराखंड में बीते 20-25 वर्षों में एक अजीब चमत्कार हुआ है—
कई मंत्री साधारण पृष्ठभूमि से आए
कई अफसर मध्यमवर्गीय परिवारों से
कई जनप्रतिनिधि आंदोलनकारी छवि के साथ
लेकिन सत्ता में आते-आते—
फार्महाउस
होटल
रिसॉर्ट
बिल्डर प्रोजेक्ट
बेनामी जमीन
बच्चों के नाम अकूत संपत्ति
यह संपत्ति वेतन से नहीं, व्यवस्था की लूट से बनी है।
अगर भरपाई हो जाए तो उत्तराखंड कर्जमुक्त हो सकता है
एक सीधा-सा सवाल—
अगर उन राजनेताओं, जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों से वसूली हो जाए, जिन्होंने अपने राजनीतिक और सरकारी कार्यकाल में अवैध संपत्ति अर्जित की, तो क्या उत्तराखंड कर्जमुक्त नहीं हो सकता?
उत्तर है— बिल्कुल हो सकता है।
40% कमीशन की वसूली
फर्जी टेंडरों की जांच
बेनामी संपत्तियों की कुर्की
आय से अधिक संपत्ति मामलों की निष्पक्ष कार्रवाई
अगर यह सब हो जाए, तो कर्ज माफ नहीं—खत्म हो सकता है।
कर्ज और विकास का झूठा नैरेटिव
उत्तराखंड में अक्सर तुलना की जाती है—
“देखिए, सड़क बनी… पुल बना… सुरंग बनी…”
लेकिन सवाल यह नहीं है कि बना क्या, सवाल यह है कि—
लागत कितनी थी?
गुणवत्ता कैसी है?
कितनी बार मरम्मत हो रही है?
कितने साल में सड़क उखड़ गई?
हर बार जवाब मिलता है—
“जांच बैठा दी गई है।”
जांच बैठती है, लेकिन निष्कर्ष नहीं निकलता।
जनता की भूमिका: सबसे बड़ी विफलता
यह भी कड़वा सच है कि—
जनता सब जानती है
फिर भी वोट देती है
फिर गाली देती है
फिर भूल जाती है
उत्तराखंड में जनता बहुत जल्दी भावनाओं में बह जाती है—
कभी धर्म
कभी जाति
कभी क्षेत्र
कभी चेहरे
और फिर वही चेहरे, वही लोग, वही सिस्टम।
जब राजनीतिक जंजीरें टूटें—उत्तराखंड की असली क्षमता
इतिहास गवाह है—
जब उत्तराखंड को राजनीतिक जंजीरों से थोड़ी भी राहत मिली है, उसने तेज़ी से विकास किया है।
स्वयंसेवी संस्थाओं ने
स्थानीय युवाओं ने
ग्राम सभाओं ने
बिना सरकारी लूट के—
पर्यटन मॉडल खड़े किए
होमस्टे विकसित हुए
जैविक खेती बढ़ी
कल्पना कीजिए—
अगर कमीशनखोरी खत्म हो जाए, तो उत्तराखंड कितनी तेजी से आगे बढ़ सकता है।
यह कर्ज आर्थिक नहीं, नैतिक दिवालियापन है
उत्तराखंड का कर्ज केवल वित्तीय आंकड़ा नहीं— यह नैतिक दिवालियापन का प्रतीक है।
नेताओं का
अफसरों का
व्यवस्था का
जब तक—
सत्ता जवाबदेह नहीं बनेगी
संपत्ति का हिसाब नहीं होगा
जनता सवाल नहीं पूछेगी
तब तक कर्ज बढ़ेगा,
और उत्तराखंड सिर्फ कागज़ों में “देवभूमि” बना रहेगा।
अंतिम सवाल
क्या उत्तराखंड को कर्ज से मुक्त करना असंभव है?
नहीं।
क्या इसके लिए जनता को जागना होगा?
हाँ।
क्या यह लड़ाई लंबी है?
बहुत।
लेकिन याद रखिए—
कर्ज सरकार लेती है, चुकाता आम नागरिक है।
और जब नागरिक सवाल पूछना बंद कर देता है,
तब कर्ज नहीं—लूट स्थायी हो जाती है।

संगठित लूट का लोकतंत्र
उत्तराखंड में भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, बल्कि संगठित व्यवस्था बन चुका है। विधायक निधि से लेकर बड़े प्रोजेक्ट तक, हर स्तर पर कमीशन तय है—नेता, अफसर और ठेकेदार एक ही चेन की कड़ियाँ हैं। विकास के नाम पर लिया गया कर्ज दरअसल इसी लूट की पूंजी है। जनता टैक्स देती है, कर्ज चुकाती है और बदले में खोखले दावे पाती है। जब तक इस संगठित लूट पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक भ्रष्टाचार सत्ता की पहचान बना रहेगा।

राशन में बंधा स्वाभिमान और मौन का विकास मॉडल
उत्तराखंड में विकास अब सड़क, स्कूल या अस्पताल से नहीं, बल्कि 3 किलो गेहूं, 5 किलो चावल, थोड़ी-सी दलिया और एक चुटकी नमक से नापा जा रहा है। सरकार इसे “जनकल्याण” कहती है और लाभार्थी इसे राजनीतिक प्रसाद समझकर स्वीकार कर लेते हैं।
भ्रष्टाचार से उपजा राशन अब जनता की उपयोगिता नहीं, बल्कि आदत बन चुका है। आश्रमों, वितरण केंद्रों और योजनाओं की कतारों में खड़ा व्यक्ति शायद यह भूल चुका है कि स्वाभिमान भी कभी जीवन की जरूरत हुआ करता था।
व्यंग्य यह है कि जो लोग विकास के नाम पर प्रदेश को कर्ज में डुबो रहे हैं, वही लोग मुफ्त राशन देकर जनता की आवाज़ गिरवी रख लेते हैं। और उपभोक्ता—जो सवाल पूछ सकता था—वह तौल में कम निकले गेहूं पर भी चुप रहता है।
यह सिर्फ सरकार की विफलता नहीं, बल्कि उस समाज की भी हार है, जिसने राशन के बदले अपना विवेक सौंप दिया।


Spread the love