

इस चिट्ठी में धुरंधर 2 को मिले सर्टिफिकेट पर भी सवाल किए गए. मनोज ने लिखा, “फिल्म ‘धुरंधर 2’ देखने के बाद, मैं गहरे सदमे, गुस्से और निराशा के कारण यह लेटर लिखने पर मजबूर हूं. इस फिल्म को, इसकी बेहद अश्लील, अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा के बावजूद, बिना किसी जिम्मेदारी के आम जनता के देखने के लिए मंजूरी दे दी गई है.”

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
CBFC ने छोड़ी अपनी जिम्मेदारी
“मुझे उन अश्लील शब्दों को लिखने में भी शर्म आ रही है, जिनका इस्तेमाल फिल्म में दर्जनों बार किया गया है. क्या यही वह कंटेंट का स्तर है जिसे भारत सरकार अब पारिवारिक दर्शकों के लिए स्वीकार्य मानती है? क्या CBFC ने बुनियादी शालीनता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से छोड़ दी है?”
“मैं यह सवाल सीधे तौर पर पूछता हूं क्या CBFC के जिन सदस्यों ने इस फिल्म को मंजूरी दी है, वे इसे अपने परिवारों, अपनी पत्नियों, या इससे भी ज्यादा जरूरी, अपनी बेटियों के साथ बैठकर आराम से देख पाएंगे? क्या वे अपने ही घरों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल होते बर्दाश्त करेंगे? अगर नहीं, तो फिर किस नैतिक आधार पर इसे आम जनता पर थोपा जा रहा है?”
धुरंधर 2 को सर्टिफिकेट देने में बरती गई लापरवारी?
“यह सिर्फ लापरवाही नहीं है. यह जवाबदेही और संवेदनशीलता की पूरी तरह से कमी को दिखाता है. इस तरह के कंटेंट को सर्टिफिकेट देना उन लोगों की काबिलियत, फैसले लेने की क्षमता और जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिन्हें यह अहम भूमिका सौंपी गई है. ये लोग कौन हैं जो यह तय कर रहे हैं कि लाखों भारतीयों को किस तरह का कंटेंट दिखाया जाना चाहिए? CBFC सदस्यों की नियुक्ति करते समय किन योग्यताओं या मानकों का पालन किया जा रहा है? क्या कोई समीक्षा तंत्र मौजूद है, या ऐसे फैसले बिना किसी जवाबदेही के लिए जा रहे हैं?”
“इस तरह का कंटेंट सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करता. यह अश्लीलता को सामान्य बनाता है, सामाजिक मूल्यों को दूषित करता है, और सीधे तौर पर युवा और कोमल मन पर असर डालता है. क्या हम जान-बूझकर पब्लिक डायलॉग और सांस्कृतिक ताने-बाने के इस पतन को होने दे रहे हैं?”
“मैं मांग करता हूं: इस फिल्म को दिए गए सर्टिफिकेट की तुरंत समीक्षा की जाए. जिस आधार पर इस तरह के कंटेंट को मंजूरी दी गई, उसका सार्वजनिक रूप से खुलासा किया जाए. इस फैसले में शामिल अधिकारियों की स्पष्ट जवाबदेही तय की जाए. भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त और बिना किसी समझौते वाली गाइडलाइंस बनाई जाएं.”
“यह आम जनता की चिंता का एक गंभीर मामला है. इस मुद्दे पर चुप्पी या कोई कार्रवाई न करना, इस धारणा को ही मजबूत करेगा कि इस तरह की लापरवाही स्वीकार्य है. मैं जल्द से जल्द एक ठोस जवाब और सुधारात्मक कार्रवाई की उम्मीद करता हू.”
बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रही फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ अब अपने एक खास सीन को लेकर नई सुर्खियों में है. हाल ही में सामने आए एक मेकिंग वीडियो ने दर्शकों को चौंका दिया है, जिसमें रणवीर सिंह का डरावना अवतार नजर आता है. फिल्म के प्रोस्थेटिक और मेकअप आर्टिस्ट प्रीतिशील सिंह ने यह वीडियो शेयर किया, जिसमें ‘घोस्ट बॉर्न ऑफ शैडोज’ लुक को बारीकी से तैयार होते दिखाया गया है. यह लुक सिर्फ डर पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि कहानी के अहम मोड़ को दिखाने के लिए तैयार किया गया है.
जब दिमाग रचता है डर का खेल
फिल्म का यह सीन दो किरदारों-हमजा और पिंडा-के आमने-सामने आने का है, जो कभी बचपन के दोस्त थे लेकिन अब दुश्मन बन चुके हैं. इस टकराव को और गहरा बनाता है पिंडा का नशे में होना. नशे की हालत में पिंडा को मतिभ्रम होने लगता है, जिसमें उसे हमजा का चेहरा एक भूत जैसा दिखता है-राख जैसा रंग, सफेद बाल और काली नसें. इस सीन के जरिए फिल्म यह दिखाती है कि इंसान का कमजोर दिमाग कैसे डर को जन्म देता है.
मेकअप नहीं, पूरी कहानी का हिस्सा है लुक
मेकअप आर्टिस्ट प्रीतिशील सिंह ने वीडियो के साथ लिखा कि जब इंसान मानसिक रूप से थक जाता है, तो उसे झूठ भी सच जैसा लगने लगता है. उनकी यह बात साफ करती है कि यह ‘भूतिया’ लुक असल में किरदार के अंदर चल रहे मानसिक संघर्ष को दर्शाता है, न कि किसी असली भूत को.
किरदारों में ढलने के लिए बदला लुक और शरीर
फिल्म में रणवीर सिंह ने अलग-अलग उम्र के किरदार निभाए हैं, जिसमें उनके लुक, बॉडी लैंग्वेज और स्टाइल में साफ बदलाव नजर आता है. वहीं पिंडा का किरदार निभाने वाले उदयबीर संधू ने भी अपने रोल के लिए 15 किलो तक वजन बढ़ाया और घटाया. यह मेहनत फिल्म को और ज्यादा वास्तविक बनाती है.
तकनीक और इमोशन का जबरदस्त मेल
‘धुरंधर: द रिवेंज’ का यह सीन साबित करता है कि फिल्म सिर्फ एक्शन और ड्रामा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसानी भावनाओं और मानसिक स्थिति को भी गहराई से दिखाती है. यही वजह है कि फिल्म दर्शकों को सिर्फ रोमांच नहीं, बल्कि सोचने पर भी मजबूर कर रही है.




