

उत्तराखंड की राजनीति में कभी-कभी ऐसे दृश्य भी सामने आ जाते हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि समय 2026 का नहीं बल्कि 1990 के दशक का चल रहा है। हाल ही में महिला कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा सिर पर गैस सिलेंडर रखकर निकाली गई पदयात्रा और फिर सिलेंडर की “अंत्येष्टि” का प्रदर्शन ऐसा ही एक दृश्य था। यह प्रदर्शन शायद उस दौर की याद दिलाता है जब रसोई गैस राजनीति का बड़ा मुद्दा हुआ करता था, लेकिन आज जब भारत अंतरिक्ष से लेकर मिसाइल तकनीक तक नई ऊंचाइयों को छू रहा है, तब सिलेंडर की राजनीति किसी पुराने नाटक का हास्य दृश्य लगने लगती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
आज का भारत वह भारत है जिसने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपना झंडा गाड़ा है। वैज्ञानिक 16 हजार किलोमीटर मारक क्षमता वाली मिसाइलों पर काम कर रहे हैं। आधुनिक रेलवे नेटवर्क में वंदे भारत जैसी ट्रेनें दौड़ रही हैं। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में भी रेलवे लाइनें पहुंच चुकी हैं, सुरंगें बन रही हैं, चारधाम ऑल वेदर रोड और बड़े-बड़े बांध विकास की नई कहानी लिख रहे हैं। ऐसे समय में यदि राजनीति का केंद्र केवल गैस सिलेंडर बन जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विपक्ष के पास वास्तव में कोई नया मुद्दा बचा नहीं है?
कांग्रेस की यह राजनीति उस दौर की याद दिलाती है जब आंदोलन और विरोध के प्रतीकात्मक तरीके लोगों को आकर्षित करते थे। मगर आज का समाज और युवा पीढ़ी केवल प्रतीकात्मक नाटकों से प्रभावित नहीं होती। आज का युवा सवाल पूछता है—उत्तराखंड का भविष्य क्या होगा? यहां पलायन कैसे रुकेगा? स्थायी राजधानी का निर्णय कब होगा? मूल निवास 1950 का मुद्दा क्यों अटका हुआ है? राज्य में बढ़ते नशे के खिलाफ ठोस नीति क्यों नहीं बनती? भूमि अतिक्रमण और तथाकथित लैंड जिहाद जैसे मुद्दों पर राजनीति क्यों चुप रहती है?
विडंबना यह है कि इन गंभीर सवालों पर चर्चा करने के बजाय कांग्रेस बार-बार वही पुरानी स्क्रिप्ट निकाल लेती है, जो शायद 30 साल पहले भी इस्तेमाल हो चुकी है। गैस सिलेंडर को फूल-माला पहनाकर उसकी अंत्येष्टि करना और चूल्हे पर रोटी बनाकर विरोध जताना राजनीतिक रंगमंच का दृश्य तो हो सकता है, लेकिन इससे राज्य की जटिल समस्याओं का समाधान नहीं निकलता।
दरअसल उत्तराखंड की जनता अब बहुत कुछ देख और समझ चुकी है। यह वही जनता है जिसने राज्य आंदोलन में संघर्ष किया, सड़कें जाम कीं, जेलें भरीं और अंततः अलग राज्य का सपना पूरा कराया। उस आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं था बल्कि उत्तराखंड की पहचान, संसाधनों और भविष्य की रक्षा करना था।
आज उसी उत्तराखंड में मूल निवास 1950 का मुद्दा फिर चर्चा में है। राज्य के युवाओं का मानना है कि जब तक स्थानीय लोगों के अधिकार सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक रोजगार और संसाधनों पर बाहरी दबाव बना रहेगा। इसी तरह भूमि खरीद-फरोख्त और अतिक्रमण को लेकर भी समाज में बेचैनी बढ़ रही है। कई सामाजिक संगठन इसे “लैंड जिहाद” जैसे शब्दों से जोड़कर चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते नियंत्रण नहीं हुआ तो पहाड़ की सामाजिक संरचना प्रभावित हो सकती है।
इसके साथ-साथ नशे की समस्या भी उत्तराखंड के लिए एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। सीमावर्ती क्षेत्रों से लेकर मैदानी जिलों तक युवाओं में नशे की लत बढ़ने की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक संकट का संकेत है।
इन सभी प्रश्नों के बीच एक और पुराना लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दा बार-बार उठता है—उत्तराखंड की स्थायी राजधानी का। राज्य गठन के 25 साल बाद भी यह सवाल अधूरा है। गैंरसैंण को लेकर लंबे समय से भावनात्मक और राजनीतिक बहस चलती रही है। कभी इसे स्थायी राजधानी बनाने की मांग उठती है, तो कभी इसे केवल प्रतीकात्मक विधानभवन तक सीमित कर दिया जाता है।
ऐसे में जनता यह अपेक्षा करती है कि विपक्ष इन गंभीर मुद्दों पर ठोस और रचनात्मक बहस करे। लेकिन यदि राजनीति केवल गैस सिलेंडर तक सिमट जाए, तो यह लोकतंत्र की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े करता है।
दरअसल राजनीति का भी एक विकासक्रम होता है। जैसे-जैसे समाज बदलता है, वैसे-वैसे राजनीतिक विमर्श भी बदलता है। 1990 के दशक में जो मुद्दे प्रासंगिक थे, जरूरी नहीं कि वही मुद्दे 2026 में भी जनता को उतने ही प्रभावित करें। आज के मतदाता के सामने तकनीक, रोजगार, पर्यावरण, पर्यटन, पलायन और सामाजिक संतुलन जैसे नए प्रश्न हैं।
इसलिए जब देश चंद्रमा तक पहुंच चुका है और वैज्ञानिक मिसाइलों की नई पीढ़ी विकसित कर रहे हैं, तब यदि राजनीति का दृश्य केवल सिलेंडर ढोने तक सीमित रह जाए तो यह व्यंग्य का विषय बन जाता है। ऐसा लगता है जैसे कोई पुरानी फिल्म का दृश्य आज के डिजिटल युग में फिर से मंचित किया जा रहा हो।
राजनीतिक दलों को समझना होगा कि जनता अब प्रतीकात्मक नाटकों से अधिक ठोस नीतियों और दूरदर्शी नेतृत्व की अपेक्षा करती है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और रणनीतिक राज्य में यह अपेक्षा और भी अधिक है।
आखिरकार लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल विरोध करना नहीं बल्कि बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना भी होती है। यदि विपक्ष अपने मुद्दों और रणनीति को समय के साथ नहीं बदलेगा, तो जनता भी धीरे-धीरे उससे दूरी बना लेगी।
शायद यही कारण है कि आज उत्तराखंड की राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है—क्या कांग्रेस अभी भी 90 के दशक की राजनीति में अटकी हुई है, जबकि देश और समाज 21वीं सदी की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ चुका है?




