

हम सब उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों की सरकार को दो टूक चेतावनी:
वीआईपी सलाखों के पीछे जाएँ, हर आरोप की निष्पक्ष जांच हो—वरना होगा राज्यव्यापी आंदोलन

हम सब उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों की ओर से सरकार को अंतिम चेतावनी
हम सब उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, जिन्होंने इस राज्य के निर्माण के लिए संघर्ष किया, लाठियाँ खाईं, जेल गए और अपने भविष्य को दांव पर लगाया—आज एक बार फिर मजबूर होकर सरकार को चेतावनी दे रहे हैं। यह चेतावनी किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा, उसकी बेटियों की सुरक्षा और संविधान की गरिमा के पक्ष में है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड और उससे जुड़े हालिया घटनाक्रम ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी यदि प्रभावशाली वीआईपी चेहरे कानून के दायरे से बाहर दिखाई देते हैं, तो यह केवल न्याय व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि राज्य आंदोलन के मूल उद्देश्यों का अपमान है। हम स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि सत्ता, पद और रसूख किसी को भी कानून से ऊपर नहीं बना सकते।
हम सब राज्य आंदोलनकारियों की मांग है कि अंकिता भंडारी प्रकरण में जिन वीआईपी नामों पर दबाव, संरक्षण, सबूत मिटाने या साजिश के आरोप हैं, उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे डाला जाए। केवल छोटे या नाममात्र के आरोपियों पर कार्रवाई कर सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। जब तक असली चेहरे सामने नहीं आएंगे, तब तक न्याय अधूरा ही माना जाएगा।
इसके साथ ही, हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर जो महिला गंभीर आरोप लगा रही है, उसकी भूमिका की भी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। न तो किसी महिला को भावनाओं के आधार पर निर्दोष घोषित किया जा सकता है और न ही बिना जांच दोषी ठहराया जा सकता है। सत्य केवल जांच से निकलेगा, शोर से नहीं।
यदि महिला द्वारा लगाए गए आरोप झूठे पाए जाते हैं, तो यह समाज में नफरत और अविश्वास फैलाने का गंभीर अपराध है और अंकिता जैसी पीड़िता की स्मृति का अपमान है। और यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह उत्तराखंड की राजनीति पर सबसे बड़ा कलंक होगा, जिसमें सत्ता के संरक्षण में महिलाओं के शोषण की पुष्टि होगी। दोनों ही स्थितियों में जवाबदेही तय होनी चाहिए।
हम सब राज्य आंदोलनकारी सरकार से यह सवाल पूछते हैं—क्या उत्तराखंड केवल आम लोगों के लिए कानून वाला राज्य है? क्या वीआईपी के लिए अलग न्याय व्यवस्था है? यदि ऐसा है, तो यह वही उत्तराखंड नहीं है, जिसके लिए हमने संघर्ष किया था।
हम साफ चेतावनी देते हैं कि यदि सरकार ने जल्द ठोस और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की, तो राज्य आंदोलनकारी चुप नहीं बैठेंगे। यह आंदोलन केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्यव्यापी जनआंदोलन का रूप लेगा। हम न्याय चाहते हैं, दिखावा नहीं।
उत्तराखंड किसी की निजी जागीर नहीं है। यह शहीदों, आंदोलनकारियों और संघर्ष की उपज है। इसकी अस्मिता से खिलवाड़ अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
या तो दोषी वीआईपी सलाखों के पीछे होंगे और सच्चाई सामने आएगी,
या फिर सरकार को हम सब उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों के सामूहिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।
अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर सोशल मीडिया और राजनीति के केंद्र में आ गया है, जहाँ महिलाओं के बीच सार्वजनिक आरोप–प्रत्यारोप, कथित ऑडियो, और नेताओं के नामों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया पर अभद्र और मर्यादाहीन भाषा के प्रयोग ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया है। आरोप हैं कि सत्ता के प्रभावशाली लोगों द्वारा महिलाओं पर दबाव डाला गया, जबकि दूसरी ओर इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए सीबीआई जांच की मांग की जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह उजागर किया है कि कैसे राजनीति में महिलाओं का उपयोग, चरित्र हनन और पीड़िता के नाम का राजनीतिकरण किया जाता है। महिला आयोग ने मामले पर कड़ा संज्ञान लेते हुए चेताया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अश्लीलता, भ्रामक आरोप और महिला अस्मिता से खिलवाड़ स्वीकार्य नहीं है। यह प्रकरण केवल एक हत्या नहीं, बल्कि सत्ता, नैतिकता और न्याय व्यवस्था की गंभीर परीक्षा बन चुका है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
जब सत्ता, स्त्री और सोशल मीडिया एक-दूसरे से टकराते हैं :
अंकिता भंडारी के नाम पर चल रही ‘नैतिक अराजकता’ का उत्तराखंड**
उत्तराखंड आज स्तब्ध है।
न केवल इसलिए कि अंकिता भंडारी जैसी बेटी की हत्या को तीन वर्ष बाद भी पूरा न्याय नहीं मिला, बल्कि इसलिए भी कि उसी बेटी के नाम पर आज सोशल मीडिया की अदालत में स्त्रियाँ एक-दूसरे पर ऐसे आरोप लगा रही हैं, जिनसे पूरा समाज शर्मसार हो रहा है।
यह केवल दो महिलाओं या कुछ नेताओं का विवाद नहीं रह गया है।
यह प्रश्न है — राजनीति में महिलाओं के उपयोग, शोषण, बदनाम करने की संस्कृति, और सत्ता के चारों ओर पनपती उस मानसिकता का, जिसमें स्त्री को कभी सौदे, कभी सीढ़ी और कभी ढाल बनाया जाता है।
अंकिता भंडारी : एक हत्या नहीं, एक व्यवस्था का चेहरा
अंकिता भंडारी की हत्या कोई साधारण अपराध नहीं थी।
वह एक सत्ता-संरक्षित वातावरण, वीआईपी दबाव, और ‘एडजस्टमेंट कल्चर’ का नतीजा थी—ऐसा आरोप स्वयं मामले से जुड़े तथ्यों और गवाहियों से उभरता है।
आज जब सोशल मीडिया पर फिर से यह कहा जा रहा है कि
“अंकिता पर दबाव डाला गया कि वह एक प्रभावशाली नेता के लिए ‘उपलब्ध’ हो”
तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि
क्या यह पहली अंकिता थी?
और क्या वह आख़िरी होती, अगर उसने इंकार न किया होता?
सत्ता और स्त्री : आत्मसमर्पण या सौदा?
उत्तराखंड ही नहीं, पूरे देश की राजनीति में एक कड़वा सच यह है कि
कई नेताओं के आसपास स्त्रियों की मौजूदगी को ‘चरित्र’ के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन पुरुषों की भूमिका पर चुप्पी साध ली जाती है।
जब कोई महिला सत्ता के करीब होती है —
तो उससे ‘समझौते’ की उम्मीद की जाती है
अगर वह बोलती है — तो उसके चरित्र पर हमला होता है
और अगर दो महिलाएँ आमने-सामने आ जाएँ — तो राजनीति तमाशा बन जाती है
आज सोशल मीडिया पर जो दृश्य है, वह यही बताता है कि
राजनीति ने महिलाओं को सशक्त नहीं किया, बल्कि उन्हें आपस में लड़ने के लिए छोड़ दिया।
सोशल मीडिया : न्याय का मंच या चरित्र हनन का अखाड़ा?
आज फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर जो भाषा चल रही है, वह किसी सभ्य समाज की नहीं लगती।
स्त्रियाँ एक-दूसरे पर—
देह व्यापार
ब्लैकमेल
नेताओं को “परोसने”
जैसे आरोप लगा रही हैं।
यह प्रश्न बेहद गंभीर है —
अगर आरोप झूठे हैं, तो यह सबसे बड़ा चरित्र हनन है।
और अगर सच हैं, तो यह सबसे बड़ा राजनीतिक अपराध।
दोनों ही स्थितियों में दोषी व्यवस्था है।
महिला आयोग की चेतावनी : देर से सही, जरूरी
उत्तराखंड महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कण्डवाल का बयान इस पूरे उबाल के बीच एक संवैधानिक चेतावनी की तरह सामने आया है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि —
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
अश्लीलता और चरित्र हनन की छूट नहीं हो सकती
अंकिता के नाम का राजनीतिक उपयोग उसकी स्मृति का अपमान है
यह वक्तव्य बताता है कि
राज्य को अब ‘दर्शक’ नहीं, ‘संरक्षक’ की भूमिका निभानी होगी।
पर सवाल यह है — क्या केवल भाषा पर कार्रवाई पर्याप्त है?
अगर:
नेताओं के बेटे जेल में हैं
सत्ता के गलियारों में महिलाओं से समझौते की बातें होती हैं
और सबूतों को जेसीबी से मिटाने के आरोप लगते हैं
तो केवल फेसबुक पोस्ट हटाना न्याय नहीं है।
सीबीआई जांच की मांग : डर से या विश्वास से?
जब महिलाएँ स्वयं सीबीआई जांच की मांग कर रही हैं,
तो यह दो बातों का संकेत है —
उन्हें स्थानीय जांच एजेंसियों पर भरोसा नहीं
या वे जानती हैं कि सच्चाई बहुत ऊपर तक जाएगी
यह मांग बताती है कि
उत्तराखंड की राजनीति आज खुद अपने ही दावों के कटघरे में खड़ी है।
नेताओं के लिए सबसे असहज सवाल
अगर कोई महिला कहती है कि —नेताओं के लिए लड़कियों को परोसा जाता है”
तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि वह महिला कैसी है,
बल्कि यह होना चाहिए कि —
वे नेता कौन हैं?
उनके नाम क्यों नहीं लिए जा रहे?
उनकी जांच क्यों नहीं हो रही?
हर बार स्त्री को कठघरे में खड़ा कर देना
पुरुष-प्रधान राजनीति की सबसे पुरानी चाल है।
आज उत्तराखंड क्यों हक्का-बक्का है?
क्योंकि —
एक बेटी मर चुकी है
कई बेटियाँ बोल रही हैं
और सत्ता मौन है
यह मौन ही सबसे बड़ा अपराध है।दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही सवालों में!आज स्थिति यह नहीं रही कि!दाल में कुछ काला है”
बल्कि यह है कि — पूरी दाल को ही जांच की ज़रूरत है।
अंकिता भंडारी का नाम
आज केवल एक केस नहीं,एक नैतिक कसौटी बन चुका है।
अगर—दोषियों को सजा नहीं मिली!नेताओं के चेहरे बेनकाब नहीं हुए!और महिलाओं को केवल मोहरा बनाया गया
तो इतिहास यही लिखेगा कि?उत्तराखंड ने अपनी बेटी को दो बार खोया—
एक बार हत्या में,
दूसरी बार राजनीति में।




