

उत्तराखंड के युवाओं के मन में इन दिनों एक सवाल गूंज रहा है — क्या यह राज्य हमने अपने सपनों के लिए बनाया था, या कुछ नेताओं की रिश्तेदारी को नौकरी देने के लिए? राज्य निर्माण के संघर्ष में हजारों युवाओं ने अपने भविष्य, खून-पसीना और कई ने अपनी जान तक लगा दी, लेकिन आज 25 वर्षों बाद भी उत्तराखंड का युवा बेरोज़गार घूम रहा है, जबकि सत्ता के गलियारों में “रिश्तेदारी नियुक्ति मॉडल” की चर्चा अपने चरम पर है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
ये चर्चा अचानक तेज़ हुई है जब यह आरोप सामने आए कि पूर्व मंत्री अरविन्द पाण्डेय के कार्यकाल (2017–2021) के दौरान उनके रिश्तेदारों को विभिन्न सरकारी शैक्षिक एवं विभागीय पदों पर फर्जी या संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर नियुक्त किया गया। सोशल और राजनीतिक हलकों में उठे प्रश्नों के अनुसार सूची इस प्रकार बताई जा रही है— क्रम नाम मूल स्थान रिश्ता तैनाती (बताया जा रहा आरोप) 1 सुनील पांडे बिहार चचेरे भाई रूड़की इंटर कॉलेज 2 सोनू पांडे बिहार चचेरे भाई हरिद्वार इंटर कॉलेज 3 धमेंद्र पांडे बिहार भतीजा बालिका इंटर कॉलेज, बहादराबाद 4 संतोष पांडे बिहार दामाद संस्कृत विद्यालय, हरिद्वार 5 उज्जवल पांडे बाजपुर भतीजा डायरेक्टर, पंचायती राज कार्यालय 6 रितिक पांडे बाजपुर भतीजा पौड़ी इंटर कॉलेज 7 जय किशन पांडे बाजपुर चचेरे भाई जसपुर आदित्यझा इंटर कॉलेज 8 राजू पांडे बाजपुर भतीजा गुलरभोज इंटर कॉलेज, उधमसिंहनगर
युवाओं, अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों में यह सवाल भी उठ रहा है कि —
क्या उत्तराखंड में नियुक्तियां योग्यता से मिलेंगी या सत्ता के रिश्तेदारी नेटवर्क से?
राज्य में फैल रही चर्चाओं के अनुसार यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि—
- फर्जी या संदिग्ध दस्तावेजों पर नियुक्तियां कराई गईं
- बिहार से लोगों को बुलाकर नौकरियां दिलाई गईं
- पंचायती राज तथा विद्युत विभाग में गलत तरीके से ठेके दिलाए गए
- महज़ टीन शेड वाले कमरे से सत्ता पाकर आलीशान कोठियाँ, लग्जरी गाड़ियाँ और कथित रूप से सैकड़ों एकड़ जमीन तक पहुँच — प्रश्न उठाती है कि क्या राजनीति जनसेवा बनी या धनसेवा?
ये आरोप प्रमाणित नहीं हैं — परंतु आरोप गंभीर हैं, और इसलिए जांच आवश्यक है।
प्रश्न केवल एक व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का है
यह पहला मामला नहीं है जहाँ उत्तराखंड के मंत्रियों या प्रभावशाली नेताओं पर अपने परिजनों व खास लोगों को लाभ पहुँचाने के आरोप लगे हैं। राज्य के पिछले 25 वर्षों के इतिहास को देखें तो लगभग हर सरकार पर नियुक्तियों, ठेकों और तबादलों को लेकर उंगलियां उठती रही हैं। इसलिए आज जो हो-हल्ला है, वह केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं — यह उत्तराखंड की राजनीतिक व्यवस्था की बीमारी पर उंगली उठाता है।
उत्तराखंड क्रांति दल का रुख
उत्तराखंड क्रांति दल ने इस मामले को उठाया है और कहा है कि—
“उत्तराखंड अलग इसलिए नहीं बना था कि मंत्रीगण अपने रिश्तेदारों को नौकरी दिलाएंगे और स्थानीय युवाओं के सपनों को कुचला जाएगा।”
और सवाल यह भी उठाया गया है कि —
“जब नौकरी का हक पहाड़ के युवाओं का था, तब बाहर से लोगों को बुलाकर नियुक्तियां कैसे कराई गईं?”
ये सवाल जनता के सवाल हैं — और जवाब भी जनता को मिलना चाहिए।
मुख्यमंत्री के नाम युवाओं की अपील
आज उत्तराखंड का युवा मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी से एक ही विनती करता है —
यदि राज्य वास्तव में भ्रष्टाचार-मुक्त बनाना है तो ऐसे मामलों की CBI या उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच कराई जाए — ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषी चाहे कोई भी हो, कानून से ऊपर न हो।
संपादक की अंतिम टिप्पणी
उत्तराखंड को हमने आंदोलन से पाया था —
और हम आंदोलन से ही बचाएंगे।
यदि नियुक्तियां रिश्तेदारी से होंगी
और योग्यता दर-दर भटकेगी —
तो यह राज्य फिर से वही संघर्ष देखेगा
जो आज भी पहाड़ की हवा में दर्ज है।
लोकतंत्र में सरकार की असली शक्ति जनता है — और जनता सवाल पूछ रही है।
अब जवाब देना सत्ता का कर्तव्य है।




