क्या 2026 में खुलने वाला मेडिकल कॉलेज मरीजों के लिए वरदान बनेगा या एक और सरकारी लापरवाही का स्मारक?रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज: नींव में सवाल, भविष्य में खतरा? हाईकोर्ट व सीबीआई जांच अब अनिवार्य

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उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2026 में रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज के संचालन की घोषणा कर दी है। मुख्यमंत्री से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक इसे तराई क्षेत्र के लिए “ऐतिहासिक उपलब्धि” बताया जा रहा है। पोस्टर छप रहे हैं, भाषण दिए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर बन रहा ढांचा कई ऐसे सवाल खड़े कर रहा है, जिन्हें नजरअंदाज करना न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना बल्कि अपराध की श्रेणी में आता है।

प्रथम एपिसोड

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
जिस मेडिकल कॉलेज में कल को हजारों मरीज, डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और मेडिकल छात्र दिन-रात रहेंगे, उसी कॉलेज के निर्माण की गुणवत्ता, पारदर्शिता और तकनीकी मानकों पर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं।
यह सिर्फ ईंट, सीमेंट और सरिया का मामला नहीं है—यह मानव जीवन की सुरक्षा का प्रश्न है।
隣 पहला सवाल: पूरे प्रोजेक्ट की वेटेड ड्राइंग आखिर है कहां?
किसी भी बड़े सार्वजनिक निर्माण—विशेषकर अस्पताल या मेडिकल कॉलेज—में पूरे कैंपस की एक समग्र वेटेड स्ट्रक्चरल ड्राइंग अनिवार्य होती है।
यह ड्राइंग तय करती है कि—
पूरा ढांचा कितने भार को सह सकता है
भूकंप, बाढ़ या अन्य आपदाओं में इमारत कितनी सुरक्षित रहेगी
अलग-अलग ब्लॉकों का आपसी भार संतुलन कैसे होगा
लेकिन रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज के मामले में आरोप है कि—
पूरे स्ट्रक्चर की कोई संयुक्त वेटेड ड्राइंग मौजूद ही नहीं है।
केवल अलग-अलग भवनों की ड्राइंग उपलब्ध कराई गई है।
❓ सवाल यह है:
क्या बिना समग्र स्ट्रक्चरल प्लान के इतना बड़ा मेडिकल संस्थान बनाना नियमों के अनुसार है?
क्या CPWD, PWD या स्वास्थ्य विभाग के तकनीकी मैनुअल इसकी अनुमति देते हैं?
यदि नहीं, तो यह तकनीकी चूक नहीं, बल्कि गंभीर लापरवाही है।
離 दूसरा सवाल: ओपीसी की जगह पीपीसी सीमेंट क्यों?
तकनीकी मानकों के अनुसार,
हाई-लोड और मल्टी-स्टोरी स्ट्रक्चर—जैसे मेडिकल कॉलेज, ICU ब्लॉक, ऑपरेशन थिएटर—में सामान्यतः OPC (Ordinary Portland Cement) का उपयोग किया जाता है।
लेकिन आरोप है कि—
स्वीकृत तकनीकी प्रावधानों के बावजूद निर्माण में PPC (Portland Pozzolana Cement) का उपयोग किया जा रहा है।
अब सवाल उठता है:
क्या DPR और टेंडर में PPC की अनुमति थी?
यदि नहीं, तो यह बदलाव किसके आदेश पर किया गया?
क्या यह बदलाव लागत घटाने और मुनाफा बढ़ाने के लिए किया गया?
❗ ध्यान देने वाली बात: सीमेंट में किया गया समझौता इमारत की उम्र और मजबूती से सीधा खिलवाड़ है।
 तीसरा सवाल: सरिया कम करने का खेल—रिंग स्पेसिंग बढ़ाकर
निर्माण से जुड़े विशेषज्ञ जानते हैं कि— रिंग की स्पेसिंग बढ़ाकर सरिया कम करना सबसे आम और खतरनाक तरीका है लागत बचाने का।
रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज के निर्माण में आरोप है कि—
कॉलम और बीम में
निर्धारित दूरी से अधिक स्पेसिंग रखी जा रही है
जिससे सरिया की खपत कम हो
❓ सवाल:
क्या साइट पर मौजूद जूनियर इंजीनियर और असिस्टेंट इंजीनियर इस गड़बड़ी को नहीं देख रहे?
या सब कुछ “देखकर भी अनदेखा” किया जा रहा है?
यह वही तरीका है जिससे देश में कई पुल, स्कूल और अस्पताल समय से पहले जर्जर हो चुके हैं।
️ चौथा सवाल: थर्ड पार्टी ऑडिट—वास्तविक या औपचारिक?
सरकार अक्सर गुणवत्ता के सवाल पर एक जवाब देती है—
“थर्ड पार्टी ऑडिट हो रहा है।”
लेकिन रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज में जिस थर्ड पार्टी ऑडिट रिपोर्ट का हवाला दिया जा रहा है, उस पर भी गंभीर सवाल हैं:
ऑडिट एजेंसी का चयन कैसे हुआ?
क्या वह एजेंसी पूरी तरह स्वतंत्र है?
क्या ऑडिट साइट विजिट आधारित है या फाइलों पर?
यदि ऑडिट सिर्फ कागजों का खेल है, तो वह जनता को भ्रमित करने के अलावा कुछ नहीं।
茶 पांचवां सवाल: सीमेंट के दो अलग-अलग बिल—क्या संकेत?
निर्माण में सामग्री की खरीद सबसे संवेदनशील पहलू होती है।
आरोप है कि—
सीमेंट के दो अलग-अलग बिल पाए गए हैं।
यह सीधा संकेत देता है:
भुगतान में हेराफेरी
कम गुणवत्ता की सामग्री की आपूर्ति
या फर्जी बिलिंग

रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज: हाईकोर्ट व सीबीआई जांच अब अनिवार्य
रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज के निर्माण को लेकर सामने आई गंभीर तकनीकी और वित्तीय अनियमितताओं ने राज्य सरकार के दावों की पोल खोल दी है। करोड़ों रुपये की लागत से बन रहे इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में यदि प्रारंभ से ही गुणवत्ता, पारदर्शिता और सुरक्षा मानकों से समझौता किया गया है, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि जनजीवन से सीधा खिलवाड़ है।
पूरे कैंपस की वेटेड स्ट्रक्चरल ड्राइंग का अभाव, ओपीसी सीमेंट की जगह पीपीसी का कथित उपयोग, सरिया कम करने के आरोप, संदिग्ध थर्ड पार्टी ऑडिट और सीमेंट के दो अलग-अलग बिल—ये सभी तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मामला महज तकनीकी भूल तक सीमित नहीं है। यह संभावित रूप से एक सुनियोजित निर्माण घोटाला भी हो सकता है।
ऐसे में इस प्रकरण की जांच न तो विभागीय अधिकारियों के भरोसे छोड़ी जा सकती है और न ही औपचारिक स्पष्टीकरण से काम चलाया जा सकता है। उत्तराखंड हाईकोर्ट को स्वतः संज्ञान लेते हुए एक स्वतंत्र तकनीकी जांच के आदेश देने चाहिए, वहीं सीबीआई या किसी निष्पक्ष केंद्रीय एजेंसी से वित्तीय लेन-देन और सामग्री खरीद की जांच कराई जानी चाहिए।
जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक निर्माण कार्य पर रोक लगाना ही जनहित में होगा। रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज जनता का सपना है—उसे भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ा होने से बचाना सरकार की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है।


❓ सवाल:
क्या जिला प्रशासन ने इन बिलों की जांच की?
क्या वित्तीय ऑडिट कराया गया?
यदि नहीं, तो यह आर्थिक अनियमितता की ओर इशारा करता है।
️ निर्माण एजेंसी और अधिकारियों की भूमिका
सबसे बड़ा सवाल यही है कि—
यह कार्य किस कंपनी को सौंपा गया?
कंपनी का पिछला रिकॉर्ड क्या है?
क्या कंपनी पर पहले भी गुणवत्ता संबंधी सवाल उठे हैं?
इसके साथ ही—
साइट पर तैनात इंजीनियर
परियोजना प्रबंधक
विभागीय अधिकारी
और जिला प्रशासन
सबकी सामूहिक जिम्मेदारी बनती है।
यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो—  सरकार को सारी ड्राइंग, ऑडिट रिपोर्ट और सामग्री परीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए।
️ जिला प्रशासन और उत्तराखंड सरकार कटघरे में
रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज कोई निजी प्रोजेक्ट नहीं है। यह—
जनता के टैक्स के पैसे से बन रहा है
राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ बनने वाला है
ऐसे में—
क्या जिला प्रशासन केवल उद्घाटन की तारीख गिन रहा है?
क्या सरकार गुणवत्ता की जगह केवल समय-सीमा पर ध्यान दे रही है?
इतिहास गवाह है—
जल्दबाजी में बने सरकारी भवन ही बाद में घोटालों और हादसों की वजह बनते हैं।
⚠️ 2026 से पहले जवाब जरूरी
सरकार की घोषणा से पहले कुछ बुनियादी सवालों के जवाब अनिवार्य हैं:
क्या पूरे कैंपस की वेटेड स्ट्रक्चरल ड्राइंग मौजूद है?
सीमेंट और सरिया के मानकों का पालन हुआ या नहीं?
थर्ड पार्टी ऑडिट की निष्पक्ष जांच क्यों न हो?
वित्तीय लेन-देन की CAG या विजिलेंस जांच क्यों न हो?

विकास नहीं, गुणवत्ता चाहिए
रुद्रपुर मेडिकल कॉलेज का निर्माण तराई क्षेत्र के लिए सपना है। लेकिन यदि यह सपना—
घटिया निर्माण
तकनीकी समझौते
और प्रशासनिक चुप्पी
पर खड़ा होगा, तो यह भविष्य में डरावना सच बन सकता है।
उत्तराखंड की जनता को भवन नहीं, भरोसा चाहिए।
और भरोसा तभी बनेगा, जब सरकार, प्रशासन और निर्माण एजेंसी सवालों से भागने के बजाय जवाब दें।

क्रमशः


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