उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता से जुड़े संशोधन को राज्यपाल की मंजूरी मिलने के साथ ही राज्य के नागरिक कानून ढांचे को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। इस संशोधन के तहत पंजीकरण प्रावधानों को अनिवार्य और अधिक प्रभावी बनाया गया है, ताकि कानून का पालन सुनिश्चित हो और पहले चरण के कार्यान्वयन के दौरान सामने आई प्रक्रियागत कमियों को दूर किया जा सके।

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राज्य सरकार का मानना है कि अनिवार्य पंजीकरण से पारदर्शिता बढ़ेगी, कानूनी स्पष्टता आएगी और व्यक्तिगत नागरिक मामलों में समानता का सिद्धांत अधिक मजबूती से लागू हो सकेगा। इसके साथ ही उत्तराखंड को देश में व्यापक नागरिक कानून सुधारों के लिए एक प्रयोगात्मक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करने की दिशा भी स्पष्ट होती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

यूसीसी के तहत अनिवार्य पंजीकरण से जवाबदेही और कानूनी स्पष्टता पर जोर

संशोधित समान नागरिक संहिता में विवाह, तलाक और उनसे जुड़े अन्य नागरिक मामलों के लिए पंजीकरण को अनिवार्य आधार के रूप में स्थापित किया गया है। सरकार का तर्क है कि व्यक्तिगत नागरिक संबंधों का औपचारिक दस्तावेजीकरण न केवल कानूनी रूप से आवश्यक है, बल्कि इससे भविष्य में उत्पन्न होने वाले विवादों को भी रोका जा सकता है। विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अनौपचारिक या अपंजीकृत संबंधों के कारण अक्सर कानूनी संरक्षण कमजोर पड़ जाता है।

संशोधन के बाद पंजीकरण अब केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह एक कानूनी दायित्व बन गया है, जिसके उल्लंघन पर स्पष्ट परिणाम तय किए गए हैं। इससे पहले कई मामलों में नागरिक संबंध औपचारिक रिकॉर्ड से बाहर रह जाते थे, जिससे कानूनी अस्पष्टता और न्याय में देरी की स्थिति बनती थी। अनिवार्य पंजीकरण के माध्यम से राज्य एक व्यापक और भरोसेमंद नागरिक डाटाबेस तैयार करना चाहता है, जो प्रशासन, विवाद निपटान और नीति निर्माण में सहायक हो सके।

इस बदलाव के साथ उत्तराखंड सरकार ने डिजिटल नागरिक सेवाओं को भी प्राथमिकता दी है। यूसीसी के तहत बड़ी संख्या में पंजीकरण अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए किए जा रहे हैं, जिससे नागरिकों को दूर-दराज के इलाकों से भी बिना बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाए प्रक्रिया पूरी करने की सुविधा मिल रही है। सरकार का दावा है कि तकनीक आधारित यह व्यवस्था न केवल कार्यकुशलता बढ़ा रही है, बल्कि डेटा सुरक्षा और गोपनीयता का भी ध्यान रखती है।

राज्यपाल द्वारा संशोधन को मंजूरी यह संकेत देती है कि सरकार यूसीसी को एक स्थिर कानून के बजाय निरंतर समीक्षा और सुधार की प्रक्रिया के रूप में देख रही है। प्रारंभिक चरण में सामने आई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नियमों को अधिक स्पष्ट और लागू करने योग्य बनाया जा रहा है। अनिवार्य पंजीकरण पर जोर इस सोच को दर्शाता है कि समान नागरिक अधिकार तभी प्रभावी होंगे, जब कानूनी प्रक्रियाएं पारदर्शी, सुलभ और सभी पर समान रूप से लागू हों।

समर्थकों का कहना है कि यह संशोधन संविधान के समानता के सिद्धांत को मजबूत करता है, क्योंकि इससे व्यक्तिगत मामलों में मनमानी या विवेकाधीन व्याख्या की गुंजाइश कम होती है। औपचारिक दस्तावेज नागरिकों को कानूनी प्रमाण प्रदान करते हैं, जिनका उपयोग न्यायालयों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किया जा सकता है। साथ ही, सरकार ने प्रक्रिया को सरल और डिजिटल रखकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि सख्ती नागरिकों पर अनावश्यक बोझ न बने।

शासन सुधारों की व्यापक सोच और विकसित होती समान नागरिक संहिता की दिशा

यूसीसी में किया गया यह संशोधन उत्तराखंड सरकार की उस व्यापक शासन रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य नागरिक प्रशासन को आधुनिक बनाना और सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढालना है। समान नागरिक संहिता को लागू करने के बाद से ही सरकार इसे एक जीवंत ढांचा मान रही है, जिसे अनुभवों के आधार पर समय-समय पर संशोधित किया जा सकता है। हालिया बदलाव इसी सोच का परिणाम है, जिसमें पहले चरण के अनुभवों से सीख लेकर प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनाया गया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बार-बार यह स्पष्ट करते रहे हैं कि यूसीसी को केवल प्रतीकात्मक कानून नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का साधन माना जाना चाहिए। सरकार के अनुसार, समान नागरिक कानूनों का उद्देश्य व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करना, भेदभावपूर्ण प्रथाओं को खत्म करना और नागरिक मामलों में एक समान कानूनी मानक स्थापित करना है। अनिवार्य पंजीकरण को इसी दिशा में एक व्यावहारिक कदम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, न कि राज्य के हस्तक्षेप के विस्तार के रूप में।

यह संशोधन प्रशासनिक दक्षता और तकनीक के एकीकरण का भी संकेत देता है। पंजीकरण प्रक्रियाओं के मानकीकरण और डिजिटल प्लेटफॉर्म में एकीकरण से न केवल देरी कम होगी, बल्कि दुरुपयोग और गलत व्याख्या की संभावनाएं भी घटेंगी। सरकार का मानना है कि एक केंद्रीकृत और पारदर्शी पंजीकरण प्रणाली से सार्वजनिक संस्थानों पर भरोसा बढ़ेगा और नागरिकों व प्रशासन के बीच संवाद सरल होगा।

राष्ट्रीय स्तर पर समान नागरिक संहिता को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में भी उत्तराखंड का यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश भर में इस विषय पर विचार-विमर्श के बीच, उत्तराखंड का अनुभव नीति निर्माताओं और कानूनी विशेषज्ञों के लिए एक उदाहरण बन सकता है। राज्य द्वारा समय-समय पर संशोधन कर व्यावहारिक चुनौतियों को संबोधित करना यह दर्शाता है कि क्रमिक सुधार, बड़े और अचानक बदलावों की तुलना में अधिक प्रभावी हो सकते हैं।

यूसीसी के आलोचक जहां सामाजिक स्वीकार्यता और सांस्कृतिक विविधता को लेकर सवाल उठाते रहे हैं, वहीं राज्य सरकार का कहना है कि यह संशोधन मूल अधिकारों में बदलाव नहीं करता, बल्कि केवल प्रक्रियात्मक स्पष्टता पर केंद्रित है। पंजीकरण और प्रशासनिक अनुपालन पर ध्यान देकर सरकार यह दिखाना चाहती है कि समान नागरिक शासन सामाजिक संवेदनशीलता के साथ भी लागू किया जा सकता है।

संशोधित प्रावधानों के लागू होने के साथ ही नागरिकों के दैनिक जीवन में इसके प्रभाव धीरे-धीरे स्पष्ट होंगे। सरकार ने संकेत दिया है कि नियमों के साथ-साथ जागरूकता अभियान और प्रशासनिक सहायता भी प्रदान की जाएगी, ताकि अनिवार्य पंजीकरण बाधा न बने, बल्कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का साधन बने। इस तरह, यह संशोधन केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि समानता, दक्षता और जवाबदेही पर आधारित नागरिक शासन की विकसित होती सोच को दर्शाता है।


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