

हल्द्वानी में आयोजित “युवा परिवर्तन समारोह” ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) अब केवल गढ़वाल तक सीमित नहीं है, बल्कि कुमाऊं की धरती पर भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने लगा है। जिस पार्टी को लंबे समय तक “केवल आंदोलनकारी दल” कहकर नजरअंदाज किया जाता रहा, वह अब संगठित रूप में युवाओं के बीच अपनी पैठ बना रही है।
14 सितम्बर 2025 को हल्द्वानी के क्वालिटी बैंक्वेट हॉल में हुए इस समारोह में युवाओं की भागीदारी मात्र संख्या का प्रतीक नहीं थी, बल्कि यह उस विश्वास और आकांक्षा का संकेत थी, जो राज्य के युवा अब मुख्यधारा के राष्ट्रीय दलों से हटकर क्षेत्रीय दल यूकेडी से जोड़ने लगे हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय महामंत्री सुशील उनियाल और केंद्रीय संगठन मंत्री भुवन बिष्ट मौजूद रहे। साथ ही जिला अध्यक्ष प्रताप चौहान और महानगर कार्यकारी अध्यक्ष ललित सिंह बिष्ट ने भी शिरकत की। कार्यक्रम में संगठन को नई ऊर्जा देने के उद्देश्य से सूरज मनराल को प्रदेश उप-प्रभारी (युवा प्रकोष्ठ), गौरव जोशी को कुमाऊं मंडल प्रभारी और महेंद्र पाल को ब्लॉक प्रभारी (कोटाबाग) की जिम्मेदारी सौंपी गई।
केंद्रीय प्रभारी (युवा प्रकोष्ठ) कमल जोशी ने अपने जोशीले संबोधन में कहा कि “उत्तराखंड का हर युवा एक मशाल है, और यदि ये मशालें एक साथ जल उठें तो राज्य को नई दिशा और ताक़त मिल सकती है। यह आंदोलन ‘चाय पर चर्चा’ से शुरू हुआ था और अब विशाल रूप ले चुका है। आने वाले समय में यह लाखों युवाओं को जगाकर परिवर्तन की लहर पैदा करेगा।
उन्होंने यह भी घोषणा की कि वे पूरे प्रदेश का दौरा करेंगे और युवाओं को संगठित कर एक सशक्त आंदोलन की नींव रखेंगे।
युवाओं का झुकाव: क्यों और कैसे?
समारोह के संदेश ने साफ कर दिया कि राष्ट्रीय दलों की राजनीति से मोहभंग हो रहे युवाओं को यूकेडी विकल्प के रूप में नजर आने लगा है। राज्य निर्माण के 25 साल बाद भी बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं।
भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दल राज्य की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।
युवाओं को लगता है कि राज्य का विकास “दिल्ली दरबार” की प्राथमिकताओं के बजाय “देहरादून और पहाड़” की ज़रूरतों के हिसाब से होना चाहिए।
यही कारण है कि यूकेडी का क्षेत्रीय एजेंडा युवाओं को आकर्षित कर रहा है।
गढ़वाल से कुमाऊं तक
,यूकेडी पर अक्सर यह आरोप लगता रहा कि उसकी सक्रियता और आधार गढ़वाल तक सीमित है। लेकिन हल्द्वानी में आयोजित यह कार्यक्रम कुमाऊं की राजनीति में उसकी दमदार एंट्री का संकेत है।

गढ़वाल में पहले से ही संगठन ने अपनी पकड़ बनाए रखी है। अब कुमाऊं में युवाओं को जोड़ने की यह कवायद आने वाले वर्षों में निर्णायक साबित हो सकती है। यदि यह रफ्तार बनी रही, तो यूकेडी 2027 के विधानसभा चुनावों में सत्ता समीकरण बदलने की स्थिति में आ सकता है।
2027 के संदर्भ में संभावनाएँ?संपादकीय दृष्टि से यदि आकलन किया जाए, तो यूकेडी की ताक़त और चुनौतियाँ दोनों स्पष्ट हैं:
ताक़तें? युवा आधार – तेजी से जुड़ता युवा वर्ग ऊर्जा और जोश ला रहा है।क्षेत्रीय मुद्दे – पलायन, भूमि कानून, रोजगार और शिक्षा पर फोकस।
संगठित नेतृत्व – कमल जोशी जैसे युवा नेतृत्वकर्ता पूरे प्रदेश में सक्रिय दौरे की योजना बना रहे हैं।
चुनौतियाँ? संसाधनों की कमी – राष्ट्रीय दलों की तुलना में आर्थिक और प्रचार संसाधन बेहद सीमित हैं।
आंतरिक मतभेद – अतीत में यूकेडी का सबसे बड़ा संकट रहा है गुटबाज़ी और विभाजन। विश्वसनीयता की परीक्षा – जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि यूकेडी सत्ता में आने पर भी अपने आदर्शों से समझौता नहीं करेगी।
युवाओं का संदेश: परिवर्तन का संकल्प,समारोह में मौजूद युवाओं का उत्साह अपने आप में संदेश था। उन्होंने सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि अब उत्तराखंड को केवल “पहाड़ बेचने और कुर्सी की राजनीति” में उलझने नहीं दिया जाएगा।
क्षेत्रीय मुद्दे – पलायन, भूमि कानून, रोजगार और शिक्षा पर फोकस।
संगठित नेतृत्व – कमल जोशी जैसे युवा नेतृत्वकर्ता पूरे प्रदेश में सक्रिय दौरे की योजना बना रहे हैं।
चुनौतियाँ? संसाधनों की कमी – राष्ट्रीय दलों की तुलना में आर्थिक और प्रचार संसाधन बेहद सीमित हैं।
आंतरिक मतभेद – अतीत में यूकेडी का सबसे बड़ा संकट रहा है गुटबाज़ी और विभाजन। विश्वसनीयता की परीक्षा – जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि यूकेडी सत्ता में आने पर भी अपने आदर्शों से समझौता नहीं करेगी।
युवाओं का संदेश: परिवर्तन का संकल्प,समारोह में मौजूद युवाओं का उत्साह अपने आप में संदेश था। उन्होंने सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि अब उत्तराखंड को केवल “पहाड़ बेचने और कुर्सी की राजनीति” में उलझने नहीं दिया जाएगा।
युवा चाहते हैं कि:राज्य की नीतियाँ पहाड़ और मैदान दोनों के लिए समान रूप से हों।शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएँ गांव तक पहुँचें।
रोजगार के अवसर बढ़ें ताकि पलायन रुके भ्रष्टाचार और बाहरी दबाव से मुक्त शासन व्यवस्था बने।
संपादकीय उत्तराखंड क्रांति दल के पूर्व वरिष्ठ सदस्य?हल्द्वानी में आयोजित युवा परिवर्तन समारोह महज़ एक राजनीतिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत है। यदि यूकेडी अपनी वर्तमान गति बनाए रखता है, गढ़वाल और कुमाऊं दोनों में जड़ें मजबूत करता है और युवाओं को विश्वास दिलाने में सफल होता है, तो 2027 में सकारात्मक परिणाम निश्चित रूप से सामने आ सकते हैं।
राज्य की जनता अब यह देख रही है कि क्या यूकेडी अपने संघर्ष को राजनीतिक अवसरवाद से ऊपर उठाकर सच्चे जनांदोलन का रूप दे पाएगा। यदि हाँ, तो आने वाले चुनावों में यह पार्टी निर्णायक भूमिका निभा सकती है।उत्तराखंड क्रांति दल का यह प्रयास न केवल राजनीतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है, बल्कि यह राज्य की असली भावना—“छोटा राज्य, बड़ा आदर्श”—को पुनर्जीवित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
युवाओं के कंधों पर परिवर्तन की जिम्मेदारी

उत्तराखंड राज्य आंदोलन से लेकर राज्य गठन तक कुमाऊं क्षेत्र में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) का जबरदस्त जनाधार रहा। यही वह ताक़त थी जिसने सड़कों पर आंदोलन खड़ा किया और राज्य निर्माण की राह प्रशस्त की। लेकिन दुखद तथ्य यह है कि राज्य बनने के बाद धीरे-धीरे यूकेडी का यह जनाधार कुमाऊं से लगभग विलुप्त हो गया। इसके पीछे कई कारण रहे—गुटबाज़ी, नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं और राष्ट्रीय दलों का चुनावी दबदबा। परिणामस्वरूप यूकेडी, जिसे जनता ने अपने सपनों की पार्टी समझा था, धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिये पर चला गया।
इसके उलट गढ़वाल क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों से यूकेडी के प्रति युवाओं का आकर्षण बढ़ा है। गढ़वाल में युवाओं ने इसे एक क्षेत्रीय स्वाभिमान और संघर्ष की पार्टी के रूप में स्वीकारना शुरू किया है। सवाल यह है कि कुमाऊं में पार्टी क्यों पिछड़ गई? इसका सीधा उत्तर है—नेतृत्व ने युवाओं को समय रहते आगे नहीं बढ़ाया।
आज की हकीकत यही है कि यदि यूकेडी को फिर से खड़ा करना है तो यह काम केवल युवाओं के कंधों पर संभव है। युवा ही वह ऊर्जा हैं जो राजनीति में नई सोच, ईमानदारी और संघर्ष की ताक़त ला सकते हैं। अगर पार्टी युवाओं को निर्णायक भूमिका दे और उनकी भागीदारी हर स्तर पर सुनिश्चित करे तो परिवर्तन की लहर आ सकती है।
2027 के चुनाव यूकेडी के लिए परीक्षा होंगे। अगर युवाओं को वास्तविक नेतृत्व दिया गया, तो कुमाऊं और गढ़वाल दोनों में पार्टी अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकती है। परिवर्तन का बीड़ा अब युवाओं को ही उठाना होगा, तभी उत्तराखंड के सपनों का सच हो सकेगा।




