उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने बड़ा ऐलान किया है कि कांग्रेस की सरकार बनी तो गैरसैंण को राजधानी बनाया जाएगा और जिस परिवार में कोई सरकारी सेवा में नहीं है, उसके एक सदस्य को सम्मानजनक रोजगार दिया जाएगा। चुनावी राजनीति में ऐसे वादे स्वाभाविक हैं, लेकिन सवाल यह है कि इन वादों को पूरा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति और रोडमैप कहां है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
गैरसैंण राजधानी और रोजगार का वादा, यूकेडी का तंज—“मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाकर सत्ता नहीं मिलती”
गोदियाल के गैरसैंण वाले बयान पर यूकेडी का कटाक्ष—“पहले अपने विधायकों को विधानसभा में सक्रिय करिए”
“सरकार बनी तो गैरसैंण राजधानी बनाएंगे”, गोदियाल के वादे पर यूकेडी का सवाल—“पहले बताइए, अब तक क्या किया?”
गैरसैंण पर गोदियाल का बड़ा दावा, उक्रांद ने घेरा—“सत्ता के सपने नहीं, विधानसभा में संघर्ष चाहिए”
उत्तराखंड की मूल अवधारणा पर उक्रांद का सवाल—गैरसैंण को स्थायी राजधानी कब?
काशी सिंह ऐरी — राजधानी केवल भवन नहीं, पहाड़ के विकास का केंद्र
उत्तराखंड क्रांति दल का मूल मानना रहा है कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण केवल प्रशासनिक सीमाएं बदलने के लिए नहीं हुआ था। राज्य की राजधानी पहाड़ में हो, ताकि शासन और विकास का केंद्र पर्वतीय क्षेत्र बने। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग इसी सोच का हिस्सा है। सरकारें आती-जाती रहीं, लेकिन स्थायी राजधानी का सवाल आज भी अनसुलझा है।
नारायण सिंह जंतवाल — गैरसैंण से ही पूरी होगी राज्य आंदोलन की मूल भावना
उत्तराखंड आंदोलन के पीछे जिस पहाड़-केंद्रित विकास की कल्पना थी, उसका सबसे बड़ा प्रतीक गैरसैंण है। यदि राजधानी देहरादून में ही केंद्रित रहेगी तो पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों तक शासन की पहुंच और विकास का संतुलन कैसे बनेगा? स्थायी राजधानी का निर्णय अब राजनीतिक घोषणाओं से नहीं, बल्कि स्पष्ट संवैधानिक और प्रशासनिक निर्णय से होना चाहिए।
पुष्पेश त्रिपाठी — ग्रीष्मकालीन नहीं, स्थायी राजधानी चाहिए
गैरसैंण को केवल ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करना मूल मांग का समाधान नहीं है। राजधानी के लिए बुनियादी ढांचा नहीं है, इसलिए राजधानी नहीं बन सकती—यह तर्क स्वीकार्य नहीं। पहले राजनीतिक निर्णय होना चाहिए और उसके बाद समयबद्ध तरीके से सचिवालय, विधानसभा, न्यायिक और प्रशासनिक ढांचा विकसित किया जाना चाहिए। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का स्पष्ट रोडमैप सरकार को देना चाहिए।
आशीष नेगी — राजधानी पहाड़ में होगी तभी राज्य की अवधारणा मजबूत होगी
उत्तराखंड की नई पीढ़ी यह सवाल पूछ रही है कि जिस राज्य के लिए पहाड़ के युवाओं ने संघर्ष किया, उस राज्य का शासन आज भी मैदानी केंद्र से क्यों संचालित हो रहा है? गैरसैंण केवल भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान और संघर्ष का प्रतीक है। स्थायी राजधानी के साथ रोजगार, पलायन रोकने और पर्वतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की नीति भी जरूरी है।
सुशील उनियाल — भाजपा-कांग्रेस दोनों से चाहिए स्थायी राजधानी पर जवाब
विपक्ष में रहते हुए भाजपा और कांग्रेस दोनों गैरसैंण के पक्ष में आवाज उठाती रही हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद मामला टाल दिया जाता है। कभी आयोग, कभी ग्रीष्मकालीन राजधानी और कभी अधिवेशन के नाम पर जनता को संतुष्ट करने की कोशिश होती रही। अब उक्रांद का सवाल सीधा है—यदि गैरसैंण स्थायी राजधानी नहीं बनानी है तो स्पष्ट कहिए, और यदि बनानी है तो समयसीमा बताइए।
उक्रांद का विजन: गैरसैंण उत्तराखंड के पुनर्निर्माण का केंद्र
उत्तराखंड क्रांति दल के लिए स्थायी राजधानी का सवाल अकेला मुद्दा नहीं है। इसके साथ मूल निवास, भू-कानून, पलायन रोकना, पहाड़ में रोजगार, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार, पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा-स्वास्थ्य और विकेंद्रीकृत विकास की पूरी अवधारणा जुड़ी हुई है।
राज्य गठन के दो दशक से अधिक समय बाद भी स्थायी राजधानी तय न होना इस बात का संकेत है कि सत्ता में रही दोनों बड़ी पार्टियां इस प्रश्न पर निर्णायक राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखा सकीं। उपलब्ध रिपोर्टों में भी यह दर्ज है कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग राज्य आंदोलन के दौर से चली आ रही है और बाद में इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा दिया गया।
उक्रांद का विजन स्पष्ट है—उत्तराखंड की राजधानी पहाड़ में, शासन पहाड़ में और विकास का लाभ पहाड़ के गांवों तक।
राजधानी का प्रश्न केवल विधानसभा भवन में कुछ दिनों का सत्र चलाने से हल नहीं होगा। स्थायी राजधानी के लिए स्पष्ट निर्णय, समयबद्ध कार्ययोजना और प्रशासनिक ढांचे का वास्तविक हस्तांतरण जरूरी है।
यही उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल अवधारणा थी और यही उक्रांद आज भी अपने राजनीतिक एजेंडे का केंद्रीय विषय मानता है।
गैरसैंण को राजधानी बनाने का सवाल उत्तराखंड की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। लेकिन उक्रांद पर सवाल उठाने से पहले कांग्रेस को अपने पिछले शासनकाल का हिसाब भी जनता के सामने रखना होगा। आखिर कांग्रेस की सरकार भी उत्तराखंड में रही है। उस समय गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की दिशा में क्या ठोस कदम उठाए गए? आज यदि कांग्रेस के पास इसका स्पष्ट जवाब है तो उसे जनता के सामने रखना चाहिए।
और एक सवाल गणेश गोदियाल से भी है—आज कांग्रेस विधानसभा में विपक्ष की भूमिका में है। अगर गैरसैंण राजधानी बननी चाहिए, बेरोजगारों के लिए रोजगार की ठोस व्यवस्था होनी चाहिए और सरकार की नीतियों में बदलाव जरूरी है, तो कांग्रेस के विधायक विधानसभा में कितनी मजबूती से यह आवाज उठा रहे हैं?
चुनाव आने में अभी समय है। इसलिए केवल सत्ता में आने के बाद क्या करेंगे, यह बताने के बजाय विपक्ष में रहते हुए अभी क्या कर रहे हैं, इसका हिसाब भी जनता जानना चाहेगी।
राजनीति में घोषणाएं करना आसान है, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारना कठिन। रोजगार के लिए कितने पद, किस क्षेत्र में कितने अवसर, निजी क्षेत्र की भागीदारी कैसे होगी और सरकार पर इसका वित्तीय भार कितना पड़ेगा—कांग्रेस को इन सवालों का जवाब भी देना होगा।
गणेश गोदियाल ने मुख्यमंत्री के चेहरे पर फैसला हाईकमान पर छोड़ दिया है। यह कांग्रेस का आंतरिक विषय हो सकता है, लेकिन जनता के लिए असली सवाल चेहरा नहीं, नीति, नीयत और परिणाम है।
कांग्रेस यदि 2027 में सत्ता का सपना देख रही है तो उसे मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाने से आगे बढ़कर जनता को यह बताना होगा कि गैरसैंण कब, कैसे और किस प्रक्रिया से राजधानी बनेगी तथा हर बेरोजगार परिवार के एक सदस्य को रोजगार देने की योजना का वास्तविक खाका क्या होगा।
सत्ता की सीढ़ी केवल वादों से नहीं चढ़ी जाती। विपक्ष में रहते हुए सड़क से विधानसभा तक संघर्ष करके जनता का विश्वास जीतना पड़ता है।
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