खाटू श्याम को कलियुग जगत में सबसे प्रसिद्ध भगवान माना जाता है। खाटू श्याम जी के दर्शन के लिए हर दिन लाखों भक्त जुटते हैं। मान्यता है कि यहां भगवान के दर्शन करने और अपनी मनोकामना मांगने आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

कलियुग में खाटू श्याम की पूजा करने के 10 महत्वपूर्ण कारण
खाटू श्याम का अर्थ है ‘मां सैव्यं परजात:’ यानी पराजित और निराश लोगों को शक्ति देने वाला।
खाटू श्याम को श्री कृष्ण का कलयुगी अवतार माना जाता है। खाटू श्याम का जन्मोत्सव कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी के दिन मनाया जाता है।
संवाददाता,शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स /उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह बिष्ट रुद्रपुर, (उत्तराखंड)
हिंदू कैलेंडर के फाल्गुन महीने की शुक्ल षष्ठी से लेकर बारस तक खाटू श्याम के मंदिर परिसर में भव्य मेला लगता है। इसे ग्यारस मेला के नाम से भी जाना जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार खाटू श्याम पांडव पुत्र भीम के पौत्र थे। उनका नाम बर्बरीक था।
भीम के पुत्र का नाम घटोत्कच था और उनके पुत्र का नाम बर्बरीक था। बर्बरीक की माता का नाम हिडिम्बा था। आज के समय में बर्बरीक को बाबा खाटू श्याम जी के नाम से जाना जाता है।
महाभारत के बर्बरीक को श्री कृष्ण ने कलियुग में अपने नाम से पूजे जाने का वरदान दिया था। आज बर्बरीक को खाटू श्याम के नाम से पूजा जाता है।
स्वप्न दर्शन के बाद बाबा श्याम खाटू धाम में स्थित तालाब में प्रकट हुए और श्री कृष्ण शालिग्राम के रूर स्थित मंदिर में दर्शन देते हैं।
खाटू श्याम जी को शीश दानी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उन्होंने भगवान कृष्ण को अपना शीश दान कर दिया था। इसके अलावा उन्हें मोरछिधारी भी कहा जाता है।
खाटू श्याम जी को दुनिया का दूसरा और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर भी कहा जाता है।
खाटू श्याम जी ने विरोधी टीम का पक्ष लिया था, इसलिए उन्हें हारे का सहारा कहा जाता है।
इसलिए इसे ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है।लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह मंदिर किसने बनवाया था? किस कहानी और इतिहास के आधार पर खाटू की भूमि पर इस दिव्य मंदिर की स्थापना हुई? आइए इस पौराणिक कथा, इतिहास और आस्था के केंद्र को विस्तार से समझते हैं।
बर्बरीक: महाभारत का वो योद्धा जो बना खाटू श्याम बाबा
इस कथा की शुरुआत होती है महाभारत काल से, जहाँ एक महायोद्धा का जन्म होता है – बर्बरीक। बर्बरीक भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। उन्हें भगवान शिव और अन्य देवों से दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त हुए थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उनके पास तीन ऐसे अमोघ बाण थे, जिनसे वे पूरी महाभारत की लड़ाई को अकेले ही समाप्त कर सकते थे।जब महाभारत का युद्ध आरंभ होने वाला था, तो बर्बरीक भी युद्धभूमि की ओर बढ़े। परंतु श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि बर्बरीक का दृष्टिकोण केवल ‘जो पक्ष कमजोर होगा उसी की सहायता करूँगा’ था। ऐसे में अगर वे युद्ध में उतरते, तो युद्ध कभी समाप्त नहीं होता।
इसलिए श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में आकर बर्बरीक से उनकी युद्ध-नीति और शक्ति के बारे में जानकारी ली और अंत में उनसे उनका सिर दान में माँग लिया। बर्बरीक ने प्रसन्नता पूर्वक अपना शीश अर्पित कर दिया। श्रीकृष्ण ने उन्हें वचन दिया कि कलियुग में वे उनके ही नाम ‘श्याम’ से पूजे जाएंगे और उन्हें ‘हारे का सहारा’ कहा जाएगा।
शीश का विसर्जन नहीं, हुआ था स्थापना के लिए सुरक्षित
बर्बरीक का कटा हुआ सिर युद्ध समाप्त होने तक एक ऊँचे स्थान से युद्ध देखता रहा। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने उस शीश को वरदान के साथ पवित्र स्थान पर स्थापित करने का निर्देश दिया था। यही सिर बाद में राजस्थान के खाटू गाँव में भूमि के नीचे छिपा रहा।कई शताब्दियों तक यह सिर जमीन के अंदर ही रहा – अज्ञात, लेकिन चमत्कारी।
खाटू श्याम मंदिर का इतिहास: राजा रूप सिंह और रानी नैणसी की भूमिका
अब प्रश्न आता है – किसने बनवाया खाटू श्याम जी का मंदिर?
इस प्रश्न का उत्तर इतिहास के पन्नों में दर्ज एक चमत्कारी घटना से जुड़ा है। कहा जाता है कि 11वीं शताब्दी में, खाटू गांव के एक राजा ‘रूप सिंह चौहान’ और उनकी रानी ‘नैणसी देवी’ को स्वप्न में एक दिव्य दर्शन हुआ। सपना बहुत ही स्पष्ट और रहस्यमयी था – एक स्थान पर खुदाई करने को कहा गया था, जहाँ उन्हें बर्बरीक का शीश मिलने वाला था।राजा ने अगले ही दिन उस स्थान की खुदाई करवाई और सचमुच वहाँ एक दिव्य और तेजस्वी सिर निकला। जैसे ही वह सिर जमीन से बाहर आया, आसपास के वातावरण में दिव्यता और चमत्कारिक ऊर्जा का संचार हो गया।इस घटना से स्तब्ध होकर राजा रूप सिंह ने तुरंत एक प्रारंभिक मंदिर बनवाया, जहाँ बर्बरीक के उस शीश को स्थापित किया गया। यही मंदिर आगे चलकर पूरे भारतवर्ष में खाटू श्याम मंदिर के नाम से विख्यात हुआ।
मंदिर का पुनर्निर्माण: राजा अभयसिंह का योगदान
राजा रूप सिंह द्वारा बनाए गए प्रारंभिक मंदिर की महिमा समय के साथ फैलने लगी। भक्तों की संख्या बढ़ी और मंदिर को और भव्य रूप देने की आवश्यकता महसूस हुई।18वीं सदी में, जयपुर के तत्कालीन राजा अभयसिंह ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। संगमरमर की दीवारों, नक्काशीदार खंभों और विशाल प्रांगण से सुसज्जित यह मंदिर अब एक भव्य तीर्थ स्थल बन चुका था।मंदिर की भव्यता और दिव्यता आज भी देखने योग्य है। मुख्य गर्भगृह में विराजमान खाटू श्याम जी की प्रतिमा उस ही शीश के रूप में है, जिसे हजारों साल पहले बर्बरीक ने श्रीकृष्ण को दान दिया था।
‘हारे का सहारा’ क्यों कहा जाता है खाटू श्याम जी को?
खाटू श्याम जी को ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि जिस भक्त ने हार मान ली हो, निराश हो गया हो, वह अगर सच्चे मन से बाबा श्याम को पुकारता है, तो उसे सहायता अवश्य मिलती है।
अनेक श्रद्धालुओं के अनुभवों में यह बात सामने आई है कि खाटू श्याम जी की पूजा करने के बाद:
व्यापार में हानि झेल रहे लोगों को लाभ मिला
नौकरी की तलाश करने वालों को अच्छे अवसर मिले
विवाह योग्य युवाओं के रिश्ते तय हुए
असाध्य रोगों से ग्रसित लोगों को मानसिक शांति और स्वास्थ्य लाभ मिला
इन अनुभवों के कारण बाबा श्याम को हर वर्ग, हर जाति और हर क्षेत्र के लोग पूजते हैं – बिना किसी भेदभाव के।
खाटू श्याम जी का वार्षिक मेला: श्रद्धा का महासंगम
हर साल फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) में खाटू श्याम जी का वार्षिक मेला आयोजित होता है। यह मेला भारत के सबसे बड़े धार्मिक मेलों में से एक माना जाता है, जहाँ देशभर से लाखों श्रद्धालु पैदल यात्रा करके आते हैं।भक्तजन “जय श्री श्याम”, “हारे के सहारे की जय” जैसे जयकारों के साथ बाबा को रिझाते हैं। इस मेले में:
अखंड कीर्तन
निशान यात्रा
रथ सज्जा
छप्पन भोग का आयोजन
आदि होते हैं, जो एक भक्ति से भरा माहौल रचते हैं।
मंदिर की वास्तुकला और विशेषताएँ
खाटू श्याम मंदिर न केवल आध्यात्मिक केंद्र है, बल्कि स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना भी है। मंदिर में:
सफेद संगमरमर का उपयोग हुआ है
छतों और दीवारों पर आकर्षक चित्रकारी की गई है
मुख्य द्वार पर सुंदर नक्काशी और शिलालेख मौजूद हैं
गर्भगृह के चारों ओर विशाल प्रांगण है, जहाँ श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हैं
मंदिर परिसर में एक पवित्र कुंड (श्याम कुंड) भी स्थित है, जहाँ से जुड़ी मान्यता है कि इसी स्थान से बाबा श्याम का शीश निकला था। भक्त इस कुंड में स्नान कर अपनी पीड़ा को दूर मानते हैं।
खाटू श्याम बाबा की महिमा आज के दौर में
आज खाटू श्याम बाबा के मंदिर में सिर्फ भारत से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं। खाटू से जुड़े ऑनलाइन दर्शन, वर्चुअल पूजा और लाइव आरती की सुविधा ने देश-दुनिया में बसे भक्तों को एक सूत्र में बाँध दिया है।कोरोना काल में भी खाटू श्याम जी की महिमा पर श्रद्धा कम नहीं हुई, बल्कि ऑनलाइन माध्यम से और तेज़ी से फैली।
निष्कर्ष: आस्था का अद्वितीय केंद्र
खाटू श्याम जी का मंदिर केवल एक स्थापत्य या पौराणिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन का आध्यात्मिक आधार बन चुका है। जिस स्थान की शुरुआत एक राजा के स्वप्न और जमीन के नीचे छिपे एक शीश से हुई, वह आज विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बन चुका है।’हारे का सहारा’ सिर्फ एक कहावत नहीं, यह हर उस व्यक्ति की सच्ची पुकार है जिसे दुनिया ने छोड़ दिया हो – और जिसे बाबा श्याम ने थाम लिया हो।
राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम जी का मंदिर आज केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, भक्ति और चमत्कारिक अनुभवों का जीवंत प्रतीक बन चुका है। भक्तों की मानें तो यह मंदिर वह स्थान है, जहाँ निराश व्यक्ति को आशा, और हारने वाले को विजय की अनुभूति मिलती है।
ऐसा कहा जाता है कि श्याम बाबा से जो भी भक्त मांगता है, उसे वे लाखों गुना देते हैं, इसी वजह से खाटू श्याम को लखदातार के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार खाटू श्याम को कलियुग में कृष्ण का अवतार माना जाता है। आइए आज हम आपको खाटू श्याम मंदिर के बारे में कुछ रोचक बातें बताते हैं।
कौन हैं बर्बरीक या खाटू श्याम
बाबा खाटू श्याम का संबंध महाभारत काल से है। वे पांडुपुत्र भीम के पोते थे। कहा जाता है कि खाटू श्याम की शक्तियों और क्षमताओं से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने उन्हें कलियुग में उनके नाम से पूजे जाने का आशीर्वाद दिया था।
खाटूश्यामजी की कहानी
वनवास के दौरान जब पांडव अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भटक रहे थे, तब भीम का सामना हिडिम्बा से हुआ। हिडिम्बा ने भीम से एक पुत्र को जन्म दिया जिसे घटोख कहा गया। घटोख का एक पुत्र था जिसका नाम बर्बरीक था। ये दोनों ही अपनी बहादुरी और शक्तियों के लिए जाने जाते थे। जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध होने वाला था, तो बर्बरीक ने युद्ध देखने का फैसला किया। जब श्री कृष्ण ने उससे पूछा कि वह युद्ध में किसकी तरफ है, तो उसने कहा कि वह उस पक्ष की तरफ से लड़ेगा जो हार जाएगा। ऐसे में श्री कृष्ण युद्ध का परिणाम जानते थे और उन्हें डर था कि कहीं इसका उल्टा असर पांडवों पर न पड़ जाए। ऐसे में कृष्ण जी ने बर्बरीक को रोकने के लिए दान मांगा। उन्होंने दान में उसका सिर मांगा। बर्बरीक ने उन्हें अपना सिर दान में दे दिया, लेकिन अंत तक उसने युद्ध को अपनी आंखों से देखने की इच्छा जताई। श्री कृष्ण ने इच्छा स्वीकार कर ली और उसका सिर युद्ध स्थल पर एक पहाड़ी पर रख दिया। युद्ध के बाद पांडवों में इस बात को लेकर लड़ाई होने लगी कि जीत का श्रेय किसे दिया जाए, जिसमें बर्बरीक कहता है कि श्री कृष्ण के कारण ही उनकी जीत हुई है। इस बलिदान से श्री कृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें कलियुग में श्याम नाम से पूजे जाने का वरदान दिया।
कैसे हुआ खाटू श्याम मंदिर का निर्माण-
कहते हैं कि कलियुग की शुरुआत में राजस्थान के खाटू गांव में उनका सिर मिला था। कहा जाता है कि यह अद्भुत घटना तब हुई जब वहां खड़ी गाय के थन से अपने आप दूध निकलने लगा। इस चमत्कारी घटना के बाद जब खुदाई की गई तो यहां खाटू श्याम जी का सिर मिला। अब लोगों में दुविधा शुरू हो गई कि इस सिर का क्या किया जाए। बाद में लोगों ने सर्वसम्मति से सिर को किसी पुजारी को सौंपने का फैसला किया। इसी बीच इलाके के तत्कालीन शासक रूप सिंह को मंदिर बनवाने का सपना आया। ऐसे में रूप सिंह चौहान की सलाह पर इस स्थान पर मंदिर का निर्माण शुरू किया गया और खाटूश्याम की मूर्ति स्थापित की गई।
खाटू श्याम मंदिर की वास्तुकला–
1027 ई. में रूप सिंह द्वारा बनवाए गए मंदिर में मुख्य रूप से एक भक्त ने बदलाव किया था। दीवान अभय सिंह ने 1720 ई. में इसका पुनर्निर्माण कराया। इस प्रकार मूर्ति को मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित किया गया। मंदिर का निर्माण पत्थरों और संगमरमर से किया गया है। दरवाजे को सोने की पत्ती से सजाया गया है। मंदिर के बाहर जगमोहन नामक प्रार्थना कक्ष भी है।
कैसे पहुँचें खाटू श्याम
खाटू श्याम का मंदिर जयपुर से 80 किलोमीटर दूर खाटू गाँव में मौजूद है। खाटू श्याम जी पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन रींगस है। जहाँ से बाबा के मंदिर की दूरी 18.5 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से निकलने के बाद आप मंदिर के लिए टैक्सी और जीप ले सकते हैं। अगर आप फ्लाइट से जा रहे हैं तो सबसे नजदीकी एयरपोर्ट जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। यहाँ से मंदिर की दूरी 95 किलोमीटर है। अगर आप दिल्ली से सड़क मार्ग से खाटू श्याम मंदिर जा रहे हैं तो आपको पहुँचने में लगभग 4 से 5 घंटे लगेंगे।

