

रुद्रपुर,उत्तराखंड राज्य की स्थापना का मूल उद्देश्य था— जनता को बेहतर शासन, युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और पारदर्शी प्रशासन देना। लेकिन आज, राज्य बनने के 25 वर्षों बाद अगर किसी संस्था की पहचान सबसे अधिक विवादित, अकुशल और छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाली बनी है, तो वह है – उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय।

संवाददाता,शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स /उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह बिष्ट रुद्रपुर, (उत्तराखंड)
हर्रावाला स्थित इस विश्वविद्यालय की कार्यशैली को देखकर अब यह सवाल उठना स्वाभाविक हो गया है कि क्या इस विश्वविद्यालय का संचालन शैक्षणिक मूल्यों से हो रहा है, या फिर यह भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता की प्रयोगशाला बन चुका है?
छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ या सोची-समझी चुप्पी?2019-20 और 2018-19 के शैक्षणिक सत्रों में परीक्षा देकर बैठ चुके छात्र आज तक अपने परिणाम का इंतजार कर रहे हैं। परीक्षा अप्रैल 2024 में ली गई, लेकिन मई 2025 तक परिणाम नहीं आया। क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर कोई जानबूझकर छात्रों का भविष्य रोकने वाला षड्यंत्र?
छात्र अब डिप्टी रजिस्ट्रार और रजिस्ट्रार रामजी शरण पर सीधे आरोप लगा चुके हैं। विश्वविद्यालय परिसर में हंगामा तक हो चुका है। बावजूद इसके, कोई सुनवाई नहीं। अब सवाल ये है – क्यों?
क्या छात्रों का भविष्य इस राज्य में इतना सस्ता हो गया है?पहले से विवादों से घिरा विश्वविद्यालय: इतिहास पर एक नजर
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय की छवि पहले से ही विवादित रही है।
2012 में फैकल्टी नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद और जातीय आधार पर चयन के आरोप लगे।
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2015 में आयुर्वेदिक कॉलेजों को फर्जी मान्यता देने के आरोप भी सामने आए थे।
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2018 में विश्वविद्यालय में हुए औचक निरीक्षण में पाया गया कि कई विभाग वर्षों से बिना नियमित प्रोफेसरों के चल रहे हैं।
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2021 में आयुष मंत्रालय से प्राप्त फंड में अनियमितता और फर्जी व्यय बिलों की शिकायतें हुईं।
अब 2024-25 में छात्रों के रिजल्ट रोके जाने और वेरिफिकेशन ना करने जैसे गंभीर मसले सामने हैं।
न सिर्फ परीक्षा में देरी, बल्कि सत्यापन में भी लापरवाही,छात्रों ने परीक्षा दे दी, लेकिन विश्वविद्यालय नतीजे नहीं दे रहा।जो छात्र पास होकर निकल चुके हैं, उनका वेरिफिकेशन तक नहीं हो रहा।इंटर्नशिप पूरी करने वाले छात्रों का AYUSH पोर्टल पर सत्यापन अटका पड़ा है।राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग ने खुद दो-दो पत्र भेजे, लेकिन विश्वविद्यालय सोया पड़ा है।अन्य राज्यों के मेडिकल काउंसिलों से सत्यापन अनुरोध भी अनसुने पड़े हैं।क्या ये सिर्फ तकनीकी देरी है, या फिर कहीं कुछ छुपाया जा रहा है?
निजी आयुष कॉलेजों की भी स्थिति दयनीय,राज्य के इकलौते होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज—चंदोला होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, रुद्रपुर—के प्राचार्य अजय विश्वकर्मा ने कुलपति को चिट्ठी लिखकर छात्रों के भविष्य की चिंता जताई है। उन्होंने लिखा कि छात्रों का करियर अधर में लटक गया है। कॉलेजों ने सत्र पूरे करवा दिए, इंटर्नशिप भी पूरी, फिर भी डिग्री और मार्कशीट नहीं।
क्या अब हाई कोर्ट ही आखिरी आसरा?छात्र और कॉलेज प्रबंधन अब हाई कोर्ट की शरण में हैं। अगर राज्य का एकमात्र आयुष विश्वविद्यालय ही ऐसी निष्क्रियता दिखाए तो फिर राज्य में आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथिक चिकित्सा शिक्षा की साख कहां बचेगी?
यह सवाल अब राज्य सरकार से भी पूछा जाना चाहिए—
क्या मुख्यमंत्री धामी को इन छात्रों की चिंता नहीं है?
क्यों शिक्षा मंत्री और आयुष मंत्री इस विषय पर चुप हैं?
क्या शिक्षा को भी राजनीतिक घमंड और नौकरशाही की चक्की में पीसने का इरादा है?
उत्तराखंड की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न,उत्तराखंड राज्य आंदोलन का सपना था एक ऐसे पर्वतीय राज्य का निर्माण, जहाँ—
युवाओं को बेहतर शिक्षा मिले,
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चिकित्सा क्षेत्र में पारंपरिक पद्धतियों को प्रोत्साहन मिले,
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और व्यवस्था पारदर्शी हो।
लेकिन यहां तो न परीक्षा समय पर, न रिजल्ट, न डिग्री, न वेरिफिकेशन!
क्या यही है “डबल इंजन सरकार” की डबल लेयर असंवेदनशीलता?
चेतावनी,यदि इन समस्याओं का जल्द समाधान नहीं किया गया, और विश्वविद्यालय प्रशासन के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह न केवल छात्रों का नुकसान होगा, बल्कि उत्तराखंड की शैक्षणिक छवि पर भी गंभीर आघात होगा।
संविधान कहता है – “शिक्षा मौलिक अधिकार है”, लेकिन उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में यह अधिकार आज उपहास बनकर रह गया है।
अब वक्त है – इस संस्थान को या तो पूरी तरह दुरुस्त किया जाए या फिर इसे छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले ‘विकास विरोधी केंद्र’ के रूप में चिन्हित किया जाए।
उत्तराखंड सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में दावे तो बड़े-बड़े किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है। खासकर उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय की लापरवाही ने आयुष छात्रों के भविष्य पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। समय पर परीक्षा न होना, परिणामों में महीनों की देरी, इंटर्नशिप सत्यापन का न होना और डिग्री सत्यापन लंबित रहना – ये सब दर्शाता है कि सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के भविष्य को लेकर कितने संवेदनहीन हैं।
राज्य गठन के मूल उद्देश्यों में शिक्षा और युवाओं का समग्र विकास शामिल था, लेकिन आज छात्र कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को मजबूर हैं। यह सवाल खड़ा करता है – क्या उत्तराखंड सरकार जानबूझकर छात्रों से कुछ छिपा रही है? क्या किसी दबाव या भ्रष्टाचार के चलते परिणाम रोके जा रहे हैं?
विश्लेषण के अनुसार यह स्पष्ट है कि शासन और प्रशासन की निष्क्रियता छात्रों के भविष्य के साथ बड़ा खिलवाड़ है। यदि तत्काल प्रभाव से सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह न केवल संस्थान की साख को गिराएगा, बल्कि एक पीढ़ी के सपनों को भी बर्बाद कर देगा।





