मिशन 2027 और किच्छा की राजनीति: आरोपों से आगे कब बढ़ेगा जनहित?

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उत्तराखंड की राजनीति में जब भी चुनावी वर्ष नज़दीक आता है, तब आरोप-प्रत्यारोप की भाषा विकास की बहस पर हावी हो जाती है। किच्छा विधानसभा क्षेत्र में पूर्व विधायक राजेश शुक्ला और वर्तमान विधायक तिलक राज बहेड़ के बीच सोशल मीडिया के माध्यम से चल रही शब्द-जंग उसी गिरते राजनीतिक स्तर का उदाहरण है, जिससे जनता अब ऊब चुकी है।
राजेश शुक्ला का यह कहना कि “दूसरों पर कीचड़ उछालने से पहले अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए” केवल एक व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर सवाल है जिसमें आत्ममंथन की जगह आत्मरक्षा ने ले ली है। बच्चों की गलती को स्वीकार करना सराहनीय है, किंतु यह भी उतना ही सच है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर और अपने आसपास देखते हैं। यह बात राजनीति पर भी लागू होती है।
ब्लॉक चुनाव के समय घर को ‘छावनी’ में बदलने के आरोप, कथित समझौते, स्क्रिप्टेड प्रेस कॉन्फ्रेंस और मन्नू पाल जैसे नामों का सार्वजनिक उल्लेख यह बताता है कि लड़ाई अब नीतियों की नहीं, बल्कि नियंत्रण की है। सवाल यह है कि जब सरकार आपकी, प्रशासन आपका और अधिकारी भी आपके प्रभाव में बताए जाते हैं, तो फिर भय किस बात का?
पूर्व विधायक का यह तर्क भी गंभीर है कि जिन सवालों को विपक्ष से पूछा जा रहा है, वे पहले अपनी सरकार और अपने प्रशासन से क्यों नहीं पूछे जा रहे। लोकतंत्र में जवाबदेही सत्ता से शुरू होती है, न कि आलोचक से।
राजेश शुक्ला द्वारा अपने राजनीतिक जीवन को कर्तव्य और विकास के सपनों से जोड़ना और वर्तमान विधायक के पांच वर्षों को “कन्फ्यूजन, अपराध, भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत उलझनों” में बीतने का आरोप लगाना, सीधे तौर पर मिशन 2027 की राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
क्या किच्छा की जनता को 2027 में भी यही बहस चाहिए?
जनता यह जानना चाहती है कि—
रोजगार के अवसर क्यों नहीं बढ़े?
अपराध पर नियंत्रण क्यों नहीं हुआ?
विकास योजनाएँ ज़मीन पर क्यों नहीं उतरीं?
और राजनीति व्यक्तिगत द्वेष का अखाड़ा क्यों बनी रही?
लोकतंत्र में जनता का समय सबसे कीमती होता है। जो नेता उस समय को व्यक्तिगत लड़ाइयों में गंवाते हैं, इतिहास उन्हें माफ़ नहीं करता। यही कारण है कि बड़े नेता अपने विरोधियों से नहीं, बल्कि जनता की अपेक्षाओं से डरते हैं।
मिशन 2027 केवल सत्ता परिवर्तन या पुनः सत्ता प्राप्ति का अभियान नहीं होना चाहिए, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर है—सत्ता में रहे लोगों के लिए भी और सत्ता के दावेदारों के लिए भी।
अगर राजनीति का केंद्र फिर से विकास, पारदर्शिता और जनविश्वास नहीं बना, तो 2027 में फैसला किसी फेसबुक पोस्ट से नहीं, बल्कि मतदान मशीन के बटन से होगा—और वहां कोई सफ़ाई काम नहीं आएगी।


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