

प्रतिनिधिमंडल का महत्व

सात सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों को 30 से अधिक देशों में भेजने का निर्णय क्या इस बात का संकेत है कि भारत ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया? क्या यह कूटनीतिक विफलता का परिणाम है? यदि ऐसा है, तो क्या ये प्रतिनिधिमंडल आतंकवाद के खिलाफ भारत की राजनीतिक सहमति को विदेशी राजधानियों में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर पाएंगे?
संवाददाता,शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स /उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह
भारत की कूटनीति की चुनौतियाँ
इन सवालों का उठना स्वाभाविक है क्योंकि जिन देशों में ये दल जाएंगे, वहां भारत के दूतावास हैं, जो देश का पक्ष रखने की जिम्मेदारी निभाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की कूटनीति को पहले से अधिक सक्रिय माना जाता है, लेकिन संकट के समय ये बातें कितनी प्रभावी साबित होंगी?
अतीत के सबक
जैसे 2008 में मुंबई हमलों के बाद भारत ने ठोस साक्ष्यों के साथ पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग किया था, क्या वर्तमान में भी ऐसा किया जा सकेगा? यह महत्वपूर्ण है कि प्रतिनिधिमंडल ठोस सबूतों और तर्कों के साथ अपनी बात रखें।
भू-राजनीतिक परिदृश्य
भारत को यह साबित करना होगा कि पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। भारत ने पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हमले किए हैं, लेकिन इस बार यह अधिक बड़े पैमाने पर हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अब की नीति के रूप में स्थापित किया है।
अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी
हालांकि, पाकिस्तान आतंकवाद का केंद्र है, फिर भी कई शक्तिशाली देश उसे समर्थन देते हैं। यह स्थिति भारत के लिए चुनौतीपूर्ण है, खासकर जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया।
भारत की छवि पर प्रभाव
भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर कई कारक प्रभाव डाल रहे हैं, जैसे कि पड़ोसी देशों के साथ संबंध, पश्चिमी देशों के साथ जुड़ाव, और घरेलू राजनीति। इन सभी ने भारत की स्थिति को कमजोर किया है।
निष्कर्ष
इसलिए, सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए भारत का पक्ष मजबूती से रखना होगा। भारत को यह समझाना होगा कि उसकी छवि को सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।




