


तो ऐसे में मन में सवाल आता है कि आखिर उनकी महिमा इतनी फैली कैसे और उनका अस्तित्व कहां से शुरू हुआ? वैष्णो देवी के प्रकट होने की कथा भागवत में आती है। इस देवी की कथा दुर्गासप्तशती में भी है लेकिन वेदों और पुराणों में उनके नाम का कोई सीधा उल्लेख नहीं है। कहा जाता है कि ज्यादातर पुराण हजारों साल पहले लिखे गए थे, लेकिन वैष्णो देवी का ज्ञात इतिहास करीब 500 से 1000 साल पुराना है। शायद इसीलिए पुराणों या वेदों में उनका वर्णन नहीं मिलता।

वैष्णो देवी को त्रिकुटा और वैष्णवी के नाम से भी जाना जाता है। वैष्णो देवी के जन्म की कथा भगवान विष्णु के वंश से जुड़ी है और उन्हें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का अवतार माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि वैष्णो देवी का जन्म दक्षिण भारत के रत्नाकर परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम त्रिकुटा था। बाद में वे भगवान विष्णु के वंश में पैदा हुईं, जिसके कारण उनका नाम वैष्णवी पड़ा। तभी से उन्हें वैष्णो माता के नाम से जाना जाने लगा।
कहते हैं कि त्रेता युग में माता वैष्णो ने राजकुमारी के रूप में जन्म लिया था, ताकि वे लोगों का कल्याण कर सकें। बाद में वे त्रिकुटा पर्वत पर जाकर तपस्या करने लगीं, जहां समय के साथ उनका शरीर तीन दिव्य शक्तियों में परिवर्तित हो गया। आज वैष्णो देवी का मंदिर त्रिकुटा पर्वत पर प्राचीन गुफा में स्थित है, जहां वे अपने तीन महान रूपों में तीन मूर्तियों के रूप में स्थापित थीं। यही कारण है कि गुफा में माता के तीन रूप दिखाई देने के बावजूद उन्हें एक ही नाम वैष्णो देवी से जाना और पूजा जाता है।
संवाददाता,शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स /उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह
माता वैष्णो देवी से जुड़ी पौराणिक कथा
एक मान्यता के अनुसार एक बार एक राक्षस राजा ने ब्रह्मा जी को अपनी तपस्या से प्रसन्न कर वरदान मांगा कि तीनों लोकों में उनके गर्भ से उत्पन्न कोई भी प्राणी उसे न मार सके। ब्रह्मा जी से वरदान मिलने के बाद उस राक्षस राजा ने सभी ऋषियों, देवताओं और मनुष्यों को परेशान करना शुरू कर दिया। सभी देवता मदद मांगने के लिए पहले ब्रह्मा जी और फिर शिव जी के पास गए। शिव जी ने कहा कि ब्रह्म देव के वरदान के कारण मैं आपकी मदद नहीं कर सकता, इसलिए आप सभी विष्णु जी के पास जाएं। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती से अपनी शक्ति से एक स्त्री उत्पन्न करने को कहा। तीनों देवियों ने मिलकर एक नई शक्ति उत्पन्न की जिसका नाम वैष्णवी रखा गया। वैष्णवी ने उस राक्षस का वध कर दिया।
इसके बाद वह विष्णु जी के पास लौटी और उनसे कहा कि अब मेरा कार्य पूर्ण हो गया है। अब आप मुझे अपने हृदय में स्थान दें। तब भगवान विष्णु ने कहा कि तुम राजा रत्नाकर की पुत्री के रूप में जन्म लो और धर्म की रक्षा करो। मैं तुमसे अवश्य मिलूंगा। उसके बाद वैष्णवी ने राजा रत्नाकर की पुत्री के रूप में जन्म लिया और बचपन से ही राम नाम का गुणगान करने लगी। थोड़ी समझदार होने पर वह त्रिकूट पर्वत पर जाकर भगवान राम की प्रतीक्षा करने लगी। जब भगवान राम सीता माता की खोज करते हुए वैष्णवी से मिले तो वैष्णवी ने कहा कि अब मुझे भी अपने साथ ले चलो। तब श्री राम ने कहा कि मैं अभी सीता की खोज में जा रहा हूं। मैं विवाहित हूं और इस जन्म में मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकता। इसीलिए तुम अब त्रिकूट पर्वत पर मेरी प्रतीक्षा करो। मैं कलियुग के अंत में कल्कि रूप में तुमसे मिलूंगा और तुमसे विवाह करूंगा। उस समय मेरी दो पत्नियां होंगी, एक महालक्ष्मी और दूसरी तुम। कहा जाता है कि तब से माता वैष्णवी भगवान कल्कि की प्रतीक्षा में त्रिकूट पर्वत पर वैष्णव देवी के रूप में तपस्या कर रही हैं।




